क्या इमरजेंसी से भी बुरे हालात हैं?

देश इस समय चौतरफा संकट के दौर से गुजर रहा है। कोरोना वायरस का संक्रमण रोकने के लिए लागू किए गए लॉकडाउन से और उसके बाद के हालात से अर्थव्यवस्था का भट्ठा बैठा है। महंगाई बढ़ रही है और सरकार पिछले करीब तीन हफ्ते से पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ा रही है। वायरस का संक्रमण पूरे देश में रिकार्ड तेजी से बढ़ रहा है। चीन की वजह से सीमा पर ऐतिहासिक तनाव है। इसके बावजूद देश में विपक्षी पार्टियां सरकार के सवाल नहीं पूछ रही हैं, कोई आंदोलन खड़ा नहीं कर रही हैं, लोगो को जागरूक करने के प्रयास नहीं कर रही हैं। ज्यादातर विपक्षी पार्टियां असहायता जता दे रही हैं कि हम क्या कर सकते हैं। उनको शिकायत है कि मीडिया उनकी बात नहीं दिखाता है या मीडिया उलटे विपक्षी पार्टियों से ही सवाल पूछता है और सरकार का समर्थन करता है।

यह सही है कि मीडिया ने सबसे ज्यादा निराश किया है पर क्या राजनीति पूरी तरह से सिर्फ मीडिया पर ही निर्भर है? अगर मीडिया नहीं हो तो क्या राजनीति नहीं होगी? इमरजेंसी के समय मीडिया पर लगभग पूरी तरह से पाबंदी थी और सिर्फ सरकारी मीडिया काम करता था। तब सोशल मीडिया या वैकल्पिक मीडिया का उदय भी नहीं हुआ था। इसके बावजूद इमरजेंसी की कहानियां घर घर पहुंची थी। नेताओं की गिरफ्तारी, उन पर होने वाले जोर-जुल्म, सरकार की ज्यादतियों की सही और बहुत सी गढ़ी हुई कहानियां लोगों तक पहुंची थीं। लोगों ने स्थानीय स्तर पर परचे और पैंफलेट छाप कर लोगों तक विपक्ष की बात पहुंचाई थी। तब विपक्ष बहुत सक्षम नहीं था और विपक्ष की इक्का-दुक्का पार्टियों को छोड़ कर कोई पार्टी किसी राज्य में सत्ता में नहीं रही थी। सवाल है कि क्या आज हालात उससे भी बुरे हैं?

आज हालात उससे बेहतर हैं। विपक्षी पार्टियां पहले से ज्यादा साधन संपन्न हैं। लगभग हर विपक्षी पार्टी राज्यों में सरकार चला चुकी है और उसके पास कार्यकर्ताओं से लेकर दूसरे हर तरह का साधन उपलब्ध है। आज वैकल्पिक मीडिया है। ज्यादातर पार्टियों की अपनी वेबसाइट्स हैं और उनके अपने परचे हैं। सोशल मीडिया में सभी पार्टियों के नेता सक्रिय हैं। वे उस प्लेटफॉर्म पर भी जनता से जुड़े मुद्दे उठा सकते हैं और सरकार को कठघरे में खड़ा कर सकते हैं। इमरजेंसी के समय बड़े नेता जेल में थे और पैदल सेनानी लड़ाई कर रहे थे। इसके बावजूद सरकार परेशान थी। गिरफ्तारी से बचे हुए नेता गुरिल्ला युद्ध लड़ रहे थे। आज गुरिल्ला युद्ध की जरूरत नहीं है, संवैधानिक तरीके से नेताओं के अपनी बात कहने के प्लेटफॉर्म उपलब्ध हैं।

