अमेरिकी लोकतंत्र और बाइडेन का भाषण - Naya India
हरिशंकर व्यास कॉलम | गपशप| नया इंडिया|

अमेरिकी लोकतंत्र और बाइडेन का भाषण

जो बाइडेन ने अमेरिका के राष्ट्रपति के रूप में शपथ लेने के बाद जो भाषण दिया वह कई मायने में ऐतिहासिक था। हम भारत के लोगों के लिए इतने भर से वह ऐतिहासिक हो गया कि भारतवंशी विनय रेड्डी ने वह भाषण तैयार किया था। सोचें, यह भी अमेरिकी लोकतंत्र की खूबसूरती है कि दूसरे मुल्क और अलग नस्ल का एक व्यक्ति अमेरिका के राष्ट्रपति का उद्घाटन भाषण लिखता है। राष्ट्रपति बाइडेन ने अपनी टीम में भारतीय मूल के 20 लोगों को अलग अलग पदों पर नियुक्त किया है। उस पर बहुत चर्चा हो चुकी है अभी फिलहाल राष्ट्रपति बाइडेन के भाषण की चर्चा करते हैं, जो सिर्फ भारत नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए बेहद अहम है। उससे अमेरिकी लोकतंत्र की मजबूत बुनियाद और आदर्शों का पता चलता है।

बाइडेन के भाषण के ऐतिहासिक संदर्भों की बात से पहले अमेरिकी लोकतंत्र की खूबसूरती बताने वाली एक खबर का जिक्र जरूरी है, जिसने निश्चित रूप से सारी दुनिया का ध्यान खींचा है। जिस दिन बाइडेन ने शपथ ली उस दिन वे वर्जीनिया की अरलिंगटन नेशनल सेमेट्री में गए थे, जहां अमेरिका के अज्ञात सैनिकों की समाधियां हैं। उन अज्ञात सैनिकों को श्रद्धांजलि देने में उनके साथ अमेरिका के तीन पूर्व राष्ट्रपति भी थे। बाद में तीनों पूर्व राष्ट्रपति- बिल क्लिटंन, जॉर्ज बुश और बराक ओबामा ने एक साझा वीडियो जारी किया, जो अपने आप में दुर्लभ है। ध्यान रहे जॉर्ज बुश उसी रिपब्लिकन पार्टी के नेता हैं, जिसके नेता डोनाल्ड ट्रंप हैं, जिन्हें हरा कर बाइडेन राष्ट्रपति बने हैं। तीनों पूर्व राष्ट्रपतियों ने बाइडेन को बधाई और शुभकामना देते हुए सत्ता के शांतिपूर्ण हस्तांतरण की बात कही और इसका महत्व समझाया। यह एक तरह से ट्रंप और उन जैसे तमाम लोगों के लिए एक नसीहत की तरह है, जिन्हें लगता है कि वे अपने भड़काऊ भाषणों और उग्र-हिंसक समर्थकों के दम पर लोकतंत्र की स्वाभाविक गति को बाधित कर देंगे। ट्रंप ने अपने समर्थकों को उकसा कर कैपिटल बिल्डिंग यानी अमेरिकी संसद पर हमला कराया था। तीनों पूर्व राष्ट्रपतियों का वीडियो उनके लिए एक संदेश था।

बहरहाल, बाइडेन ने भी अपने भाषण में कैपिटल बिल्डिंग पर हुए हमले का जिक्र किया और कहा- आज हम जहां खड़े हैं, वहां कुछ दिन पहले भीड़ खड़ी थी। उन लोगों ने सोचा था कि वे हिंसा के जरिए जनता की इच्छा को बदल देंगे। लोकतंत्र को रोक देंगे, हमें इस पवित्र जगह से हटा देंगे। ऐसा नहीं हुआ। ऐसा नहीं होगा। न आज, न कल और न भविष्य में कभी! बाइडेन ने अपने 22 मिनट के भाषण में लोकतंत्र के महत्व, लोकतंत्र की जरूरत और लोकतंत्र में असहमति के महत्व के बारे में विस्तार से बात कही। उन्होंने अमेरिका के महान राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन का नाम नहीं लिया पर लोकतंत्र के उन तमाम बुनियादी सिद्धांतों की चर्चा की, जिसका जिक्र लिंकन ने किया था। बाइडेन ने लोकतंत्र का महत्व बताते हुए कहा- हमने एक बार फिर सीखा है कि लोकतंत्र बेशकीमती है और साथ ही नाजुक भी है। लोकतंत्र यहां कायम है। आज किसी व्यक्ति की जीत का नहीं, बल्कि एक कारण की जीत का दिन है। यही लोकतंत्र है। अगर असहमति है तो भी लोकतंत्र जरूरी है। यह हमारे देश की सबसे बड़ी ताकत है। उन्होंने आगे कहा- यह किसी उम्मीदवार की जीत का जश्न नहीं, बल्कि लोकतंत्र की जीत का जश्न है। हम मिल कर अर्थव्यउवस्थाी को मजबूत बनाएंगे। अमेरिका पहले से ज्या,दा मजबूत होगा। यह अमेरिका का दिन है। यह लोकतंत्र का दिन है। यह उम्मीदों का दिन है।

