अयोध्या के मोदी से विपक्ष कैसे लड़े?

सोचें, अयोध्या में मंदिर के भूमिपूजन के वक्त प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हिंदुओं में अपना जो प्रोजेक्शन बनाया है क्या उसे प्रियंका गांधी, अखिलेश यादव और मायावती में कोई भी या तीनों मिलकर भुलवा सकते हैं? इसके आगे कैसे ये उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में भगवा योगी आदित्यनाथ से चुनाव लड़ सकते हैं? कैसे वाराणसी में मोदी-योगी की बाबा विश्वनाथ मंदिर से बन रहे गंगा कॉरिडोर की अगली फिल्म का विपक्ष मुकाबला कर सकेगा? यदि भारत के हिंदुओं का मन भगवा प्रस्तुति, भगवा फिल्म, मोदी के भगवा दर्शन की भव्यताओं में रमा हुआ है तो राहुल गांधी, अखिलेश, मायावती, तेजस्वी, ममता में हिंदुओं की क्या दिलचस्पी होगी?

जितना सोचेंगे समझ नहीं आएगा कि विपक्ष करे तो क्या करे? मैं इस बारे में शुरू से यह लिखता रहा हूं कि यदि हिंदू जागा है और इस्लाम की बनाई स्थितियों से हिंदुओं में नरेंद्र मोदी-अमित शाह महानायक बने हैं तो उस विपक्ष के लिए जीना मुश्किल होगा जो सेकुलर राजनीति के ढर्रे में बंधा रहेगा। एक वक्त था जब उस राजनीति का काल था अब यदि नहीं है तो उस सेकुलर विपक्ष को नए वक्त अनुसार बदलना होगा? मगर क्या भाजपा की कार्बन कॉपी बन कर?

नहीं। उससे बात नहीं बन सकती? तब क्या हो? या तो भाजपा जैसा बनें या अपने मूल में रहें। अपना मानना है कि दोनों रास्तों से अलग तीसरा रास्ता है। विपक्ष हिट तब होगा जब नए, मौलिक रूप में वक्त का हिंदूपना भी पूरा हो और वह मदारी की जगह भरोसेमंद भारत निर्माता लगे।

जाहिर है कांग्रेस, सपा, बसपा याकि विपक्ष ने मूल सेकुलर चोंगे, सेकुलर स्क्रिप्ट पर फिल्म बनाई तो वह सुपरहिट नहीं होगी। उसे एक्शन के जमाने में भी नए अंदाज की ‘शोले’ बनानी होगी। नहीं! फिलहाल अयोध्या में राम मंदिर के भूमि पूजन की फिल्म, उसकी लोकप्रियता पर फोकस करके ही सोचा जाए कि विपक्ष वह क्या करे, जिससे उसकी फिल्म टक्कर वाली बने। क्या वह काशी, मथुरा में मस्जिद तुड़वाए? विपक्षी नेता भी मंदिर के आगे साष्टांग लेट कर अपनी भक्ति दिखाएं?

इससे फायदा नहीं होगा? ऐसी स्क्रिप्ट, फिल्मांकन, अभिनय, सेट भव्यता में न मौलिकता लाना विपक्ष के बूते में है और न वह विश्वसनीयता बना सकता है। एक्टिंग का वहीं फर्क होगा जो शाहरूख खान के आगे अक्षय कुमार का दिखता है। वक्त और वक्त की थीम क्योंकि हिंदू है तो राहुल, प्रियंका, अखिलेश, ममता, मायावती, तेजस्वी को हिंदू की थीम, भगवा रंग, पूजा-पाठ, मंदिर दर्शन आदि सब तो करते रहना होगा लेकिन गांधी और उनके रामराज्य वाली सहजता के साथ। अपना मानना था, है और रहेगा कि गांधी ने चतुर गुजराती व्यापारी के नाते अपनी राजनीति को बेचने के लिए हिंदुओं को पहला टारगेट बनाया तो अपने आपको पहले हिंदू, संत -महात्मा का वेश धारण कर हिंदुओं में प्रचारित किया। हिंदू के बीच हिंदू बन कर रहना होगा, यह गांधी का पहला आधार था। उन्होंने संत जैसे कपड़े पहने और उन तमाम हिंदू जुमलों, भजनों, प्रतीकों में अपना रहन-सहन बनाया, जिससे हिंदू उन्हें साबरमती का संत मानते हुए प्रामाणिक हिंदू समझे रहे।

