स्वास्थ्य से साथ खिलवाड़ - Naya India
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स्वास्थ्य से साथ खिलवाड़

कोरोना वायरस का संक्रमण पूरी दुनिया में फैला लेकिन दुनिया के दूसरे किसी देश में लोगों के स्वास्थ्य के साथ ऐसा खिलवाड़ नहीं हुआ, जैसा भारत में हुआ। भारत संभवतः एकमात्र देश था, जिसने इलाज का कोई प्रोटोकॉल तैयार नहीं किया। सरकार के मुख्य वैज्ञानिक सलाहकार से लेकर कोराना से मुकाबले के लिए बनी टास्क फोर्स, नीति आयोग, वैक्सीनेशन की टास्क फोर्स आदि किसी ने यह नहीं बताया कि इलाज किस तरह से होना है। कहा जा सकता है कि इस वायरस का इलाज किसी के पास नहीं था तब भी कम से कम यह तो समझाया जा सकता था कि लोगों को इलाज के दौरान किस तरह की दवाएं नहीं देनी हैं।

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यह प्रोटोकॉल तय नहीं हुआ उसी का नतीजा है कि सारी दुनिया, जहां कोरोना से लड़ रही है वहीं भारत कोरोना के साथ साथ ब्लैक, व्हाइट और यलो फंगस की बीमारी से भी लड़ रहा है। यह इलाज के गलत प्रोटोकॉल की वजह से हुआ। भारत में वायरस की पहली लहर के समय ही समझा दिया गया कि सांस की बीमारी का इलाज स्टेरॉयड है। स्टेरॉयड की जरूरत उन्हीं मरीजों को होती है, जिनको ऑक्सीजन की जरूरत पड़ती है, लेकिन भारत में वायरस का संक्रमण शुरू होते ही स्टेरॉयड दिया जाने लगा। इसकी वजह से लोगों का ब्लडप्रेशर और सुगर बढ़ने लगा। शरीर की इम्युनिटी इतनी कमजोर हो गई कि हजारों लोग फंगल इंफेक्शन का शिकार हो गए। दुनिया में और कही ऐसा नहीं हुआ। आज राजधानी दिल्ली में 11 सौ से ज्यादा लोग फंगल इंफेक्शन के मरीज हैं। यह बीमारी कैसी घातक है इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि दिल्ली में सिर्फ 92 लोग अभी तक इस बीमारी से ठीक हुए हैं और 89 लोगों की मौत हुई है। यानी मरने वाले और ठीक होने वाले का औसत लगभग बराबर है। देश में फंगल इंफेक्शन के मरीजों की संख्या 20 हजार के करीब पहुंच गई है।

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ऐसे ही भारत में इलाज के प्रोटोकॉल में जबरदस्ती एंटी बायोटिक को शामिल किया गया है। दुनिया के ज्यादा सभ्य देशों में एंटी बायोटिक नहीं दी गई। वहां वैसे भी एंटी बायोटिक का इस्तेमाल कम होता है ताकि लोगों के अंदर उसके लिए प्रतिरोधी क्षमता न पैदा हो। लेकिन भारत में इसका ख्याल किए बगैर करोड़ों लोगों को एंटी बायोटिक दी गई। घर में आइसोलेशन में रह कर इलाज कर रहे लोगों ने भी एजिथ्रोमाइसिन और डॉक्सीसीलिन जैसे दवा ली। दुनिया के वैज्ञानिकों का कहना है कि एजिथ्रोमाइसिन ऐसी दवा है, जो दिल के धड़कन का पैटर्न हमेशा के लिए बदल सकती है, जो लाखों लोगों के लिए घातक हो सकता है। सो, इलाज की वजह से जो लोग ठीक हो गए हैं वे अपने को सुरक्षित नहीं मान सकते हैं। हाइड्रोक्सीक्लोरोक्विन और आइवरमेक्टिन जैसी दवा दी जाती रही और अब भी इसे इलाज के प्रोटोकॉल से बाहर नहीं किया गया है।

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भारत में बिना सोचे-समझे और बिना किसी वैज्ञानिक तथ्य के रेमडेसिविर दवा का इस्तेमाल होने लगा। डॉक्टर इसे जीवनरक्षक दवा बताने लगे और इसका नतीजा यह हुआ कि पांच हजार के दवा 50-50 हजार रुपए में बिकी। लोगों की जान कितनी बची वह शोध का विषय है पर दवा खोजने और खरीदने में हजारों परिवार आर्थिक रूप से बरबाद हो गए। वैज्ञानिकों का मानना है कि इस दवा का असर तभी होता है, जब मरीज को बाकी इलाज समय से और सही तरीके से मिल रहा हो। वह भी फायदा इतना ही होता है कि अस्पताल में भरती रहने के औसत समय में थोड़ी कमी इसकी मदद से हो सकती है।

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दुनिया अभी शोध ही कह रही है कि भारत में डीआरडीओ की 2-डीजी नाम से एक दाव जोर-शोर से लांच कर दी गई है। इस दवा का क्लीनियक ट्रायल का डाटा भी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है। लेकिन भारत में धड़ल्ले से इसका इस्तेमाल शुरू हो गया। ठीक उसी तरह से जैसे कोरोना की पहली लहर में पतंजलि समूह की ओर सो कोरोनिल दवा लांच की गई थी। बाद में जब इस पर विवाद हुआ तो कहा गया कि इम्युनिटी बढ़ाने में यह दवा मददगार है। सो, इलाज का सही प्रोटोकॉल नहीं होने की वजह से हजारों लोगों की जान गई औऱ लाखों या करोड़ों लोगों का जीवन खतरे में डाल दिया गया है।

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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