तभी तो अदालत!

कई झटके लग गए, मगर नरसिंह राव के फैसलों की रफ्तार यथावत है। क्यों न कांग्रेसजन दुखी हों? अयोध्या में रामलला के दर्शन का मसला लें। चुपचाप आठ-दस दिसंबर को स्थानीय प्रशासन को संदेश चला जाता कि लोगों को धीरे-धीरे दर्शन की इजाजत दी जाए। निर्देश गया नहीं। भाजपा और साधु-संतों ने मुद्दा पकड़ लिया। भाजपा ने दर्शन की अनुमति की मांग को लेकर लोकसभा से वाकआउट किया। सार्वजनिक दबाव बनाया। गुरुवार को कांग्रेस प्रवक्ता को ही इस दबाव में कहना पड़ा कि शुक्रवार को सरकार निर्णय कर लेगी। पर कैबिनेट की राजनीतिक मामलों की कमेटी निर्णय नहीं कर सकी। अब अदालत पर फैसला छोड़ दिया गया है।

उधर भाजपा को आंदोलन के आह्वान का मौका मिल गया है। दर्शन की अनुमति का फैसला हर सूरत में होना है। अब कांग्रेसी यह पूछें कि नरसिंह राव भाजपा को लाभ पहुंचाने की स्थिति बना कर क्यों फैसला करते हैं, तो क्या जवाब होगा। इसी तरह बाइस दिसंबर को लोकसभा में प्रधानमंत्री के ये उद्गार थे कि राज्यपाल तक ने उन्हें गुमराह किया। आज छब्बीस तारीख हो गई है। वह राज्यपाल लखनऊ के राजभवन में अभी भी हैं। क्या तुरंत फैसला नहीं लिया जाना चाहिए था? (27 दिसंबर, 1992)

सोच नहीं सकते थे?

बाइस दिसंबर को लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव के खिलाफ जवाब देते हुए प्रधानमंत्री नरसिंह राव मस्जिद पुनर्निर्माण की बात गोल कर गए। हालांकि कई मुस्लिम सांसदों ने बहस के दौरान प्रधानमंत्री से मांग की थी। शुक्रवार को राज्यसभा में गृह मंत्री एसबी चव्हाण ने पुनर्निर्माण का दो टूक एलान किया था। असल में कांग्रेस के आला स्तर पर अब यह फैसला हो गया है कि मस्जिद को दोबारा बनाने की बात दोहराने से बचा जाए। शनिवार को अर्जुन सिंह से जब पूछा गया तो वे भी मस्जिद के सवाल को टाल गए। चौदह दिसंबर को कानपुर में माखनलाल फोतेदार ने सरकार की घोषणा को दोहराने की जगह इंसानियत के मंदिर और इंसानियत की मस्जिद बनवाने की बात कही। यानी आला स्तर पर मस्जिद पुनर्निर्माण की घोषणा को गलत माना जाने लगा है। काश! आठ दिसंबर को कैबिनेट की बैठक का सुझाव मान लिया होता।

हमने इस बात की खोज के लिए काफी सिर खपाया है कि आखिर मस्जिद पुनर्निर्माण का फैसला कैसे हुआ? फैसला आठ दिसंबर की सुबह की कैबिनेट में हुआ था। प्रधानमंत्री नरसिंह राव ने मस्जिद पुनर्निर्माण के निश्चय को मंत्रिमंडल के सामने रखा। जानकारों के अनुसार इससे मंत्रियों में सनसनी फैल गई। माखनलाल फोतेदार अपने को रोक नहीं पाए। कहना था- इस संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट से राय ले लेनी चाहिए। मनमोहन सिंह ने टोका। बोले, आप तो राजनीतिक मसलों को सुप्रीम कोर्ट के यहां देने की आलोचना करते रहे हैं। फोतेदार का जवाब था- इसलिए कि यह मसला अब बेहद संवेदनशील हो गया है। सरकार की तरफ से एलान का उलटा असर होगा। तभी प्रधानमंत्री नरसिंह राव का कहना था मुझे सांसदों की राय मिली है। सभी कह रहे हैं कि मस्जिद पुनर्निर्माण की तुरंत घोषणा होनी चाहिए। यह मेरा राजनीतिक फैसला है। इसके बाद कौन मंत्री अपनी सलाह दे सकता था। जो भी हो, माखनलाल फोतेदार की सलाह ऐतिहासिक थी। पता नहीं क्यों नरसिंह राव ने उसे तब गंभीरता से नहीं लिया? (27 दिसंबर, 1992)

कैसे हो रिहाई?