वह गांधी की चतुर बनिया मार्केटिंग थी। वह उनका हिंदू ब्रांड निर्माण था। फर्क भारी दिखेगा लेकिन मार्केटिंग के वे तमाम तत्व कॉमन हैं, जिसके चलते गुजराती नरेंद्र मोदी ने हिंदुओं के बीच अपने को धर्मपरायण हिंदू राजा के रूप में पैठाया है तो गांधी ने हिंदुओं में संत के रूप में पैठाया था।

प्रामाणिक हिंदू बतलाने के बाद गांधी ने क्या किया? उन्होंने बूझा कि भारत और हिंदुओं का दिल गंगा-यमुना दोआब है और वहां का समाज कैसे धड़कता है, वहां लोक मान्यताएं कैसे बनती-बिगड़ती हैं? तो उनका खोजा जवाब था उत्तर प्रदेश और ब्राह्यण। सो, संत की वेशभूषा धारण कर गांधी ने उत्तर प्रदेश-बिहार को कर्मभूमि बनाया। यूनाइटेड प्रोविंस याकि तब के उत्तर प्रदेश में उन्होंने ब्राह्यणों के सर्वाधिक नामी, संपन्न मोतीलाल नेहरू को पकड़ा और इलाहाबाद के आनंद भवन में बैठ उनके जरिए यूपी के तमाम ब्राह्यण कर्ताधर्ताओं से संपर्क साधा। ब्राह्यणों में कौतुक बना, सनसनी हुई और पूरे प्रांत में, पूरे हिंदू समाज में अपने आप गांधी की बतौर संत मार्केटिंग होने लगी। इसी के साथ फिर अपनी बनिया चतुराई में मोतीलाल नेहरू के हाथ पर हाथ रख गांधी ने वचन दिया कि उनकी लड़ाई के राजा जवाहरलाल होंगे। फिर जो हुआ वह इतिहास है। अब जरा उस इतिहास की नकल में, पुनरावृत्ति में  नरेंद्र मोदी की दस साला राजनीति, मार्केटिंग- ब्रांडिंग-फिल्मांकन-लोकेशन में बनारस व धर्मकर्म कर्ता ब्राह्यण को रिझाने में जो कुछ हुआ है उस पर विचार करेंगे तो शीशे की तरह सब कुछ साफ होता जाएगा।

तो निष्कर्ष नंबर एक, कांग्रेस-विपक्ष को गांधी वाला हिंदू रूप धारण करना होगा। जात की राजनीति खेलते हुए भी ऊपर हिंदू दिखलाना होगा। मतलब हर वह कोशिश हो, जिससे हिंदू मानस में उनके हिंदूपने पर सवाल न उठे। मैं इस बात को शाहबानो की बहस के वक्त से लिखते आ रहा हूं कि कांग्रेस का हिंदू-मुस्लिम की इतिहासजन्य ग्रंथि को उभारना आत्मघाती होगा। इसका उभरना मुसलमान के वोट को खुश करने की दिखती कोशिशों से होगा। मंडलवादी नेताओं के फॉर्मूलों में कांग्रेस यदि मुस्लिम वोट को कोर वोट की तरह पालने लगी तो वह पांवों पर कुल्हाड़ी मारना होगा। दरअसल राजीव गांधी से कांग्रेस की राजनीति वीपी सिंह और मंडल राजनीति, मंडल नेताओं के कारण भटकी। यह कांग्रेस इतिहास का अहम-अबूझा सवाल है और सोनिया गांधी को कम से कम राहुल-प्रियंका को जवाब बताना चाहिए कि राजीव गांधी की सरकार में किसने अरूण नेहरू-अरूण सिंह को सत्ता से बाहर कराया। यदि अरूण नेहरू, फोतेदार राजीव गांधी के सलाहकार बने रहते तो न शाहबानो मामला होता और न वीपी सिंह कांग्रेस तोड़ पाते। अपने को लगता है अहमद पटेल का तब भी चुपचाप रोल था और बाद में मंडल के लालू, रामविलास जैसों के फॉर्मूलों के हवाले अहमद पटेल ने ही कांग्रेस को ब्राह्मणों की जगह मुसलमान को कोर वोट बनवा उसे दलित-ओबीसी राजनीति में नत्थी किया। सचमुच कई बार लगता है कांग्रेस की बरबादी और राजनीति में हिंदुत्व के हिंद केसरी बनने में अहमद पटेल का रोल इतिहासजन्य है कांग्रेस के भटकने-बिगड़ने, भाजपा को मौका देने वाली उसकी गलतियों के सवालों के जवाब या तो सोनिया गांधी के पास हैं या खुद अहमद पटेल के पास।