इसमें संदेह नहीं है कि सरकार जान बूझकर ऐसे नियम और दिशा-निर्देश बना रही है, जिससे विपक्ष के राजनीति करने का अवसर घटे। जैसे अनलॉक में सरकार ने सारी चीजें खोल दी हैं पर राजनीतिक गतिविधियों की इजाजत नहीं है। भाजपा खुद इतनी सक्षम है कि वह वर्चुअल रैलियां कर ले रही है पर विपक्षी पार्टियों ने ऐसा कोई सिस्टम नहीं बनाया है। इमरजेंसी के समय जब सरकार ने विपक्ष और मीडिया की आवाज दबाई तो नेताओं और पत्रकारों ने वैकल्पिक उपाय निकाले। पर आज सब कुछ से सक्षम होने के बावजूद वैकल्पिक उपाय नहीं किए जा रहे हैं। वैकल्पिक उपाय भी सत्तापक्ष ही कर रहा है। इससे जाहिर हो रहा है कि विपक्ष की रूचि ही राजनीति करने में नहीं है। वे सब अपना जातीय गणित या सामाजिक समीकरण बना कर बैठे हैं और उसी के भरोसे इस उम्मीद में हैं कि सब कुछ सामान्य होगा तो फिर अपने वोट बैंक के सहारे राजनीति कर लेंगे।

इमरजेंसी और आज के समय में एक बड़ा फर्क यह भी है कि उस समय पार्टियां वैचारिक जरूरत से निर्देशित हो रही थीं। उनका मकसद इंदिरा गांधी को हरा कर सत्ता हासिल करना भर नहीं था, बल्कि वे लोकतंत्र की वास्तव में रक्षा करना चाहते थे। दूसरे, उस समय के नेताओं का नैतिक बल बहुत बड़ा था और किसी नेता के ऊपर भ्रष्टाचार के मामले नहीं चल रहे थे। इसलिए उनके जेल में होने से लोगों में नाराजगी थी। आज ज्यादातर विपक्षी नेता किसी न किसी भ्रष्टाचार के मामले में आरोपी हैं। वे सरकार विरोधी आंदोलन करेंगे तो उनके खिलाफ भ्रष्टाचार का मुकदमा खुल जाएगा और उनको पता है कि भ्रष्टाचार के मामले में जेल गए तो अपनी जाति को थोड़े से लोगों को छोड़ कर कोई आंदोलित नहीं होगा और किसी की सहानुभूति नहीं मिलेगी। लालू प्रसाद इसकी मिसाल हैं। इसलिए नेता डरे हैं और मीडिया के लोग भी या तो डरे हैं या लालच में फंसे हैं। डरा हुए नेता और डरी हुई मीडिया लोकतंत्र के लिए ज्यादा बड़ा खतरा है।

One thought on “क्या इमरजेंसी से भी बुरे हालात हैं?

  1. मेरी नजर में आज कोई विपक्ष नहीं है।जो अपने को विपक्ष समझ रहा है वह गलती कर रहा है।ये वे लोग हैं जिनको जनता ने इनकी सत्ता लोलुपता, जातिवादी गोलबन्दी, और भ्रष्टाचार के कारण नकार दिया है।कभी विकल्प न होने के कारण जनता इनको चुन भी लेती है तो ये बीजेपी के हाथों बिक जाते हैं।इनमें जन सेवा की भवना नहीं है।ये सिर्फ इस इंतजार में हैं कि बिल्ली के भाग से हंडिया फूटे तो इनके हाथ कुछ लग जाय।इनके हाथों में सत्ता चली गईं तो आज देश और जनता की जो बर्बादी हो रही है वह रुकने वाली नहीं है।
    अभी जो सरकार है वह आसानी से सत्ता छोड़ने वाली नहीं है।जो यह सोच रहे हैं कि चुनाव से इनको बेदखल कर देंगे ( जैसे बिहार में ) वो मुगालते में हैं।वर्तमान में बीजेपी की चुनाव जिताऊ मशीनरी का कोई न तोड़ है न विकल्प। इसलिए समुद्र मंथन पूरा होने पर ही विकल्प, विपक्ष निकलेगा।

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