मंदिर बनवा दीजिए

बुधवार यानी नौ दिसंबर की शाम को राजेश पायलट के घर मुसलमान प्रतिनिधियों का जमावड़ा लगा हुआ था। जाफर शरीफ, सलमान खुर्शीद, अहमद पटेल को साथ बैठा कर पायलट ने डेढ़ घंटे मुसलमानों के विचार सुने। किसी ने कहा हम तो पहले दिन से ही आडवाणी-राव की मिलीभगत मानते रहे हैं। घटनाओं ने इसे सही साबित किया है। केंद्रीय सरकार है, जिसने वहां मंदिर बनवाया है। यूपी में छह बजे कल्याण सिंह ने इस्तीफा दिया। उसी के बाद अयोध्या में मंदिर बनना शुरू हुआ। मंदिर बनाने के लिए पूरे चलीस घंटे दिए। एक बूढ़े मुसलमान ने कहा- मुसलमान अब कभी कांग्रेस को वोट नहीं देंगे। मैं उम्र भर कांग्रेसी रहा। अब वोट नहीं दूंगा। पर कांग्रेस से मेरा जो लगाव रहा है उस कारण कह रहा हूं कि आप लोग वहां मस्जिद भूल जाएं और मंदिर बनवा दें। ताकि हिंदुओं का वोट तो मिले। (13 दिसंबर, 1992)

पीवी बनाम वीपी

नरसिंह राव और वीपी सिंह में क्या समानता है? यह सवाल लालकृष्ण आडवाणी की दोबारा अयोध्या यात्रा से उठा है। लालकृष्ण आडवाणी अब नरसिंह राव को वीपी सिंह से ज्यादा गुरू चीज मानने लगे हैं। वे स्वभाव के विपरीत नरसिंह राव के प्रति काफी तल्ख हो गए हैं। इसी कारण आर-पार के शक्ति परीक्षण का माहौल बन रहा है। वैसे दिल्ली के जानकार हलकों में अभी भी एक ऐसा वर्ग है जो नरसिंह राव और लालकृष्ण आडवाणी में मिलीभगत होने की धारणा पाले हुए है। अर्थात सब कुछ दोनों नेताओं की सोची-समझी योजना के अनुसार हो रहा है। इस थ्योरी अनुसार नरसिंह राव ने सुप्रीम कोर्ट को आगे करके सरकार की सख्ती का अहसास कराया। भाजपा ने झूठ-मूठ कीर्तन सेवा का वायदा कराकर अपने को झुका बताया और उसके ठीक बाद आडवाणी कारसेवा के लिए निकल पड़े। हाईकोर्ट के फैसले के आगे कारसेवा होने दी जाएगी। पर ऐसी समझदारी से यदि दोनों नेता राजनीति कर रहे हैं तो अभिनय का दादा फाल्के साहब अवॉर्ड नरसिंह राव और लालकृष्ण आडवाणी को सचमुच दिया जाना चाहिए।

अपने को यह थ्योरी नहीं जंचती। बीसवीं सदी के आखिरी दशक में इस तरह का अभिनय संभव नहीं है। बहरहाल, जनता दल नेता वीपी सिंह अकेले रीति-नीति गुनते-बुनते थे, वही शैली नरसिंह राव की भी है। लोगों को खूब सुनेंगे मगर बोलेंगे नहीं। वीपी सिंह की तरह नरसिंह राव भी सारा काम स्वयं करते हैं। वीपी सिंह के समय जनता दल और सांसद कटा हुआ अनभिज्ञ होता था। वहीं दशा अभी कांग्रेसजनों की है। गृहमंत्री और उनके मंत्रालय ने यूपी में राष्ट्रपति शासन की पूरी तैयारी कर ली मगर प्रधानमंत्री के मूड की अनभिज्ञता बनी रही। वीपी सिंह के समय मध्यस्थ और लोग जैसे दौड़ते थे वैसे अब भी दौड़ रहे हैं पर तब भी प्रधानमंत्री का निजी सूत्र नदारद होता था और अब भी वह नदारद है। सवाल है कि जैसे रेशम के कीड़े की तरह अकेले राजनीति गुनते-बुनते वीपी सिंह घायल हुए थे वैसी ही स्थिति में कहीं नरसिंह राव न पहुंच जाएं? (6 दिसंबर, 1992- यह 6 दिशंबर की सुबह छपा था और दोपहर में ढ़ांचे का ध्वंस हुआ।)

खांटी नरसिंह राव
कार्यसमिति की बैठक से निकला क्या? ‘एक्शन कार्यक्रम’ की बात फालतू है। कुछ नहीं होने जाने वाला है। समान विचार वाले दलों के साथ साझा मुहिम शक्ल नहीं ले सकेगी। कार्यसमिति की बैठक में ही पश्चिम बंगाल, केरल, महाराष्ट्र, पंजाब के नेताओं ने शंका प्रकट की। ममता बनर्जी के जो तेवर हैं, उससे तो अलग ‘बंगाल कांग्रेस’ की संभावना बनती है। बंगाल के नेता वाम मोर्चे के साथ कंधा नहीं मिलाएंगे। केरल में करुणाकरण, एंटनी, वायलार रवि ने उत्सुकता दिखाई, पर साथ में पूछा कि माकपा की राज्य ईकाई पहले मुस्लिम लीग को सरकार से हटाने की मांग कर रही है। कैसे इसे माना जा सकता है।
महाराष्ट्र के नेताओं का पूछना था कि पीडब्ल्यूपी जैसे दल अतिवादी हैं। इन्हें साथ करने के उलटे नतीजे होंगे। बूटा सिंह ने पंजाब में वामपंथियों के साथ तालमेल के नतीजों का जिक्र करते हुए पूछा कि उससे कितना फायदा हुआ? ज्यादातर वक्ताओं ने साझा मुहिम से अधिक यह सवाल किया कि मंदिर और मस्जिद का क्या होगा। इसी पर सब कुछ तय होना है। अंत में नरसिंह राव ने इसका जवाब दिया। कहना था- फिलहाल निश्चितता के साथ कुछ कहना मुश्किल है। एक तो हाईकोर्ट ने 2.77 एकड़ क्षेत्र के अधिग्रहण को खारिज कर दिया है। विवादास्पद ढांचे पर दावे को लेकर अदालतों में अलग-अलग मुकदमे हैं। बिना अदालती निर्णय के सरकार कैसे फैसले कर सकती है। भाजपा भले अदालतों मे नहीं बंधी हो, हम तो अदालत में बंधे हुए हैं। सरकार ने मस्जिद बनवाने का वायदा किया है। पर मस्जिद कब बनेगी और मंदिर को लेकर क्या करेंगे, इसका अभी दो टूक जवाब कैसे दिया जा सकता है? (27 दिसंबर, 1992)

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