बहरहाल मैं भटक गया हूं। असल बात है राजीव गांधी के भटकने से कांग्रेस भटकी और पीवी नरसिंह राव ने संभालने की कोशिश की तो  सोनिया गांधी-अहमद पटेल ने ऐसा नहीं होने दिया। अर्जुन सिंह, फोतेदार, नारायण दत्त तिवारी ने मोहरा बन नरसिंह राव को दस तरह से परेशान किया। इस राजनीति में डॉ. मनमोहन सिंह के राज में पराकाष्ठा हुई जब उनके मुंह से कहलवाया गया कि देश की प्राकृतिक संपदा पर पहला हक अल्पसंख्यकों का है और हिंदू आंतक खतरनाक है!

जो हो, कांग्रेस को, विपक्ष को गांधी की तरह अनिवार्यतः हिंदू रंग में स्थायी तौर पर ढलना होगा। दूसरी बात वक्त यदि विपक्ष में रहने का है तो वह दमदार विपक्ष होने का पूरा दमखम दिखाए। तीसरी बात नरेंद्र मोदी और भाजपा के कंट्रास्ट में हिंदुओं के आगे निर्माण के भाखड़ा बांध की पुरानी तस्वीरों के हवाले भविष्य का स्लाइडशो दिखलाया जाए। सोचें, यदि मायावती-अखिलेश- प्रियंका तीनों मिल कर अपने एक्सप्रेसवे, अपने निर्माण, सत्ता की बटांईदारी में ब्राह्यण-दलित-यादव-मुसलमान आदि की संपन्नता का शो करके हिंदुओं से पूछें कि हमने क्या किया और योगी सरकार ने क्या किया तो समाज में नीचे तक यह क्या मैसेज नहीं बनेगा कि यह भी एक विकल्प है? इसमें पहली शर्त है विपक्ष पूरा एकजुट हो। दूसरी शर्त है हिंदू होते हुए हिंदू को दबंगी से कहें, समझाएं कि हम पढ़े-लिखे लोगों को तमाशा दिखा, उनसे तालियां बजवा, उनसे पैसा वसूल कर, उन्हें ठग कर झोला उठा चल देने वाले नहीं हैं, बल्कि हमने पाकिस्तान को ठोका है। हिंदुओं, हमारे कारण आजादी मिली है। हमने एक्सप्रेसवे बनाए हैं तो हिंदुओं को अमीर बना, उनके विकास-आर्थिकी के रिकार्ड बनाए न कि भारत को कंगला-बीमार बनाया। हम उदारवादी-लोकतंत्रवादी थे, हैं और रहेंगे और ये कंजरवेटिव-अमर्यादित थे, हैं और रहेंगे। हमने इन्हें भी बढ़ने दिया लेकिन ये हमारा खात्मा चाहते हैं तो हिंदुओं क्या ऐसा देश, ऐसा लोकतंत्र शोभा देगा? राम के  असली वारिस हम या ये?

ऐसी ही एप्रोच से अयोध्या के मोदी के आगे हिंदुओं से मर्यादा का जनादेश निकल सकता है। और वह बाकी धर्मों, मुसलमानों के लिए भी विश्वास, आस्था का हिंदू जनादेश होगा।

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