महानगरों को खाली कराना होगा - Naya India
हरिशंकर व्यास कॉलम | गपशप| नया इंडिया|

महानगरों को खाली कराना होगा

भारत सरकार और राज्यों की सरकारें भी अगर कोरोना वायरस के संक्रमण को फैलने से रोकना चाहती है तो सबसे पहले महानगरों में रह रहे प्रवासियों की समस्या पर ध्यान देना होगा। देश के छोटे-बड़े सभी शहरों में और खास कर महानगरों में लाखों की संख्या में प्रवासी लोग रहते हैं। दूसरे राज्यों के मजदूर झुग्गी-झोपड़ी कॉलोनियों में रहते हैं। ऐसी कॉलोनियों में तमाम बुनियादी सुविधाओं की कमी है। दिल्ली के महिपालपुर की झुग्गी की कहानियां राष्ट्रीय मीडिया में आई हुई हैं। वहां झुग्गी-झोपड़ी कॉलोनी में पानी नहीं है। ध्यान रहे इस वायरस के संक्रमण के लिए साफ-सफाई और हाथ धोते रहना सबसे पहली जरूरत है पर लोगों के पास पीने का पानी नहीं है तो लोग सफाई क्या करेंगे।

जाहिर है कि अगर सफाई के लिए पानी नहीं मिला को वायरस का संक्रमण बढ़ेगा। ऐसी अनगिनत झुग्गियां हैं और सबमें इसी तरह की कहानी है। इन झुग्गियों में दस गुणा दस या 12 गुणा 12 की झोपड़ी में पूरा परिवार रहता है। चार-पांच लोगों का परिवार इतनी छोटी जगह में है, यह अपने आप में स्वास्थ्य के लिए बड़ा खतरा है। अगर कोरोना जैसा संक्रमण फैला हो तो इसका खतरा कितना बढ़ जाता है, यह समझा जा सकता है। पुलिस इन झुग्गियों के बाहर बैठी है और निगरानी कर रही है कि लोग लॉकडाउन का पालन करें। लोगों को घरों से निकलने से रोका जा रहा है। पर इतने छोटे-छोटे घरों में कितनी देर तक लोगों को रोका जा सकता है? ऊपर से अगर ऐसी किसी झुग्गी में वायरस का संक्रमण हो गया तो अचानक संख्या कितनी बढ़ जाएगी, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। दिल्ली में मोहल्ला क्लीनिक के डॉक्टर के कोरोना वायरस से संक्रमित होने की घटना से भी इस खतरे को समझा जा सकता है।

झुग्गियों में रहने वाले खुद भी अपनी मुश्किलों को समझ रहे हैं इसलिए उन्होंने अपनी ओर से पहल करके घर लौटना शुरू किया। पर लॉकडाउन की वजह से उनका लौटना मुश्किल है। ट्रेनें, बसें सब बंद हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जो मजदूर दिल्ली में या एनसीआर में थे वे पैदल ही अपने घर को चले गए। अलीगढ़ से लेकर मेरठ, मुरादाबाद, हापुड़ और उससे भी आगे तक लोग पैदल चल कर गए हैं। राष्ट्रीय मीडिया में कोरोना वायरस के इलाज से ज्यादा इन प्रवासियों के लौटने के किस्से चर्चा में रहे। कैसे एक रिक्शावाला अपने रिक्शे से ही बिहार के अपने गांव की ओर निकल गया या कैसे एक व्यक्ति अपने बच्चे को कंधे पर बैठाए बिना खाए-पिए 80 किलोमीटर दूर अलीगढ़ के अपने गांव पहुंचा। ऐसी मानवीय कहानियों की भरमार है। पर यह समझना चाहिए कि यह एक बड़ी लड़ाई से डिस्ट्रैक्शन की तरह है। सरकार और हर नागरिक को कोरोना वायरस के खिलाफ लड़ना है।

उसके लिए जरूरी है कि राजधानी दिल्ली सहित देश के तमाम महानगरों की झुग्गियां खाली कराई जाएं। ज्यादा से ज्यादा लोगों को उनके घरों तक पहुंचाने का बंदोबस्त किया जाए। सरकारें विशेष बसों की व्यवस्था करके उन्हें घर भेज सकती है या जिस तरह सामान की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए मालगाड़ियां चलाई जा रही हैं वैसे ही विशेष यात्री गाड़ियां चला कर लोगों को उनके घरों तक पहुंचाया जाए। आखिर सरकार ने दुनिया भर में विशेष विमान भेज कर वहां फंसे भारतीयों को निकाला ही है। उसी तरह विशेष व्यवस्था करके लोगों को उनके घरों तक भेजा जाए। लोग भी ऐसा ही चाहते हैं। वे महानगरों की मुश्किलों से परिचित हैं। उनको पता है कि संकट बढ़ेगा तो सरकार चाहे जितनी व्यवस्था करे वह कम पड़ेगी। अगर यह संकट लंबा चल गया, जिसकी बहुत संभावना है तो उनकी मुश्किलें और बढ़ेंगी। सो, सरकार को चाहिए कि विशेष बसों की व्यवस्था करे और जो जाना चाहे उसे भेजे। बसों में बैठने से पहले उनकी थर्मल स्क्रीनिंग की व्यवस्था हो और जिसमें भी बुखार या दूसरी बीमारी के लक्षण दिखें उसे रोक लिया जाए और बाकी लोगों को भेज दिया जाए। वहां पहुंचने पर भी उनकी जांच की व्यवस्था हो और अगर रास्ते में किसी को लक्षण विकसित हुए हों तो सबको वहां आइसोलेशन में रख कर जांच और इलाज किया जाए। ध्यान रहे लोगों के लिए अपने घर-गांव में बुनियादी सुविधाओं की व्यवस्था करना आसान है।पर इतने छोटे-छोटे घरों में कितनी देर तक लोगों को रोका जा सकता है? ऊपर से अगर ऐसी किसी झुग्गी में वायरस का संक्रमण हो गया तो अचानक संख्या कितनी बढ़ जाएगी, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। दिल्ली में मोहल्ला क्लीनिक के डॉक्टर के कोरोना वायरस से संक्रमित होने की घटना से भी इस खतरे को समझा जा सकता है।

 

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

ट्रेंडिंग खबरें arrow
x
न्यूज़ फ़्लैश
‘वीर बाल दिवस’ से ऐतिहासिक भूल सुधार