कांग्रेस में ऐतिहासिक अव्यवस्था

देश की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी कांग्रेस अभी संक्रमण के दौर में है। हालांकि उसका संक्रमण बहुत लंबा हो गया है। राहुल गांधी का 2013 में पार्टी का उपाध्यक्ष बनने के साथ जो संक्रमण शुरू हुआ तो वह अभी तक चल रहा है और सात साल के बाद यह अव्यवस्था में बदल गया है। पिछले एक साल से सोनिया गांधी पार्टी की अंतरिम अध्यक्ष के रूप में काम कर रही हैं। स्थायी और सक्रिय अध्यक्ष की मांग करने वाली चिट्ठी कांग्रेस अध्यक्ष के नाम लिखी गई तो उस पर दस्तखत करने वाले नेताओं को एक एक करके निपटाने का सिलसिला शुरू हो गया। इसके लिए कांग्रेस संगठन में बड़ा बदलाव कर दिया गया। सोचें, एक ही कलम से छह महीने में कांग्रेस का नया अध्यक्ष चुनने की मंजूरी दी गई और उसके लिए छह सदस्यों की कमेटी बनाई गई और उसी कलम कांग्रेस संगठन में ऊपर से नीचे तक बदलाव कर दिया गया! सवाल है कि अंतरिम अध्यक्ष को इतना बड़ा बदलाव करने की क्या जरूरत थी?

लेकिन कांग्रेस में कोई यह सवाल पूछे तो उसे पार्टी और परिवार का दुश्मन मान लिया जाएगा और निपटाने की मुहिम शुरू हो जाएगी। कांग्रेस नए बनाम पुराने, सोनिया बनाम राहुल के लोग, राहुल बनाम प्रियंका के लोग के झगड़े में उलझी है। कांग्रेस पहले भी टूटती-बिखरती रही है पर ऐसी अव्यवस्था कम ही देखने को मिली है। इसकी वजह से राहुल गांधी अपनी लड़ाई लड़ रहे हैं, प्रियंका अपनी लड़ रही हैं और कांग्रेस के बाकी सारे नेता, सांसद आदि अपनी अपनी लड़ाई अपने क्षेत्र में लड़ रहे हैं।

सत्ता के कई केंद्र बनने और नेताओं में एकजुटता नहीं होने का नतीजा है कि पिछले एक साल में कांग्रेस पार्टी दो राज्य सरकार गवां चुकी है। पहले कर्नाटक में कांग्रेस और जेडीएस की साझा सरकार गई और फिर मध्य प्रदेश की चुनी हुई पूर्ण बहुमत की सरकार गई। कर्नाटक में जो सज्जन कांग्रेस के प्रभारी हैं वे राहुल गांधी के सबसे प्रिय नेता हैं और उनको संगठन का महामंत्री बनाया गया है पर उनको पता ही नहीं चला कि कब पार्टी के विधायक हाथ से निकल गए और भाजपा के साथ चले गए। कर्नाटक में कांग्रेस के पास सबसे ज्यादा और सबसे अनुभवी नेता हैं। सिद्धरमैया से लेकर मल्लिकार्जुन खड़गे और वीरप्पा मोईली से लेकर डीके शिवकुमार तक सब हैं पर पार्टी के विधायक नहीं संभाले गए। इन नेताओं के आपसी झगड़े और केंद्रीय नेतृत्व के मुगालते में सरकार चली गई।

ऐसे ही मध्य प्रदेश में हुआ। राज्य में 15 साल के बाद कांग्रेस को सत्ता मिली थी, जिसे उसने 15 महीने में गंवा दिया। भाजपा और कांग्रेस के फर्क पर सोचें। गोवा से लेकर मणिपुर और मेघालय में तक मे हारी हुई भाजपा ने सरकार ने बना ली। कांग्रेस के कम सीटें होने के बावजूद गोवा और मणिपुर में कांग्रेस ने सरकार बनाई। और दूसरी ओर कांग्रेस ने 15 साल की मेहनत के बाद बनाई सरकार गंवा दी। कर्नाटक की तरह मध्य प्रदेश में भी कांग्रेस के पास खूब सारे नेता हैं। पर सारे नेता पता नहीं कहां गाफिल रहे या किस जोड़-तोड़ में रहे कि उन्हीं में से एक नेता 22 विधायकों को लेकर भाजपा में चले गए। राज्य में 28 सीटों पर उपचुनाव होना है और कांग्रेस की अव्यवस्था उस लड़ाई में भी दिख रही है।

दो और राज्यों में कांग्रेस के समर्थन वाली सरकार है और यह आम धारणा है कि ये दोनों सरकारें भी ऐसी अव्यवस्था का शिकार हैं कि कभी भी गिर सकती हैं। झारखंड में कांग्रेस के विधायक अपनी ही सरकार के खिलाफ शिकायत लेकर रोज दिल्ली में आलाकमान के पास बैठे होते हैं। किसी को मंत्री बनना है तो किसी को प्रदेश अध्यक्ष बनना है। यहीं कहानी महाराष्ट्र की है। वह भी कांग्रेस के नेता आपस में ही लड़ रहे हैं। एनसीपी और शिव सेना से तालमेल बनाना तो अलग की बात है। वह तो भला हो शरद पवार का, जिनके अपने हित बढ़े हैं और वे उद्धव ठाकरे के साथ तालमेल करके सरकार चलवाए हुए हैं। इन चार राज्य सरकारों का जिक्र इसलिए जरूरी था क्योंकि केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार बनने और मोदी-अमित शाह के भाजपा की कमान थामने के बाद ये चार राज्य कांग्रेस की किस्मत पलटने वाले थे। मोदी-शाह के बावजूद इन राज्यों में कांग्रेस ने अच्छा प्रदर्शन किया था और तीन राज्यों में भाजपा को सत्ता से हटा कर सरकार बनाई थी। जनता ने कांग्रेस को जीत दिलाई थी पर कांग्रेस का नेतृत्व उस जीत को संभाल नहीं सका।

इन राज्यों में कांग्रेस को ज्यादा ध्यान इसलिए देने की जरूरत थी क्योंकि इन राज्यों में वह बतौर विपक्ष मौजूद है। बाकी देश के ज्यादातर राज्यों में तो कांग्रेस विपक्ष की हैसियत में भी नहीं है। तेलंगाना से लेकर आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु तक या उत्तर प्रदेश से लेकर दिल्ली और बिहार तक कांग्रेस की हैसियत मुख्य विपक्षी दल की भी नहीं है। जिन राज्यों में वह सत्ता में है या मुख्य विपक्षी है वहां की अव्यवस्था कांग्रेस से नहीं संभल रही है तो उन राज्यों के बारे में क्या कहा जा सकता है, जहां वह हाशिए पर की पार्टी है! कांग्रेस का इस अव्यवस्था से निकलना बहुत जरूरी है। अभी समय है कांग्रेस के पास इस अव्यवस्था से निकलने का। अगले दो साल में 12-13 राज्यों में चुनाव होने हैं। अगर कांग्रेस अभी अपने को नहीं संभालती है तो फिर अगले लोकसभा चुनाव में भी उसके लिए कोई संभावना नहीं बचेगी।

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