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क्या लिखूं, सब तो साल पहले लिखा

भारत मौत का कुंआ बना है! ऐसा कोई सैकेंड वेव, थर्ड, फोर्थ वेव से नहीं है जो है वह नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार की अंतहीन मूर्खताओं से है। इन मूर्खताओं में ब्रेक कभी नहीं था जो समझदार-सभ्य देशों की तरह यह सोचे कि वायरस रूक गया, फिर फैला, फिर रूका फिर फैला। भारत में वायरस लगातार फैलता हुआ है और यह कहीं सन् 1918 के स्पेनिश फ्लू जैसी महामारी की मौतों का मंजर न बने, इसके लक्षण पहले दिन से इसलिए दीवाल पर लिखे हुए थे क्योंकि नरेंद्र मोदी ने अपनी बुद्धी के घमंड में अकेले फैसले लिए। इनसे भारत मौत का कुंआ बनेगा, दुनिया का अछूत देश बनेगा, अगले तीन-चार भारत लगातार बरबाद होना है, यहमैंने इतना लिखा था कि अब तो बरबादी ही बरबादी है।  तो क्यों न आज गौर करें मेरे लिखे कॉलम के शीर्षक- पंक्तियों पर गौर रहें –

वायरस वैश्विक व लापरवाह भारत!-‘भारत राष्ट्र-राज्य सावधान-सतर्क नहीं है। भारत को क्या सुध है कि ईरान, इटली, दक्षिण कोरिया, चीन के साथ हमारी आवाजाही खत्म करना जरूरी है या नहीं? (28 फरवरी 2020)

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मोदीजी विश्राम कीजिए, बुद्धी, हार्वड को मौका दीजिए!-वायरस से लड़ाई के मौजूदा सिनेरियों में भारत वह देश है जो पूरी तरह नरेंद्र मोदी की तर्जनी अंगुली के सुर्दशन चक्र पर निर्भर है। अनुरोध है मोदीजी ईश्वर के लिए अपने सुर्दशन चक्र को, अपने हार्ड वर्क को कुछ दिन विश्राम दीजिए। भारत को कुछ महिने डाक्टरों, वैज्ञानिकों, अर्थशास्त्रियों, लोकतांत्रिक विचार-विमर्श, हार्वड-आक्सफोर्ड याकि बुद्धी के भरोसे छोड़ दीजिए। … हम हिंदुओं के आधुनिक भगवानजी, रहम कीजिए, हार्डवर्क से विश्राम कर हार्वड वालों को वायरस से लड़ने दीजिए।(10 अप्रैल 2020)

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भारत की कोरोना सच्चाई छुपी हुई!- डॉ. वेदप्रताप वैदिक ने फोन कर कहा- मुझे लगता है 31 मार्च तक हम कोरोना संकट से पार हो जाएंगे! …. उन्होंने मेरी जानकारी बढ़ाई भारत से कुनैन की गोली का निर्यात बढ़ गया है। भारत चमत्कार करेगा। ध्यान रहे दो दिन पहले वैदिकजी ने नया इंडिया के अपने कॉलम में यह चमत्कारी हेडिंग दी थी- भारत जीतेगा कोरोना युद्ध! कल उनका लिखा था ‘कोरोना से डरो मत’।…विश्व स्वास्थ्य संगठन जिस असली बात का रट्टा लगाए हुए है उसका भारत में कोई ख्याल नहीं है। संगठन हर दिन दोहरा रहा है न कि- सभी देशों के लिए हमारा सिर्फ एक मैसेज है और वह है टेस्ट, टेस्ट, और टेस्ट। (27 मार्च 2020)

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कोरोना से रामभरोसे लड़ाई- जान ले कि विश्व स्वास्थ्य संगठन के प्रमुख बार-बार जो टेस्ट व ट्रेस करने की जो हिदायत दे रहे है उसके प्रति भारत या तो लापरवाह है या नगण्य टेस्टीग है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के प्रमुख को आज भी मैंने यह बोलते हुए सुना है कि यह न सोचो कि महामारी नहीं आएगी। वह आएगी इसलिए टेस्ट और ट्रेसिंग पहली बेसिक जरूरत है (20 मार्च 2020)

