राज्यों में कांग्रेस अवसर से चुनौती

कई नेता मान रहे हैं कि कांग्रेस यदि कायदे से चुनाव लड़े तो केरल में सरकार में वापसी हो सकती है, तमिलनाडु में डीएमके और कांग्रेस सत्ता हासिल कर सकते हैं और पुड्डुचेरी में भी दोनों पार्टियों का गठबंधन चुनाव जीत सकता है। यानी पांच में से तीन राज्यों में कांग्रेस के सत्ता में वापसी करने का रियल मौका है। लेकिन इसके लिए पार्टी को तीनों राज्यों में रणनीति बनानी होगी, संसाधन जुटाने होंगे और तालमेल को अंतिम रूप देना होगा। यह काम आसान नहीं होगा। तमिलनाडु और पुड्डुचेरी में पी चिदंबरम बेहतर काम आ सकते हैं। डीएमके नेताओं से उनके अच्छे संबंध हैं और यूपीए की सरकार में शामिल रही दूसरी पार्टियों या प्रदेश की अन्य छोटी पार्टियों के साथ भी वे तालमेल बनवा सकते हैं। केरल में कांग्रेस के पास नेताओं की कमी नहीं है। एके एंटनी से लेकर ओमन चांडी और रमेश चेन्निथला तक कई नेता कांग्रेस के पास हैं, जिनका इस्तेमाल किया जा सकता है।

दक्षिण के तीन राज्यों के अलावा पूर्वोत्तर के दो राज्यों- पश्चिम बंगाल और असम में विधानसभा के चुनाव हैं। कांग्रेस को एक बड़ा झटका असम में लगा है, जहां चुनाव से ऐन पहले तरुण गोगोई का निधन हो गया। उनके नहीं रहने के बाद अब प्रदेश की राजनीति में वैक्यूम हो गया है। राज्य के हालात कांग्रेस के अनुकूल हैं। बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट के साथ भाजपा का विवाद हो गया है और भाजपा ने अपनी इस सहयोगी पार्टी के दो नेताओं को अपनी पार्टी में शामिल कर लिया है। इससे बीपीएफ नेता हागरामा महलारी नाराज हैं। वे अलग लड़ेंगे। किसान नेता अखिल गोगोई ने अलग पार्टी बनाई है। संशोधित नागरिकता कानून और एनआरसी के विरोध में ऑल असम स्टूडेंट यूनियन, आसू ने भी एक राजनीतिक पार्टी का ऐलान किया है। बदरूद्दीन अजमल की पार्टी भी कांग्रेस के साथ तालमेल के लिए तैयार है।

ऐसे में अगर पार्टी प्रयास करे तो वहां भाजपा के मुकाबले एक मजबूत, इंद्रधनुषी गठबंधन बन सकता है, जो भाजपा को कड़ी टक्कर दे सकता है। जहां तक पश्चिम बंगाल का सवाल है तो वहां पार्टी ने कमान अधीर रंजन चौधरी को सौंपी हुई है। वे लोकसभा में कांग्रेस के नेता हैं और साथ ही पार्टी ने उनको प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष भी बनवाया है। उनके साथ काम करने के लिए प्रभारी भी जितिन प्रसाद बनाए गए हैं, जिनका बंगाल की राजनीति में कोई खास मतलब नहीं बनता है। अधीर चौधरी के हाथ में कमान देकर कांग्रेस ने यह भी साफ कर दिया है कि ममता बनर्जी के साथ किसी किस्म की तालमेल की बात नहीं होगी। वैसे भी राहुल गांधी खुद सीपीएम महासचिव सीताराम येचुरी के सीधे संपर्क में हैं और लेफ्ट व कांग्रेस के तालमेल की बात हो रही है। वहां कुल मिला कर अधीर चौधरी ही चुनाव लड़ाएंगे। पर कांग्रेस को इस बात का ध्यान रखना होगा कि उसके त्रिकोणात्मक लड़ाई बनाने का फायदा किसको मिलता है? अगर कांग्रेस का गठबंधन ममता बनर्जी सरकार का विरोधी वोट काटता है तब तो तृणमूल कांग्रेस को फायदा हो सकता है। यह ध्यान रखना इसलिए जरूरी है क्योंकि दूसरी ओर भाजपा पूरी तरह से ध्रुवीकरण की राजनीति पर ध्यान  लगाए गए हुए है।

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