पर इससे बनेगा क्या?

अगर दुनिया के नेताओं के रास्ते पर चलते हुए भारत में मोदीजी अपनी सत्ता स्थायी कर लेते हैं या देश में संसदीय प्रणाली की जगह राष्ट्रपति प्रणाली लागू हो जाती है और मोदीजी अगले दस-बीस साल के लिए राष्ट्रपति बन जाते हैं या संविधान की समीक्षा करके उसे बदल दिया जाता है तब उससे क्या बनेगा? क्या भारत फिर सोने कि चिड़िया बन जाएगा? क्या भारत अमेरिका, चीन और रूस की तरह महाबली देश बन जाएगा? क्या भारत की गरीबी मिट जाएगी? सरकार जिन 80 करोड़ लोगों को पेट भरने के लिए छह किलो अनाज दे रही है वे अमीर हो जाएंगे? कोरोना का शिकार होकर जो हजारों लोग मर रहे हैं उनका मरना रूक जाएगा? 12-14 करोड़ जिन लोगों की नौकरी और रोजगार गई है क्या उन सबको फिर से काम मिल जाएगा? क्या देश में रामराज्य आ जाएगा? क्या यह सब कुछ सिर्फ इस इंतजार में रूका है कि मोदीजी की सत्ता स्थायी हो?

शी जिनफिंग ने अपनी सत्ता स्थायी बनाने से पहले चीन और उसकी अर्थव्यवस्था को इसके लिए तैयार किया। उन्होंने चीन को दुनिया की फैक्टरी बना दिया। आज दुनिया भर के देशों की आर्थिकी चीन पर निर्भर है। भारत के पड़ोसी एशियाई देशों से लेकर सुदूर अफ्रीका में और दुनिया के सबसे महाबली देश अमेरिका में भी ज्यादातर निर्माण गतिविधियों और आम जरूरत की चीजों के लिए लोग चीन पर निर्भर हैं। इसी तरह पुतिन ने रूस का कायाकल्प किया। बिखरने के बाद से ही रूस किसी तरह से रेंग रहा था पर पुतिन ने उसे पैरों पर खड़ा किया। देश की आर्थिक और सामरिक हैसियत लौटाई। यूक्रेन के साथ युद्ध करके क्रीमिया पर कब्जा किया और उसे अपने देश में मिलाया। अमेरिका की परवाह किए बगैर सीरिया में दखल दिया और वहां की बसर अल असद सरकार को मदद की। अपने सैनिक अभियानों के बीच कोरोना वायरस के लिए वैक्सीन बनाने वाला पहला देश भी रूस ही बना है।

क्या भारत में मोदीजी ऐसा कर सकते हैं? क्या वे पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर वापस हासिल करेंगे? उनकी कमान में भारत हर मंच पर आतंकवाद का मुद्दा उठा रहा है क्या आतंकवाद की फैक्टरी यानी अफगानिस्तान में फौज भेज कर अलकायदा व तालिबान को खत्म करने का प्रयास कर सकते हैं, जैसे अमेरिका ने इस्लामिक स्टेट के खिलाफ किया? क्या शी जिनफिंग की तरह कोरोना रोक पाएंगे? क्या भारत को दुनिया की फैक्टरी बनाने का काम कर पाएंगे?

अगर कोई इसका जवाब सकारात्मक देता है तो उससे पूछना चाहिए कि फिर छह साल में किया क्यों नहीं? छह साल की उनकी सत्ता भी निर्बाध रही है। किसी विपक्ष की चुनौती नहीं थी और न जनता के भरोसे में कोई कमी थी। जनता ने उनके पहली बार पूर्ण बहुमत दिया और पांच साल के राज के बाद पहले से भी ज्यादा बहुमत दिया। इसके बावजूद जनता को क्या मिला? सरकारी आंकड़ों के मुताबिक ही कोरोना वायरस का संक्रमण फैलने के दौरान एक करोड़ छह लाख मरते-खपते अपने घर लौटे, जिसमें रास्ते में 49 हजार से ज्यादा लोगों की मौत हो गई। करोड़ों लोगो ने रोजगार गंवा दिए। लॉकडाउन से कोरोना का संक्रमण नहीं रूका, बल्कि अर्थव्यवस्था की गाड़ी रूक गई। भारत सोने की चिड़िया बनने की बजाय कंगाली के रास्ते पर बढ़ गया। तभी सवाल है कि जब छह साल तक निर्बाध राज के दौरान भारत की किस्मत बदलने जैसा कुछ नहीं दिखा तो क्या उम्मीद की जा सकती है कि सत्ता स्थायी करने, राष्ट्रपति शासन लगाने, एक साथ चुनाव करा कर सारे देश में सरकार बना लेने या केंद्र में सर्वाधिकारवादी सरकार बना लेने के बाद देश की किस्मत बदल जाएगी?

नहीं बदलेगी। क्यों? इसका जवाब मंद-कुंद हिंदू बुद्धी का समझ नहीं आ सकता है। इतना भर जाने कि देश की किस्मत लोगों की सामूहिक बुद्धि, चेतना, उत्साह, साहस, निर्भयता और समर्पण से बदलती है। पर भारत में लोगों में इन गुणों व बुद्धी का अभाव है और यह यथा राजा तथा प्रजा दोनों स्तर पर है।

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