भारत में लॉकडाउन है सिर्फ जुगाड़! -वह जुगाड़, जिसमें वायरस के साथ घर बैठ कर मौत का इंतजार है। बिना टेस्ट, बिना मेडिकल तैयारी के 21 दिन का ‘भारत बंद’ घर में वायरस को बैठा कर है। जुगाड़ कामयाब हुआ तो वाह और नहीं तो श्मशान घाट पर बैठ कर लोग सोचेंगे कि इससे ज्यादा भला क्या हो सकता था! मौत नहीं टाल सकते! (30 मार्च 2020)

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‘झूठ’ का वायरस ज्यादा खाएगा!– भारत दुनिया का अकेला वह देश है, जिसके नागरिक दो वायरस के शिकार हैं। एक का नाम ‘कोरोना’ है और दूसरे का नाम ‘झूठ’ है! दोनों वायरस एक-दूसरे को फैला रहे हैं। वायरस भारत में सर्वाधिक मारक इसलिए होगा क्योंकि इसे भारत की सरकार, भारत का मीडिया, भारत की संस्थाएं, भारत राष्ट्र-राज्य ‘झूठ’ का लगातार धक्का दे रहा है।  (1 अप्रैल 2020)

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ईश्वर के लिए अब भी समझिए!-समझिए मोदीजी, समझिए! हां, गांठ बांधें कि हम महामारी में जी रहे हैं। मैंने मार्च-अप्रैल में लगातार लिखा कि इस वायरस को भारत हल्के में न ले। युद्ध स्तर पर तैयारी करे और सौ जूते और सौ प्याज खाने की गलती कतई न करे। मतलब कभी लॉक़डाउन तो कभी अनलॉक!(16जून 2020)

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उफ! ढेर 27 हजार लाशों का!– जो शरीर शैतान-राक्षसी संस्कार वाला होता है वह भले सोचे कि 27 हजार ही मरे हैं 27 लाख नहीं तो ईश्वर भले उन्हें वायरस की मौत न मारे लेकिन मानवता जरूर यह याद रखेगी कि 21वीं सदी के आधुनिक काल में भारत वह देश था, जहां 27 हजार लाशों की चिताओं पर सार्वजनिक संवेदनाओं के दो बोल भी सुनाई नहीं दिए। कितना त्रासद है यह। इंसान की मौत मानो कीड़े-मकोड़ों का मरना हो जो हिंदुओं की मुर्दा कौम धड़की नहीं।

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वायरस से जल्द छुटकारा नहीं!– क्या सन् 2022 में या सन् 2023-24 में?  यह गलतफहमी न रखें कि वैक्सीन आ गई है तो छह- आठ महिने में भारत कोविड़-19 के संक्रमण से मुक्त हो जाएगा। कतई नहीं। अपना मानना है कि सन् 2021-22 तो भारत में वायरस का पीक होगा। इसलिए कि भारत की राजनीति ने जितनी लापरवाही, जितना मजाक, जितना अज्ञान सन् 2020 में वायरस को ले कर दिखाया है उससे वह पू देश की हवा में घुलमिल गया है और उसका क्रमशः विस्फोट धीरे-धीरे भारत को लगातार घायल किए करेगा। (गपशप-21 नवंबर 2020)

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यही है कोरोना से भारत की लड़ाई की 21वीं सदी की भक्त कथा का सार-भारत कोरोना की महामारी में धूल में लट्ठ, अंधेरे में तीर और बिना आगा-पीछा सोचे हाथ-पांव मार रहा है।..भारत की सरकारी संस्थाएं, आईसीएमआर बुरी तरह फेल है।.. तभी लॉकडाउन के 21 दिन वह मौका है, वह समय है, जिसमें टेस्ट, डाटा विश्लेषण से कम से कम रिसर्चर मॉडल बने कि 130 करोड लोगों में संक्रमण कब, कितना मुमकिन है?(6 अप्रैल 2020)

