कोरोना और शी का भविष्य

वायरस के मौजूदा लम्हों में एक बड़ा सवाल चीन और उसके राष्ट्रपति शी जिनफिंग को लेकर है। सवाल है कि शी जिनफिंग का भविष्य क्या होगा? यह कई बातों पर निर्भर करेगा। सबसे पहली बात है कि अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप फिर चुनाव जीतते हैं या नहीं। अगर वे जीत जाते हैं तो अगले चार साल पूरी दुनिया एक बड़े कोहेस में, अव्यवस्था में तब्दील होगी, जिसमें शी के लिए अवसर बनेंगे। पर अगर ट्रंप हारते हैं तो दुनिया नए सिरे से एकजुट होकर कोरोना वायरस और दुनिया की दूसरी कई समस्याओं के लिए चीन को जिम्मेदार ठहराएगी।

चीन अभी कुछ घिरा हुआ है। ट्रंप लगातार उसके खिलाफ बयानबाजी कर रहे हैं। पर बयानों से आगे वे कुछ और नहीं कर पा रहे हैं। इसका कारण यह है कि यूरोप के देश ट्रंप पर भरोसा नहीं कर रहे हैं। उत्तरी अमेरिका के ही देश कनाडा को ट्रंप पर यकीन नहीं है। सो, चाहे कनाडा हो या यूरोप के दूसरे देश हों या भारत, जापान हों या ऑस्ट्रेलिया ये सब देश अपने अपने स्तर पर चीन का विरोध कर रहे हैं और उससे लड़ने का प्रयास भी कर रहे हैं। अगर ट्रंप का नेतृत्व सही होता तो यह लड़ाई बिखरी हुई नहीं होती।

शी जिनफिंग ने लद्दाख से लेकर डोकलाम तक में भारत के साथ वास्तविक नियंत्रण रेखा, एलएसी पर टकराव बढ़ाया है। वह दो कदम आगे और एक कदम पीछे हटने की रणनीति अपनाए हुए है। भारत ने सीमा पर चौकसी बढ़ाई है और एक प्रतीकात्मक ट्रेड वार भी शुरू किया है, जिसमें 59 चाइनीज ऐप्स बंद किए गए हैं। अमेरिका भी चीन के ऐप टिक टॉक को बैन करने पर विचार कर रहा है। ऑस्ट्रेलिया ने कोरोना वायरस के पैदा होने और फैलने में चीन की भूमिका की जांच की मांग की तो शी जिनफिंग ने ऑस्ट्रेलिया से होने वाला आयात घटा कर उसे नुकसान पहुंचाना शुरू किया। चीन ने दक्षिण चीन सागर में अपनी गतिविधियां बढ़ाई हैं, जिससे कई देश नाराज हैं। यूरोप के देश भी कोरोना वायरस के पैदा होने और फैलने में चीन की भूमिका की जांच चाहते हैं और उसे जिम्मेदार ठहरा कर उस पर जुर्माना लगाने की मांग कर रहे हैं। कई देशों ने इसके लिए प्रस्ताव पास किया है। उधर ब्रिटेन ने हांगकांग में चीन का राष्ट्रीय सुरक्षा कानून लागू करने का विरोध किया है और हांगकांग के दो लाख लोगों को अपने यहां शरण देने का ऐलान किया है।

ये सारे प्रयास एकीकृत नहीं हैं। इनमें से कोई भी देश अकेले चीन को जिम्मेदार ठहराने की स्थिति में नहीं है। फ्रांस या जर्मनी या ब्रिटेन अकेले-अकेले चीन को नहीं घेर सकते हैं। लेकिन अगर अमेरिका में ऐसा नेतृत्व हो, जिस पर सबका भरोसा बने तो एकीकृत लड़ाई संभव है। अगर एकीकृत लड़ाई हुई तो चीन और शी दोनों का पतन तय है। क्योंकि फिर यह लड़ाई बहुआयामी होगी। सबसे पहले दुनिया के देश कोरोना वायरस पैदा करने और उसे फैलाने के लिए चीन को जिम्मेदार ठहरा कर उसके ऊपर जुर्माना लगाएंगे। दूसरे, दक्षिण चीन सागर में उसकी बढ़त रोकने का प्रयास होगा। तीसरे, अमेरिका और दुनिया का समर्थन होगा तो भारत अपनी सीमाओं पर चीन को पीछे हटने के लिए मजबूर करेगा। चौथे, भारत सहित दुनिया के तमाम देश ट्रेड वार तेज करेंगे। खास कर ऐसे देश, जिनके पास चीन के साथ कारोबार में एडवांटेज है। ध्यान रहे चीन की सबसे बड़ी ताकत उसकी सेना नहीं है, बल्कि उसकी आर्थिक स्थिति है। दुनिया के स्तर पर ट्रेड वार शुरू करके उसको आर्थिक रूप से कमजोर किया जा सकता है।

पांचवें, कोरोना की वजह से जो अविश्वास पैदा हुआ है उसमें अमेरिका, जापान और दूसरे कई देशों की कंपनियां चीन से अपना कारोबार समेट रही हैं और दूसरे देशों में जा रही हैं। अमेरिका और जापान दोनों ने अपनी कंपनियों को वापस लौटाने के लिए रिलोकेशन फंड बनाया है। छठे, चीन के प्रति बढ़ते अविश्वास की वजह से दुनिया के देशों ने अपनी घरेलू निर्माण इकाइयों को बढ़ावा देने की नीति बनाई है। इससे चीन के दुनिया की फैक्टरी होने का दावा कमजोर होगा। सातवें, दुनिया के देश अब वन चाइना पॉलिसी पर सवाल उठाने लगे हैं। हांगकांग, ताइवान और तिब्बत को लेकर सवाल उठ रहे हैं तो मुस्लिम गुलग यानी मुसलमानों को बंद करके उनके साथ हो रहे अमानवीय बरताव का मुद्दा भी उठने लगा है। यह सब होगा तो चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के अंदर शी जिनफिंग की स्थिति कमजोर होगी। वैसे भी उनके खिलाफ एक वर्ग तैयार हो रहा है। अगर चीन दुनिया भर के देशों से घिरता है तो अंदर से भी हमले तेज होंगे। सो, भले अभी चीन में सब कुछ ठीक दिख रहा हो पर आने वाले दिनों में उसके लिए मुश्किल होने वाली है।

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