Climate change flood drought बरबादी साक्षात, फिर भी खबर नहीं!
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बरबादी साक्षात, फिर भी खबर नहीं!

उफ! भारत और उसके 140 करोड़ लोग। लोग जलवायु परिवर्तन, आपदाओं-बीमारियों में मर रहे हैं, बरबाद हो रहे हैं लेकिन न खबर लेने और देने वाले और न ही घटनाओं की अखबार-टीवी चैनलों पर पहली खबर! सोचें, देश का महानगर बेमौसम बारिश में डूबा रहा लेकिन पहले पेज की हेडलाइन नहीं। कहते हैं उत्तराखंड इस वर्ष हिमखंड टूटने, भू स्खलन, बेमौसम बारिश में इतनी जानें गंवाए हुए है मगर खबरें अखबारों के भीतर छोटी, बिखरी, दबी हुई। उत्तर भारत डेंगू, टायफायड, मलेरिया जैसी बीमारियों का ऐसा अस्पताल बना हुआ है कि मुझे एक दिन बुखार हुआ तो डॉक्टर ने तुरंत कहा ब्लड टेस्ट करवा लें क्योंकि हवा में दसियों बीमारियां हैं। ऐसे ही दिल्ली और एनएसीआर गैस चैंबर में कन्वर्ट है, जबकि चैनल और अखबार मोदी-योगी-कंगना रनौत की सुर्खियों से भरे हुए। Climate change flood drought

गौर करें पिछले दस दिनों या नवंबर में टीवी चैनलों के प्राइम टाइम की खबरों और बहस को या अखबारों के छपे पहले पेजों को। क्या चेन्नई-तमिलनाडु में अतिवर्षा-महानगर के बाढ़ में लोगों के डूबे रहने, उनकी तकलीफ को जतलाने वाली खबरें थीं? फिर केरल में अतिवर्षा की बरबादी तो उसका भी जिक्र भर? ऐसे ही उत्तराखंड में अचानक बारिश और भू स्खलन की घटनाएं व बरबादी भी आई-गई। ठीक विपरीत इस सप्ताह कनाडा के वैंकूवर में मौसम परिवर्तन की आकस्मिक बाढ़, आपदा की घटना हुई। दुनिया के टीवी चैनलों, कनाडा के अखबारों ने खबर को पहले पेज पर बैनर हेडिंग बनाया। कनाडा के लोगों ने जाना कि जलवायु परिवर्तन की कैसी मार। ऐसे ही अमेरिका, जापान, यूरोप, चीन और तटीय देशों में जलवायु परिवर्तन-प्रदूषण की बरबादियों की खबरें भी बड़ी सुर्खियों के साथ। लेकिन भारत (दुनिया का तीसरा बड़ा ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन वाला, उसमें बरबाद होता, हिमालय में भू स्खलन, ग्लेशियर पिघलने, समुद्री तूफानों की बेइंतहां बढ़ती संख्या, बाढ़, लू-बिजली गिरने जैसी घटनाओं की मौतों) तमाम प्राकृतिक बरबादियों का अनुभव करते हुए भी जान-माल का नुकसान लोगों को बताता हुआ नहीं।

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क्यों? क्योंकि मोदी सरकार को जनता के आगे पॉजिटिव खबरें बनवाए रखनी हैं। अखबारों के पहले पेज में, टीवी चैनलों के प्राइम टाइम में वहीं होगा, जो प्रधानमंत्री दफ्तर के फोन से टीवी चैनलों, अखबारों, खबर एजेंसियों को कहा जाएगा। हां, समाचार एजेंसियों से अब विपदाओं, महामारियों की बरबादी की समग्र रपटे प्रसारित नहीं होतीं। छोटे आकार की सूचना मात्र। कोई मीडिया हाउस क्लाइमेट चेंज की ग्राउंड रिपोर्टिंग कराता ही नहीं। तभी मेरे जैसे छोटे संपादक या ‘नया इंडिया’ जैसा अखबार चाहे तो भी छाप नहीं सकता कि महानगर चेन्नई याकि दक्षिण के राज्य बेमौसम की बाढ़ में यदि डूबे हैं तो ओवरऑल कैसे पहले पेज पर बड़ी खबर बने। कनाडा के वैंकुवर की विनाश की खबर जानना-छापना संभव है लेकिन चेन्नई, केरल या उत्तराखंड का विनाश बताना संभव नहीं।

क्या आपको पता है पिछले साल भारत को प्राकृतिक आपदाओं से कितना नुकसान हुआ? एक यूएन रिपोर्ट के अनुसार कोई 87 अरब डॉलर का। पिछले दस सालों में हर साल जान-माल के विनाश का आकंड़ा बढ़ता हुआ है। निःसंदेह जलवायु परिवर्तन से अमेरिका, कनाडा, चीन जैसे विकसित देश भी विनाश झेलते हुए हैं पर उन्होंने लोगों को बचाने, हर्जाना देने, तुरत-फुरत बसा लेने के प्रबंध किए हुए हैं। कनाडा या जर्मनी के इलाके डूबते हैं तो बीमा कंपनियों से तुरत-फुरत भुगतान, महीने-दो महीने में सब कुछ नॉर्मल बनवाने की व्यवस्थाएं विकसित हैं।

और भारत में? गरीब की झोपड़ी उड़ गई, कच्चा-पक्का मकान डूब गया, घर-गृहस्थी का साजो-सामान बरबाद, दुकान-धंधा बरबाद हुआ, घर के सदस्य मरे तो जो आपदा प्रबंधन तीस-चालीस साल पहले होता था वहीं होगा। मतलब फेंके गए खाने के पैकेट और अनाज, राशन। एक रपट के अनुसार पिछले साल चक्रवात अम्फान से कोई 25 लाख लोग बुरी तरह प्रभावित हुए। उनका पुनर्वास कैसे हुआ, इसका कोई पता नही। कहते हैं केदारनाथ की 2013 की आपदा के बाद सन् 2021 का साल उत्तराखंड में सर्वाधिक विनाश वाला है। यदि वहा इंफ्रास्ट्रक्चर, लोगों की संपदा, भू स्खलन के मामलों में सोचें तो शायद 2013 से भी भयावह नुकसानदायी वर्ष। मगर देश ने 2013 के विनाश की खबर रियलिटी अनुसार देखी-जानी पर 2021 में उत्तराखंड में हो रहे विनाश की सच्चाई क्या जाहिर है?

तभी गजब है। मौत, बरबादी और विनाश सब भारत में अब बिना अर्थ के हैं। इसे भी लोग और देश नजरअंदाज करते हुए। इसलिए क्योंकि सरकार को नहीं चाहिए नकारात्मकता-निगेटिविटी। 140 करोड़ भेड़-बकरियों को सिर्फ और सिर्फ हरा-भरा, अच्छे दिन, सकारात्मकता-पॉजिटिविटी, सुबह अखबार के साथ गुड मार्निंग और रात को टीवी चैनल के प्राइम टाइम के साथ गुड नाइट चाहिए!

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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