नौ महीने का चुनाव प्रचार - Naya India
हरिशंकर व्यास कॉलम | गपशप| नया इंडिया|

नौ महीने का चुनाव प्रचार

बिहार में विधानसभा चुनाव नवंबर में होने हैं पर प्रचार अभी से शुरू हो गया। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के राजनीतिक रणनीतिकार रहे प्रशांत किशोर ने ‘बात बिहार की’ अभियान लांच किया है। उन्होंने गुरुवार को इसकी शुरुआत की और शुरू होने के चंद घंटों के अंदर ही इससे चार लाख से ज्यादा लोग जुड़ गए। उनका लक्ष्य एक करोड़ लोगों तक पहुंचना और दस लाख लोगों को अपने अभियान से जोड़ना है। तीन महीने में यह काम करने के बाद वे राजनीतिक दल की घोषणा करेंगे। उन्होंने अपना अभियान शुरू किया तो भाजपा के सबसे बड़े नेता और राज्य के उप मुख्यमंत्री सुशील मोदी और उनकी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष संजय जायसवाल ने उन पर हमला किया। जदयू के दो बड़े नेताओं केसी त्यागी और आरसीपी सिंह ने भी उनको निशाना बनाया। इससे जाहिर है शुरू होते ही उनका अभियान अपना असर छोड़ने लगा है। विपक्षी पार्टियों ने उनके अभियान को समर्थन देने का ऐलान किया है।

सत्तारूढ़ जनता दल यू और मुख्य विपक्षी पार्टी राजद के बीच पोस्टर वार अलग छिड़ा हुआ है। जदयू की ओर से लालू प्रसाद और राबड़ी देवी के 15 साल पुराने राज की याद दिला कर लोगों को उसका भय दिखाया जा रहा है तो राजद की ओर से नीतीश सरकार के पांच साल के कामकाज पर सवाल उठाए जा रहे हैं। संशोधित नागरिकता कानून, सीएए के समर्थन और विरोध की राजनीति अलग चल रही है। इस बीच राज्य और केंद्र के सत्तारूढ़ गठबंधन में शामिल लोक जनशक्ति पार्टी के नेता चिराग पासवान ‘बिहार फर्स्ट, बिहारी फर्स्ट’ की यात्रा पर निकल गए हैं। थोड़े दिन पहले ही मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की जल, जीवन हरियाली यात्रा पूरी हुई है। इस दौरान वे हर जिले में गए। उन्होंने चुनावी हालात का भी जायजा लिया और साथ ही अपनी पार्टी की तैयारियों की भी समीक्षा की।

सो, कुल मिला कर नौ महीने पहले ही बिहार में चुनाव का अभियान, प्रचार सब शुरू हो गया है। सोचें, नौ महीने पहले से सब कुछ राजनीतिक हो जाएगा। कामकाज ठप्प हो जाएंगे। जो भी फैसले होंगे वो राजनीति से प्रेरित होंगे। सरकार बड़ी घोषणाएं करेगी और विपक्ष उसे चुनावी स्टंट बताएगा। उसी हिसाब से अधिकारियों के तबादले और नई जगहों पर पदस्थापना शुरू हो गई है। चुनाव के नजरिए से यह प्रक्रिया आगे भी चलेगी। कामकाज की बजाय राजनीति होगी। सरकारी दफ्तरों से लेकर चाय-पान की दुकानों पर सिर्फ चुनावी चर्चा होगी। नेताओं के दौरे होंगे और रैलियां होंगी। गठबंधन की चर्चा, उम्मीदवारों का चयन, जातीय हिसाब-किताब अगले नौ महीने बिहार में यहीं सब कुछ होगा। सोचें, कब से एक साथ चुनाव कराने की चर्चा चल रही है। पर पिछले साल के लोकसभा चुनाव के बाद हर दूसरे-तीसरे महीने चुनाव हो रहे हैं। पहले महाराष्ट्र-हरियाणा में हुए, फिर झारखंड में, फिर दिल्ली में और अब बिहार में होंगे।

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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