भय का श्राप तो स्वतंत्र कैसे?

देश के पैमाने में, 138 करोड़ आबादी में या हिंदू के जीवन की कसौटी में ईश्वर का यह श्राप दो टूक है कि हमें स्वतंत्रता, निर्भीकता, निडरता से नहीं, बल्कि भय, खौफ, चिंताओं में जीना है! चीन के आगे भारत क्यों आज किंकर्तव्यविमूढ़ है? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी क्या चीन का नाम ले कर उसे धमका सकते हैं? फिर भले वह हमारी जमीन पर क्यों न आ बैठा हो? हिंदुओं ने पाकिस्तान, मुसलमान के भय में उन्हें छप्पर फाड़ जनादेश दिया बावजूद इसके वे सिर्फ इस चिंता, भय में राज कर रहे हैं कि कहीं वे अलोकप्रिय न हो जाएं? विरोधी कहीं उठ खड़े न हों? यहीं चिंता उनके राजकाजकी लाइफलाइन है। इसलिए अकेला मिशन सब भयाकुल रहें। कोई सच न सुन पाए, न देख पाए, न समझ आए!

सोचें, क्या मोदी सरकार के मंत्री, भाजपा के नेता, संघ में कोई एक भी ऐसा निडर है जो चीन को लेकर, कोरोना को लेकर, आर्थिकी को लेकर, रोजगार को ले कर सवाल कर सके? सब गुलाम हैं, सब भयभीत हैं वैसे ही जैसे पंडित नेहरू के वक्त में उनके कैबिनेट मंत्री, कांग्रेस हुआ करती थी। चाहें तो इस भय को आप भक्ति का नाम दे सकते हैं लेकिन दोनों भावों का अर्थ है बुद्धि और दिमाग से परतंत्र!तभी 1962 में लोकसभा में जब नेहरू ने अक्साई चीन के बंजर पठार का कुतर्क देते हुए चीनी कब्जे की भाषणबाजी की तो महावीर त्यागी ने खड़े हो कर पूछा आपका सिर गंजा है तो उसे भी बंजर समझें? तब पूरा देश महावीर त्यागी की निडरता पर ऐसे हैरान हुआ कि गुलाम कौम के बीच कैसा अनहोना एक सांसद!

निर्भीकता, निडरतायाकि हिंदू का स्वतंत्र होना न तब था और न अब है। हम हिंदुओं को नियति का श्राप है कि हमारा जीना भय की गुलामी में ही होगा। कोई उसे स्वतंत्रता दे भी दे लेकिन वह वापिस भय, चिंता, झूठ, मूर्खताओं की बेड़ियों में खुद जीवन जीने लगेगा यही नहींबाकी सहधर्मियों को भी वैसे ही डरा कर, उसे परतंत्र, बंधुआ बनाकर जीवन जीने को मजबूर करेगा। असंतोष, विरोध इसलिए संभव नहीं है क्योंकि हिंदुओं ने वह जीवन कब जीया है, जिसमें निडरता, निर्भीकता स्वतंत्रता में वह अनुभूति हो, जिससे छटपटाहट, बैचेनी बने और वह आजादी के लिए फड़फड़ाए। बुद्धि की स्वतंत्रता से उड़ने के पंख फैलाए। पिंजरे में, बेड़ियों में रहने के हम हिंदू क्योंकि हजार साल का अनुभव लिए हुए हैं तो स्वतंत्र पक्षी जैसे उड़ने का ख्याल भला कैसे बन सकता है? पिंजरे के पंछी को न स्वतंत्रता का भास हो सकता और न वह आजाद हो सकता है। वह पिंजरे से बाहर निकल जाए, मालिक उसको आजाद कर भी दे तब भी वापिस पिंजरे में, मालिक के घर मुक्त हुआ बंधुआ लौट इंतजार करेगा कि हुकूम आदेश फरमाएं!

हिंदू की आजादी क्षणिक है। लोकतंत्र में उसे वोट का अधिकार है। सो, पांच साल में वह एक बार पिंजरे से बाहर निकलता है। तात्कालिक स्थितियों के अनुसार कार्ड चुन वोट डाल देता है और फिर पिंजरे में लौट आता है। वापिस मालिक के रहमोकरम, माईबाप सरकार, तंत्र उर्फ पिंजरे में जीवन जीने को शापित।

