bjp narendra modi caste वजह चाहे संसद सत्र की मानें या पांच राज्यों के निकट आते
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झाग व जात में लौटी राजनीति!

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BJP Narendra Modi caste वजह चाहे संसद सत्र की मानें या पांच राज्यों के निकट आते चुनावों की, राजनीति उबलने लगी है। विपक्ष का संसद में सामूहिक दम बनाना और संसद को ठप्प करना इस दफा अलग तरह का है। समझ सकते हैं कि मध्यांतर याकि मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल के ढाई साल से पहले ही सरकार डिफेंसिव मोड में है। यों होना कुछ नहीं है और मोदी सरकार ठसके में वह सब करती रहेगी जो सात सालों से कर रही है। बावजूद इसके नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता के आगे विपक्ष पहले जिस लाचारगी में जीता हुआ था वह स्थिति बदल रही है। राहुल गांधी,  ममता बनर्जी,  शरद पवार, अरविंद केजरीवाल, लेफ्ट और छोटी पार्टियों में यह भरोसा बना है कि मोदी सरकार आर्थिकी, महंगाई, बेरोजगारी, महामारी आदि में फेल है वह इन मोर्चों पर वैसा कुछ भी नहीं कर सकती है, जिससे जनता में मोदी से उम्मीद या अच्छे दिन का ख्याल लौटे। इसलिए अब डरो नहीं लड़ो!

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इस मनोदशा को बनाने वाला एक कारण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा की प्रदेशों में दिखी घबराहट का भी है। राजनीतिक कार्यकर्ताओं और लोगों को समझ आया है कि उत्तराखंड में भाजपा ने क्यों तीसरी बार मुख्यमंत्री बदला? क्यों कर्नाटक में येदियुरप्पा की छुट्टी हुई? क्यों उत्तर प्रदेश में भाजपा आलाकमान और योगी में सब ठीक न होने की चर्चाएं चली हुई हैं और क्यों नरेंद्र मोदी को कैबिनेट की फेरबदल से पिछड़ी-ओबीसी जातियों के चेहरे भर कर यह हल्ला बनाना पड़ा कि कि देखो उन्होंने पिछड़ों का मंत्रिमंडल बनाया है!

सचमुच तीन महीनों में, कह सकते हैं कि पश्चिम बंगाल में चुनाव हारने के बाद नरेंद्र मोदी-अमित शाह और भाजपा व संघ परिवार में चुपचाप जितने परिवर्तन हुए हैं उस सबका सार है कि देश के हालातों से लोगों में मोहभंग हुआ है यह समझते हुए नरेंद्र मोदी ने आने वाले पांच विधानसभा चुनावों को जीतना चुनौतीपूर्ण माना हुआ है।

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तभी बतौर समाधान में व राजनीति-चुनाव को पहले जैसे कंट्रोल में लेने के लिए नरेंद्र मोदी ने नंबर एक नुस्खा जात को बनाया है। तय मानें कि फरवरी 2022 के विधानसभा चुनावों तक मोदी-शाह और भाजपा हर तरह से यह हल्ला बनवाएगी कि वह ओबीसी-पिछड़ा पार्टी है। और नरेंद्र मोदी हैं तो पिछड़ों के अच्छे दिन हैं! जमीनी सर्वेक्षणों और इसकी तमाम फीडबैक में भाजपा ने माना है कि हिंदू कार्ड और राष्ट्रवाद उसकी स्थायी पूंजी है। इसके चलते ब्राह्मण-राजपूत-बनिए मजबूरन यूपी में भाजपा को वोट देंगे। ब्राह्मण कितना ही हल्ला करें वे नरेंद्र मोदी के स्थायी भक्त और गुलाम बन गए हैं जबकि योगी आदित्यनाथ के कारण राजपूत भाजपा को वोट देंगे ही। इन दो फॉरवर्ड जातियों की हवा में बाकी फॉरवर्ड याकि बनिए, कायस्थ आदि भी बुरे दिनों के बावजूद योगी-मोदी का जयकारा लगाए रहेंगे। कमी और नाराजगी का मसला ओबीसी का है। ये वोट कहीं इधर-उधर न हो जाएं और जाट, यादव, मल्लाह, कुर्मी, राजभर आदि जातियों की गणित बनाने-बिगाड़ने वाली छोटी पार्टियों व जातियों को येन केन प्रकारेण पटाए रखना है। इसी पर भाजपा का सौ फीसद फोकस है।

तभी आजाद भारत के इतिहास में पहली बार हुआ जो केंद्र सरकार के कैबिनेट को न केवल जातिवादी बनाया गया, बल्कि उसका जातियों की संख्या के खुलासे से प्रचार भी हुआ। देश भर में हल्ला बनाया गया कि देखो केंद्र की सरकार ओबीसी वाली! मानों वह कम हो जो हर बात में अब केंद्र सरकार जात और आरक्षण की चर्चा करवा रही है। कल ही खबर थी कि केंद्र सरकार ने निर्णय लिया कि वह अपने खाते से मेडिकल दाखिले में ओबीसी आरक्षण लागू कर रही है।

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इस एप्रोच से विपक्ष को समझ आ रहा है कि नरेंद्र मोदी का निजी जादू खिसक रहा है। हिंदू राष्ट्रवाद के पंरपरागत भक्त, फॉरवर्ड जातियां सोचनी लगी हैं कि उनसे धोखा हुआ है? लोगों के जीने की तकलीफ नाराजगी बनाने वाली है। मोदी सरकार के बस में अब कुछ संभव नहीं है। इसलिए संसद सत्र का मौका आया और उसमें भारतीयों की विदेशी इजराइली कंपनी द्वारा थोक में जासूसी का विस्फोट हुआ नहीं कि विपक्ष ने इसी मुद्दे पर आर-पार की लड़ाई बना डाली। हिसाब से पेट्रोल के दाम, महंगाई, बदहाल आर्थिकी और महामारी, किसान संकट अधिक गंभीर मसले हैं। इन्हीं के हवाले विपक्ष को सरकार को घेरना था। पर विपक्ष ने जासूसी कांड पर विरोध का झाग बनाया।

भाजपा और नरेंद्र मोदी जात राजनीति करते हुए तो विपक्ष की जासूसी कांड के झाग से सरकार की घेरेबंदी। पता नहीं अक्टूबर याकि सरकार के मिडटर्म तक दोनों से क्या गुल खिले और यूपी विधानसभा चुनाव की जमीन कैसी तैयार हो? मोटे तौर पर इतना भर तय मानें कि राजनीति बदल रही है और विपक्ष को तोड़ने, मारने, डराने की मोदी-शाह की एप्रोच बंगाल के चुनाव बाद फुस्स है। विपक्ष का हौसला बढ़ता हुआ है।

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By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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