बाइडेन जब कैपिटल बिल्डिंग पर शपथ लेने पहुंचे तो उनको पता था कि अमेरिका आज कितना बंटा हुआ है, ट्रंप ने अपने झूठ और अहंकार में अमेरिका को किस कदर विभाजित किया है। इसलिए उन्होंने देश और नागरिकों की एकता, भाईचारे पर सबसे ज्यादा जोर दिया। उनके शपथ समारोह में हुए तमाम परफॉर्मेंस में सबका जोर एकता पर था। चाहे ग्राथ ब्रुक का गाया ‘अमेजिंग ग्रेस’ हो या अमांडा गोर्मैन की गाई कविता ‘द हिल वी क्लाइंब’ लेडी गागा का गाया नेशनल एंथम हो या जेनिफर लोपेज का स्पैनिश संगीत, सबमें एकता बुनियादी तत्व के रूप में मौजूद था। इन सारे चेहरों के जरिए भी बाइडेन ने अमेरिका की विविधता और उसकी एकता का ही संदेश दिया। यह संदेश सबसे ज्यादा उनके भाषण में था।

बाइडेन ने अपने भाषण में कहा- अमेरिका की आत्मा और उसका भविष्य सुरक्षित करने के लिए एकता की जरूरत सबसे ज्यादा है। लोकतंत्र में एकता का बड़ा महत्व है। इसी एकता के सहारे हम हर मंजिल हासिल कर सकते हैं। लोगों को अच्छी नौकरियां दे सकते हैं। बच्चों को सुरक्षित स्कूलों में पढ़ा सकते हैं। महामारी से जीत सकते हैं। उन्होंने पिछले राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा पैदा किए कृत्रिम विभाजन को खत्म करने की अपील करते हुए कहा- एकता के बलबूते हम अमेरिका को दुनिया में अच्छी चीजों का सरताज बना सकते हैं। बाइडेन ने अमेरिका पर हुए आतंकी हमले का जिक्र किया और कहा- चाहे विश्व युद्ध हो या ऐतिहासिक मंदी हो या 9/11 की घटना हो, इसी एकता की वजह से हम उबर पाए। ये हम दोबारा कर सकते हैं। उन्होंने कहा- एकता के बिना अमन नामुमकिन है। यही हमें आगे का रास्ता दिखाएगी। मिल कर हम भय नहीं बल्कि, आशा की कहानी लिखेंगे।

उन्होंने ट्रंप का नाम लिए बगैर कहा- मैं जानता हूं कि कुछ ताकतों ने हमें बांटा है और इनकी जड़ें गहरी और वास्तविक हैं। लेकिन, मैं ये भी जानता हूं कि ये ताकतें नई नहीं हैं। अमेरिकी इतिहास में इनसे संघर्ष की मिसालें मिलती हैं। नस्लवाद और डर के मामले पहले भी देखे गए। मैं मानता हूं कि कुछ अमेरिकी आज भी यह अनुभव करते हैं। बाइडेन ने कहा कि असहमति का मतलब युद्ध नहीं होता है।  कैपिटल बिल्डिंग पर हुए हमले का जिक्र करते हुए बाइडेन ने कहा- यहां गृह युद्ध जैसे हालात थे। हिंसा हमारे काम को खामोश नहीं कर सकता। अगर आप असहमत हैं तो रहिए। यही अमेरिका है।

बाइडेन का  भाषण इसलिए भी बेहद खूबसूरत था क्योंकि लोकतंत्र, एकता, असहमति के अधिकार आदि की बात करते हुए बाइडेन ने न्याय, दया, अहिंसा जैसे बेहद ऊंचे आदर्शों की बात भी कही। उन्होंने सारे विभाजन मिटाने की अपील करते हुए कहा- विभाजन तभी मिटेगा, जब हम अपनी आत्मा में झांकेंगे। दया और सद्भाव दिखाएंगे।

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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