• डाउनलोड ऐप
Sunday, April 18, 2021
No menu items!
spot_img

कनकॉर की रहस्यमय कथा

Must Read

हरिशंकर व्यासhttp://www.nayaindia.com
भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था।आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य।संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

कनकॉर यानी कंटेनर कारपोरेशन ऑफ इंडिया भारतीय रेलवे की एक ईकाई है। भारत सरकार इसे बेचने जा रही है। आमतौर पर जब कोई निजी कंपनी शेयर बाजार में जाती है या कंपनी का मालिक उसे बेचने का फैसला करता है उस कंपनी की सेहत अच्छी की जाती है, बाजार में उसके शेयर का भाव बढ़वाया जाता है ताकि अच्छी कीमत मिले। लेकिन कनकॉर के मामले में भारत सरकार ने बिल्कुल उलटा किया है। सरकार ने ऐसा काम किया है, जिससे इसकी कीमत बुरी तरह से कम हुई है।
पिछले साल कोरोना वायरस की महामारी के बीच भारतीय रेलवे ने अपनी जमीन किराए पर देने की फीस यानी लैंड लीजिंग फी के नियम में बदलाव किया। कंटेनर कॉरपोरेशन भारतीय रेलवे की ही कंपनी है इसके बावजूद यह नियम उस पर भी लागू हुआ। पहले कंटनेर कारपोरेशन कंटेनर के आकार के हिसाब से किराया चुकाता था लेकिन नए नियमों के मुताबिक उसे जमीन की कीमत के छह फीसदी के बराबर पैसा पहले साल चुकाना है और उसके बाद हर साल इसमें सात फीसदी की बढ़ोतरी होगी। इस बदलाव का नतीजा यह हुआ है कि कंटनेर कारपोरेशन ने जहां 2019-20 में रेलवे को कुल 120 करोड़ रुपए का किराया दिया था वहीं उसे इतनी रकम वित्त वर्ष 2020-21 की पहली तिमाही में ही चुकानी पड़ी। यानी उसका किराया चार गुना बढ़ गया। इसका नतीजा यह हुआ है कि कंटेनर कारपोरेशन की पहली तिमाही का मुनाफा 73 फीसदी घट गया। इसके साथ ही शेयर बाजार में इसके शेयरों की कीमत में भी बड़ी गिरावट हुई। भारत सरकार ने नवंबर 2019 में इस कंपनी को बेचने का फैसला किया था, तब इसकी कीमत 11 हजार करोड़ रुपए थी, जो अक्टूबर 2020 में गिर कर 72 सौ करोड़ हो गई है। यानी कंपनी को पूंजी बाजार में चार हजार करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है।

देश के लॉजिस्टिक कारोबार के दो-तिहाई हिस्से पर कनकॉर का नियंत्रण है। इनलैंड कारोबार यानी समुद्र और हवाई मार्ग से इतर जमीन के रास्ते होने वाले कारोबार में इस कंपनी का वर्चस्व इसलिए है क्योंकि इसके पास 64 इनलैंड डिपो हैं, जिनमें से 25 डिपो रेलवे की जमीन पर हैं। इसमें दिल्ली के दो बड़े डिपो भी शामिल हैं। तुगलकाबाद और दादरी में दो बड़े डिपो हैं, जो रेलवे की जमीन पर हैं। इस बीच खबर आई है कि भारत सरकार चाहती है कि कनकॉर रेलवे के डिपो की जमीन खरीदे। रेलवे की जमीनों को बेच कर पैसा कमाने का फैसला सरकार ने किया हुआ है पर सवाल है कि जिस कंपनी को सरकार बेचने जा रही है उस कंपनी को क्यों नई संपत्ति खरीदने को कहा जा रहा है?

जानकार सूत्रों के मुताबिक कनकॉर ने जमीन खरीदने से इनकार किया है। उसका कहना है कि उसके पास इतने पैसे नहीं हैं कि वह रेलवे की जमीन खरीदे। यह भी कहा जा रहा है कनकॉर ने लैंड लीजिंग फी के नियम बदले जाने के बाद रेलवे की जमीन से डिपो हटाने का भी इरादा किया था। इस बीच उसे रेलवे की जमीन खरीदने को कहा गया है और यह भी कहा गया है कि अगर उसके पास पैसे नहीं हैं तो वह बैंकों और दूसरी वित्तीय संस्थाओं से कर्ज लेकर जमीन खरीदे। दो सरकारी कंपनियों के बीच अगर जमीन का सौदा होता है तो जमीन की कीमत कम होगी, वह सौदा जमीन के बाजार रेट की बजाय सर्किल रेट पर होगा और कनकॉर को बैंकों से कर्ज भी आसानी से मिल जाएगा। और जब कंपनी बिकेगी तो पूरा असेट निजी कंपनी को ट्रांसफर हो जाएगा।

यह लंबी कहानी इसलिए बता रहा हूं क्योंकि खबर है कि लॉजिस्टिक के क्षेत्र में काम कर रही सबसे बड़ी निजी कंपनी अडानी समूह कनकॉर को खरीदने में दिलचस्पी ले रही है। ध्यान रहे अडानी समूह का पहले से जलमार्ग और वायुमार्ग के परिवहन पर नियंत्रण हो गया है। अगर अडानी समूह कनकॉर को खरीदता है तो सड़क और रेलमार्ग से होने वाले परिवहन के बड़े कारोबार पर उसका नियंत्रण हो जाएगा। उसे रेलवे की जमीन पर और दूसरी जगहों पर बने हुए बड़े डिपो मिल जाएंगे और जमा जमाया कारोबार मिल जाएगा। पिछले दिनों अडानी समूह को गुजरात के सानंद में बन रहे देश के सबसे बड़े लॉजिस्टिक हब का ठेका मिला है। कनकॉर के साथ साथ भारत सरकार शिपिंग कारपोरेशन ऑफ इंडिया को भी बेचने जा रही है। इन दोनों कंपनियों का नाम नीति आयोग की ओर से बनाई गई सूची में शामिल है। शिपिंग कारपोरेशन में भी अडानी समूह की दिलचस्पी होगी क्योंकि देश के एक-तिहाई बंदरगाह उसके पास हैं।

- Advertisement -spot_img

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Latest News

केजरीवाल, ममता ने मोदी को लिखी चिट्ठी

नई दिल्ली। कोरोना वायरस के मरीजों की बढ़ती संख्या के बीच दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और पश्चिम बंगाल...

More Articles Like This