अध्यक्ष के चुनाव से बचे कांग्रेस!

कांग्रेस में राष्ट्रीय अध्यक्ष का चुनाव होना है। अगर सब कुछ तय कार्यक्रम के हिसाब से चलता रहा तो फरवरी 2021 में इसकी प्रक्रिया पूरी होनी है। अगस्त में जब पार्टी के 23 वरिष्ठ नेताओं ने पार्टी की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी को चिट्ठी लिखी थी और एक पूर्णकालिक, सक्रिय, विजिबल अध्यक्ष की मांग की थी और साथ में कहा था कि प्रखंड से लेकर कांग्रेस कार्यसमिति तक हर पद के लिए चुनाव कराए जाए, तभी यह तय हुआ था कि छह महीने के भीतर सोनिया गांधी अध्यक्ष पद छोड़ देंगी और उनकी जगह नया अध्यक्ष बनेगा। नए अध्यक्ष का चुनाव कराने के लिए पार्टी के छह वरिष्ठ नेताओं की एक कमेटी भी बनाई गई थी, जो तैयारियों में लगी है। कांग्रेस के केंद्रीय चुनाव प्राधिकार ने राज्यों को चिट्ठी लिखी है और अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के प्रतिनिधियों की सूची भेजने को कहा है। खबर है कि प्रतिनिधियों की इस बार डिजिटल सूची बनाई जा रही है ताकि कोरोना वायरस के संकट के बीच चुनाव में उन्हें मतदान करने में आसान हो। करीब डेढ़ हजार प्रतिनिधि कांग्रेस अध्यक्ष के चुनाव में हिस्सा लेंगे।

अब सवाल है कि इस चुनाव से कांग्रेस को क्या हासिल होना है? इस चुनाव के दो नतीजे हो सकते हैं। अगर राहुल गांधी खुद चुनाव लड़ने को तैयार होते हैं तो जैसा पिछली बार हुआ था, दूसरा कोई नेता नामांकन नहीं करे और राहुल को निर्विरोध अध्यक्ष चुन लिया जाए। दूसरा नतीजा यह संभव है कि राहुल गांधी चुनाव नहीं लड़ें। अगर ऐसा होता है तो खुला खेल फर्रूखाबादी हो जाएगा। किसी का किसी पर जोर नहीं होगा। अनेक लोग नामांकन करेंगे और फिर चुनाव संभालना कांग्रेस के किसी नेता के वश में नहीं रह जाएगा। आखिर अब सोनिया गांधी के पास अहमद पटेल नहीं हैं, जो परदे के पीछे से किसी एक नाम पर सहमति बनवा देंगे या फोन उठा कर किसी नेता को चुप रहने, पीछे हटने को कह देंगे और वह हट जाएगा।

कांग्रेस में इस तरह का प्रबंधन करने वाला अब कोई नहीं है। अहमद पटेल के निधन के बाद सोनिया गांधी के पास न तो सौ फीसदी भरोसे का कोई नेता है और न सौ फीसदी सक्षम कोई नेता है। दोनों बातें अपनी जगह सही हैं। वे किसी पर अहमद पटेल की तरह भरोसा नहीं कर सकती हैं और दूसरा कोई है भी नहीं, जो उनकी कही बात पर सौ फीसदी अमल करा सके। ऐसे में अगर चुनाव होता है तो सब कुछ बिखर जाएगा। राज्यों में प्रतिनिधियों के नाम भेजने से लेकर नामांकन और चुनाव तक सब कुछ का प्रबंधन करना फिलहाल कांग्रेस के किसी नेता के वश में नहीं दिख रहा है।

हां, यह संभव है कि सोनिया गांधी खुद सब कुछ संभालें। एक एक नेता से बात करें। उसे समझाएं। पर यह भी आसानी नहीं है क्योंकि उनकी अपनी सेहत भी ठीक नहीं है और वे किसी से मिल नहीं रही हैं। कई महीनों से जो भी नेता उनसे मिलने दस, जनपथ जाता है, उसकी बातचीत इंटरकॉम पर ही होती है। आमने-सामने की मुलाकातें बंद हैं। ऐसे में उनके लिए भी चुनाव का प्रबंधन आसान नहीं होगा। दूसरे, कांग्रेस अध्यक्ष के कभी सीधे नेताओं से बात करने की परंपरा नहीं रही है। हमेशा बीच में एक बफर रखा जाता है, ताकि बात बिगड़े तो जिम्मेदारी अध्यक्ष के ऊपर नहीं आए।

बहरहाल, सोनिया गांधी को यह भी अंदाजा होगा कि अगर अब राहुल गांधी को पार्टी की स्थायी रूप से कमान देने में देरी की गई तो बात बिगड़ भी सकती है। जितनी देरी होगी, जितनी उनकी अपनी सेहत बिगड़ेगी और पार्टी के अंदर जितना तनाव बढ़ेगा, राहुल के लिए रास्ता उतना मुश्किल होता जाएगा। तभी सोनिया गांधी के लिए सबसे पहली जरूरत किसी तरह से चुनाव की संभावना को टालते हुए राहुल गांधी को पार्टी का अध्यक्ष बनाने की है। उनको भरसक प्रयास करना चाहिए कि चुनाव की नौबत नहीं आए और राहुल गांधी को कमान मिल जाए। इसके लिए वे पार्टी के सारे संसाधनों का इस्तेमाल कर सकती हैं। उनके पास अशोक गहलोत, दिग्विजय सिंह, एके एंटनी, कैप्टेन अमरिंदर सिंह, भूपेश बघेल, पी चिदंबरम जैसे भरोसे के नेता हैं, जिनको वे अलग अलग काम में लगा सकती हैं और उनकी मदद से राहुल के नाम पर सहमति बनवा सकती हैं।

सोनिया गांधी चाहें तो प्रियंका गांधी वाड्रा का इस्तेमाल कर सकती हैं। हालांकि पार्टी में एक बड़ा खेमा ऐसा भी है, जो चाहता है कि सोनिया इस समय प्रियंका के हाथ में कांग्रेस की कमान सौंप दें। पर इसकी संभावना नहीं दिख रही है। वे प्रियंका का इस्तेमाल पार्टी के प्रति बागी तेवर दिखाने वाले नेताओं को मनाने, समझाने में कर सकती हैं। परदे के पीछे से कमान हाथ में रखते हुए सोनिया अगर पार्टी के वरिष्ठ और बुजुर्ग नेताओं को सक्रिय करती हैं और साथ ही प्रियंका गांधी वाड्रा के कार्ड का ढंग से इस्तेमाल करें तो राहुल के नाम पर आम सहमति बनवाई जा सकती है। उसके बाद उनके राजनीतिक प्रबंधकों की एक टीम उनको सौंप कर सोनिया नेपथ्य में जा सकती हैं। लेकिन इसके लिए अगले ढाई-तीन महीने बहुत ज्यादा राजनीतिक जोड़-तोड़ और प्रबंधन की जरूरत होगी। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने अगस्त में जब चिट्ठी लिखी थी तब सोनिया गांधी ने कांग्रेस कार्य समिति का पुनर्गठन कर दिया था। कई नए लोगों को जिम्मेदारी दी थी। लेकिन तब अहमद पटेल उनके साथ थे। अब सोनिया गांधी ऐसा नहीं कर सकती हैं। इसलिए सबको कुछ न कुछ ऑफर करना होगा और आम सहमति बनाने का प्रयास करना होगा।

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