लालकृष्ण आडवाणी की रिहाई सरकार के बस में नहीं है। आठ दिसंबर को कैबिनेट की बैठक में किसी ने कहा था कि उन्हें भारतीय दंड संहिता में क्यों गिरफ्तार किया गया? एनएसए में गिरफ्तारी होनी चाहे ताकि जब चाहे तब छोड़ा जा सके। पीनल कोड से तो अदालत में मामला चला जाता है। सरकार ने जिन धाराओं पर भाजपाई नेताओं के खिलाफ मुकदमा बनाया है, उससे कार्रवाई लंबी खिंचती लगती है। ये नेता जमानत पर रिहा होने को तैयार नहीं हैं। वैसे भाजपा-संघ में भी एक बड़ा वर्ग लालकृष्ण आडवाणी के जेल में रहने से बेचैन है। संकट की इस घड़ी में आडवाणी बाहर रहकर नेतृत्व संभालें, इसकी अनेक भाजपाई आवश्यकता महसूस कर रहे हैं। मगर एक बार जब जमानत पर नहीं छूटने का निर्णय हो गया तो कैसे उसे बदला जाए? उधर सरकार भाजपा नेताओं की लंबी गिरफ्तारी से उनके बढ़ते भाव से परेशान है। उसे भी कुछ रास्ता नहीं सूझ रहा। इस सप्ताह माताटीला में जो सुनवाई हुई, उसमें सरकार की तरफ से दस गवाहों की सूची आई। इसमें से नौ ऐसे हैं, जिन्होंने लालकृष्ण आडवाणी का छह दिसंबर का भड़काने वाला भाषण सुना ही नहीं होगा। जाहिर है कि सरकारी केस खानापूर्ति वाला है। क्यों नहीं केस पुख्ता बनाने के लिए सरकार सीबीआई को लगाती? (3 जनवरी, 1993)

कुछ सूत्र (नवंबर में)

यों नरसिंह राव ने कभी अयोध्या मसले को सुलझाने का अपना दो टूक फार्मूला नहीं रखा। उनके मंत्री या दूत अवश्य गोलमोल हल सुझाते रहे हैं। पिछले दस दिनों के सूत्र ये हैं-

सर्वप्रथम चंद्रास्वामी ने सुशील मुनि के सामने सूत्र रखा। सरकार सौ करोड़ रुपए का ट्रस्ट बनाएगी। तिरुपति देवस्थान ट्रस्ट मदद करेगा। उद्योगपतियों से भी बात हुई है। ये दान देंगे। पर पहले विहिप और भाजपा को मंदिर निर्माण से दूर करें। मस्जिद के साथ बगल में मंदिर बनेगा।

नरसिंह राव के प्रेस सलाहकार पीवीआर प्रसाद के साथ पूर्व राष्ट्रपति वेंकटरमण की कोचिकोटी के शंकराचार्य से मुलाकात में भी एक सूत्र निकला। मस्जिद का एक गुंबद पुरातत्व विभाग के पास रहे और दो गुंबद विहिप को दिलाने के लिए सरकार तैयार है। कोचि कोटी के शंकराचार्य ने इस सूत्र पर वरिष्ठ शंकराचार्य प्रयाग राज वासुदेवन से बात की। उन्होंने परम हंस रामचंद्र को चिट्ठी भिजवा कर प्रधानमंत्री से बात करने के लिए कहा।

परमहंस रामचंद्र दिल्ली आए। प्रधानमंत्री से बात हुई। उन्होंने कहा कि मंदिर निर्माण संकल्प से राजनीति अलग हो जाए तो गर्भगृह तक मंदिर के लिए सरकार रास्ता साफ करा सकती है। फिलहाल 2.77 एकड़ पर कारसेवा करने दी जाएगी।

जाहिर है कि नरसिंह राव व उनके सलाहकार ढांचे में तीन में से एक गुंबद के नीचे। (जहां अभी पूजा होती है) गर्भगृह व मंदिर के लिए रजामंद हो सकते हैं बर्शर्ते कि विहिप, भाजपा और संघ का मंदिर से नाता टूट जाए। इसलिए टकराव की सूरत में नरसिंह राव सरकारी स्तर पर मंदिर बनवा सकते हैं। पहले चरण में बिना सरकार बरखास्त किए रिसीवर के सुपुर्द जमीन करवा दें। अर्द्धसैनिक बलों को ढांचे के आसपास बैठाकर कारसेवा नहीं होने देना दूसरा कदम होगा। महीने भर बाद ट्रस्ट से 2.77 पर मंदिर निर्माण शुरू कराने और 143 के तहत ढांचे पर सुप्रीम कोर्ट की राय का सूत्र निकले। अंत में एक गुंबद में गर्भगृह बनवाने का संकल्प हो। दिक्कत यह है कि ये सारे सूत्र और रणनीति भावनाओं के आगे टिक नहीं सकते। भावना के आगे सरकारी मंदिर निर्माण संता सिंह का अकाल तख्त बन जाता है। 29 नवंबर, 1992

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Shares