मोदी जी, लाशें तो सही जलवा दीजिए!- क्या वायरस से मरे लोगों के दाह संस्कार का खर्च सरकार खुद नहीं उठा सकती है? नरेंद्र मोदी से मन से, बहुत गंभीरता से मेरी विनती है कि ईश्वर के लिए आपने पीएम केयर का जो फंड बनाया है उसमें सौ-दो सौ करोड़ रुपए क्रियाकर्म फंड के लिए आवंटित करें। मुर्दाघर से श्मशान ले जाने की एंबुलेंस (इसकी बजाय मुर्दागाड़ियां थोक में बनवाई जानी चाहिए) उसके कर्मचारियों – दो-तीन परिजनों का पीपीई खर्च, श्मशान दरवाजे पर एबुलेंस से लाश को थैलागाड़ी से चिता तक ले जाने के भाड़े, वहां पीपीई पहन लाश को चित्ता पर रख फूंकने वाले, कपाल क्रिया, राख एकत्र करने या नदी में प्रवाह जैसे खर्च को यदि नरेंद्र मोदी का पीएम केयर उठाएगा तो वह उन हिंदुओं का कर्ज चुकाना होगा, जिन्होंने हिंदू होने के गौरव में ऐसी बेमौत की कल्पना नहीं की थी।

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आंखों पर पट्टी और सच्चाई – यों अपने डॉ. वेदप्रताप वैदिक नया इंडिया में लिख चुके है कि कोरोना के आगे भारत बना विश्व-त्राता! उनकी राय में कोरोना युद्ध में भारत की विजय सारी दुनिया में बेजोड़ है! हमारा बनाया टीका, हमारे मसाले, हमारे काढ़े ने कमाल कर दिखाया! …पर  मैं फरवरी 2020 से लगातार चेताता रहा हूं। भारत और मोदी सरकार की लापरवाही, गलतियों, झूठ, पाखंड, मुगालतों को आत्मघाती बताता रहा हूं। जैसे लॉक़ड़ाउन बिना सोचे-समझे बरबादी का आत्मघाती फैसला था वैसे हकीकत से आंख मूंद अनलॉक की रीति-नीति पर भी मैं यह लिखता रहा हूं कि कहीं 2021-22 ज्यादा संकटदायी साबित नहीं हो।…एक स्तर पर खटका है भारत में सन् 1918-20 के इतिहास की पुनरावृत्ति न हो।..(23 फरवरी 2021)

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मार्च तब-अब व भारत सत्य! – ‘नया इंडिया’ देश का अकेला अखबार है, जिसमें फरवरी 20 से ले कर अब तक कोरोना और संक्रमण की खबर हर रोज लगातार पहले पेज पर पहली, दूसरी या तीसरी खबर के रूप में छपी। देश का अकेला वह ‘बेसुरा’ अखबार ‘नया इंडिया’ है, जिसने पहले दिन से अब तक सरकार, नेतृत्व, लोगों और राष्ट्र-राज्य के झूठ, मुगालते, अंधविश्वास के बीच पाठकों को बेबाकी से वायरस का सत्य पहले पेज पर प्रस्तुत किया।पहले दिन से कोरोना पर विजय का नरेंद्र मोदी ने हुंकारा…ए से लेकर जेड तक झूठ ही झूठ!   (19 मार्च 2021)

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महामारी से कोई सबक नहीं– भारत दुनिया के सभ्य देशों में संभवतः एकमात्र देश होगा, जिसने महामारी से कोई सबक नहीं लिया या जिसने अलग अलग कामों के लिए महामारी को अवसर में बदला। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोद ने कहा भी और आपदा को अवसर में बदला भी। (गपशप 19 मार्च 2021)

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By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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