वाया अदालत

वाया अदालत

नरसिंह राव ने औजार अदालत को बनाया हुआ है। यानी सरकार की तरफ से कोशिश है कि कारसेवा अदालत के आदेशों का उल्लंघन लगे। अदालत से भाजपा का टकराव हो और उस बहाने कल्याण सिंह सरकार बरखास्त हो। भाजपा लड़ाई को राजनीतिक स्तर पर लड़ना चाहती है। इसलिए जब सुप्रीम कोर्ट में एडवोकेट जनरल ने हस्तक्षेप का आग्रह किया और रिसीवर की चर्चा हुई तो भाजपा के कोर ग्रुप की गुरुवार को कृष्णलाल शर्मा के घर पर अपराह्न में बैठक हुई। लालकृष्ण आडवाणी, सुंदर सिंह भंडारी, प्रमोद महाजन आदि तमाम नेता उपस्थित थे। सोचा गया कि किसी तरह छह दिसंबर तक सुप्रीम कोर्ट की एकतरफा कार्रवाई को रुकवाया जाए। यदि केंद्र को कोर्ट के आदेश के हवाले यूपी सरकार को बरखास्त करने का मौका दिया गया तो भाजपा जनता के बीच कैसे राजनीतिक लड़ाई लड़ सकेगी। यूपी सरकार से आए एक प्रारूप और वकील वेणुगोपाल की सलाह पर विचार हुआ। इस संकेत की भी चर्चा हुई कि शायद सोमवार-मंगलवार तक हाईकोर्ट की बैंच का निर्णय आ जाए। रणनीति तय हुई और लालकृष्ण आडवाणी, सुंदर सिह भंडारी ने राजेंद्र सिंह से बात की। विहिप नेताओं को इधर-उधर सलाह के लिए कहा गया। अंत में एक शपथ-पत्र बना, अब कोर्ट में उसे किसके साथ नत्थी करके दिया जाए, इस पर विचार हुआ। सो, स्वामी चिन्मयानंद के दस्तखत से पत्र बना।

शुक्रवार को पत्र सुप्रीम कोर्ट में पेश हुआ। माना गया कि विहिप और संघ झुक गए हैं। छह दिसंबर को अब कार सेवा नहीं कीर्तन सेवा होगी। भाजपा-संघ ने इसके असर का अनुमान लगाया हुआ है। पर चिंता इसलिए नहीं है कि जो प्रतिज्ञारत कारसेवक हैं वे छह दिसंबर तक अयोध्या पहुंच पाएंगे। कम से कम दो-तीन लाख कारसेवकों के तंबू लगे होंगे। अपनी सरकार बनी हुई होगी। टकराव के उद्वेलन में आम लोगों के अयोध्या की तरफ प्रवाह में भले कमी रहे, मगर सूचीबद्ध कारसेवक पहुंच चुके होंगे। तब तक सुप्रीम कोर्ट संतुष्ट हो चुका होगा। एकतरफा आदेश यानी केंद्र को कार्रवाई के निर्देश वाली स्थिति नहीं होगी। तब तक शायद हाई कोर्ट का 2.77 एकड़ क्षेत्र पर फैसला आ जाए। पर नहीं आया तब? इस पेंच को संघ-विहिप अभी नहीं सुलझा पाए हैं। दो-चार दिन कारसेवकों को घर लौटने के लिए तो नहीं कहा जाएगा। लौटने से विहिप की साख पैंदे में पहुंच जाएगी। साधु-संत छिटक पड़ेंगे और चंद्रास्वामी की बन आएगी। दलील यहीं है कि आठ-दस दिन तक भी हाई कोर्ट का निर्णय नहीं आता है तो सचमुच की कारसेवा शुरू होगी। तब अदालत से यह कहते हुए टकराया जा सकता है कि तब तक हम बंधे रहे? अपना मानना है कि नरसिंह राव अदालती घेरेबंदी के तरीके को अपनाएं रहेंगे। देखना है कि भाजपा नरसिंह राव की इस शातिर चाल से बच निकलते हुए कैसे दंगल का मैदान राजनीतिक बनवाती है? 29 नवंबर, 1992

घोषणा पत्र पर अमल?

नरसिंह राव की टकराव रणनीति कुछ गलतफहमियों पर आधारित है। जैसे एक यह कि भाजपा और विहिप के मंदिर मुद्दे की धार भोथरा गई है। अब मंदिर को लेकर पहले जैसा जुनून नहीं बनेगा। पादुका पूजन कार्यक्रम फ्लॉप हुआ या नहीं? देश में यह आम राय हो गई है कि मंदिर बने मगर मस्जिद भी रहे। दिल्ली के कुछ अखबारों के सर्वे ऐसी ही राय देते हैं। इसलिए कार सेवा रोककर सरकार विवादास्पद ढांचे के बगल में मंदिर बनवा दे तो भाजपा की जमीन खिसक जाएगी और जनता वाहवाही करने लगेगी।

समझ नहीं आता कि नरसिंह राव जैसे समझदार अनुभवी कैसे पादुका पूजन के आईबी आकलन, दिल्ली के अखबारी सर्वे और चंद्रास्वामी जैसे साधु-संतों के चक्कर में भावना पक्ष और अयोध्या की जमीनी वास्तविकताओं को भुला रहे हैं। सबसे पहला सवाल तो यह है कि जिस ढांचे के ठीक बीचों बीच पचास साल से मूर्ति, तस्वीर आदि रखी हुई है, क्या सरकार या सुप्रीम कोर्ट उन्हें वहां से हटवा सकती है? जो हिम्मत जवाहर लाल नेहरू या गोविंद वल्लभ पंत नहीं कर सके थे, क्या वह मौजूदा सरकार के बूते में है? यदि नहीं तो फिर भाजपा को क्यों संघर्ष और आगे बढ़ने का मौका दिया जा रहा है? और यदि उसी को गर्भगृह मानकर सरकारी ट्रस्ट से मंदिर बनवा कर अगल-बगल के दोनों गुंबदों की पुरानी मस्जिद बनाए रखना है तो वह विहिप के नक्शे का गर्भगृह क्या नहीं हुआ?

दरअसल नरसिंह राव का मानना है कि अभी 2.77 एकड़ पर कार सेवा होने देने का मतलब अगले चुनाव के वक्त फिर गर्भ गृह के मुद्दे पर भाजपा को राजनीतिक अवसर देना होगा। सो, क्यों न अभी सरकार सब कुछ अपने कब्जे में लेकर दो साल के भीतर सरकारी ट्रस्ट से मंदिर बनवा दे। यों सरकार और उसकी तरफ से भागदौड़ कर रहे मंत्री, नेता आदि कई तरह के विकल्प तैयार किए हुए हैं। प्रधानमंत्री दफ्तर के स्तर से जो मोटा खाका बनता है उसमें छह दिसंबर से पहले अदालत के निर्देश के हवाले कल्याण सिंह सरकार बरखास्त होगी। विधानसभा भंग नहीं होगी। अर्द्धसैनिक बलों की छावनी बनाकर कारसेवकों को अयोध्या में नहीं घुसने दिया जाएगा। तुरंत कुछ साधु-संतों के सहयोग से मंदिर के लिए एक ट्रस्ट बनेगा। जमीन अधिगृहित करेक बगल में मंदिर निर्माण शुरू हो जाएगा? दो साल में मंदिर बनवाकर नरसिंह राव कांग्रेस घोषणा पत्र के अनुसार मंदिर बचाने और मस्जिद बचाने का वायदा पूरा कर देंगे। 29 नवंबर, 1992

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