इस सत्व-तत्व में आज जो हकीकत है वह 73 साला इतिहास में इसलिए अभूतपूर्व है क्योंकि महामारी, आर्थिक-लोकतांत्रिक बरबादी और पाकिस्तान-चीन-मुस्लिम की चिंताओं में भारत राष्ट्र-राज्य के पिंजरे में हिंदुओं की आज जो बेसुधी है, तोते के राम रट्टे का जो नैरेटिव है उसने मुझे मन ही मन डराया है कि सत्य से सामना जब भी कभी हुआ तो भारत का, हिंदुओं का बनेगा क्या? चीन जब सचमुच साम्राज्यवादी त्रिशूल के साथ वार करेगा याकि हिंदू सभ्यता विरोधी ताकतें सामूहिक तौर पर उत्पात करेंगी तब उस वक्त हिंदू निडर, निर्भीक, बहादुर, बुद्धिमना होगा, स्वतंत्र होने की अग्नि दिल-दिमाग में लिए हुए होगा या वहीं होगा जो पिछले हजार सालों में हुआ है? भय में भक्ति की तरफ मुड़ कर तोते अलापेंगे कि कोऊ नृप हो हमें का हानी!और हमारे पृथ्वीराज हैं न बचाने के लिए!

ईश्वर के लिए सोचें, यह कैसी देशभक्ति, कैसे हम हिंदू जो अपनी बुद्धि में स्वतंत्रता, निडरता, निर्भयता, बहादुरी, सत्यता के मानसिक विकास की रत्ती भर चिंता लिए हुए नहीं हैं। उलटे हिंदू की बुद्धि को कुंद बनाने, उसे बांटने, भयाकुल बनाने, डराने-गुलाम-भक्त बनाने का महाअभियान, महा झूठा नैरेटिव चला हुआ है। क्या उससे हिंदू ताकतवर, देश महाशक्ति बनेगा?क्या वह चीन की आर्थिक परतंत्रता से मुक्त हो सकता है? क्या वह मुसलमान के भय के आगे निर्भय होगा? उसकी बुद्धि भय से मुक्त स्वतंत्र हो जाएगी?

कतई नहीं। जब पाठ ही दिन-रात भक्ति-समर्पण का है, आरती उतारने का है और पिंजरे में तोता रटंत के नैरेटिव का है तो न हिंदू चीनी कंपनियों पर निर्भरता को पुरुषार्थ-उद्यम से खत्म कर सकता है और न हिंदू लीडर चीन को लड़ाई से भगाने की हिम्मत कर सकता है। जो है वह सिर्फ हिंदुओं की बुद्धि को हरण करने के मकसद सेउन्हें भक्त व गुलाम बनाने के लिए है।

हिंदुओं की इस हजार साला प्रवृति में व्यक्ति को, कौम को बहादुर बनाने का एक उदाहरण देना चाहूंगा। हिंदू का अनुभव है इसलिए जरा गहराई सेसोचें। मुस्लिम हमलावरों, मुगल राज के मध्यकाल में जब हिंदू पूरी तरह भक्ति आंदोलन में भजन-कीर्तन करते हुए थे तब किसने बहादुर, निर्भय, निर्भीक इंसान बनाने की मिसाल बनाई? वह प्रयास था सिक्ख गुरूओं का!हां, याद करें उस वक्त को जब सिक्ख गुरूओं ने मुगलिया सल्तनत के आगे अपने बंदों को बहादुरी के पाठ पढ़ाए और गुरू के बंदे दिवाल में चुने गए तब भी बंदों ने गुलामी, परतंत्रता नहीं स्वीकारी! औसत भक्तिवादी हिंदू तभी से उन किस्सों में सिक्ख, निहंग डेरों को निर्भीकता, सत्यता, बहादुरी में आदर्श मानता था और मानता है। धर्म की औसत शिक्षा से, हिंदू राजा के सिस्टम से हिंदू को बहादुर बनाने का वैसा काम क्या कभी हिंदुओं के लिए हुआ? समर्थ रामदास के विचारों से शिवाजी में स्वतंत्रता की ललक, राणा प्रताप की आजादी की जिद्द के प्रसंग व्यक्तिगत तासीर के हैं। बतौर कौम हिंदुओं में स्वतंत्रता का वह रोपण नहीं था, जो सिक्ख गुरूओं से सिक्खों में हुआ।

क्या हिंदूशाही में हिंदू को ऐसे निर्भीक, निडर, बहादुर, स्वतंत्र नहीं बनाना चाहिए?संघ ने हिंदुओं को बहादुर बनाया या संगठित करने के नाम पर पिंजरे में बंद तोतों का निर्माण किया है? सत्ता के पिंजरे में सत्ता के गुलाम तोते और तोता रंटत के नैरेटिव के साथ पिंजरों के तोतों की संगठन शक्ति से क्या मनुष्य स्वतंत्र हो कर स्वतंत्रता से ज्ञानवान, बुद्धिमान, सत्यशोधक बन सकता है? पिंजरों के तोते स्वतंत्र, बहादुर होते हैं या परतंत्र और पराश्रित? उससे कौम का बुद्धि विन्यास होगा या बुद्धि विनाश?

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