कोरोना: भारत में तब-अब - Naya India
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कोरोना: भारत में तब-अब

क्या फर्क है संक्रमण-लॉकडाउन के पिछले कोहराल और अब के कोहराम में? जवाब है कोई गुणात्मक परिवर्तन नहीं। वायरस के आगे भारत पहले भी झूठ में जीता हुआ था और अब भी है। भारत की भीड़ पहले भी वायरस को नकारते हुए थी और आज भी है। लोग तब भी भगवान भरोसे थे अब भी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी संकट में तब भी अवसर बनाते हुए थे अब भी अवसर तलाशते हुए है। तब भी टेस्टिंग-ट्रेसिंग-आईसोलेशन-चिकित्सा पर फोकस दिखावे का था अब भी है। भारत तब भी ढिढ़ोरा बनाए हुए था कि सब काबू में है। वायरस खत्म होता हुआ है। भारत विजयी है और महामारी दूसरे देशों के लिए आफत है लेकिन हमारे लिए नहीं। वह सब  प्रोपेगेंडा आज भी है। भारत ने आंकड़ों, टेस्ट-ट्रैस-संक्रमण-ईलाज में जितना झूठ बनाया-चलाया वह सन् 2020 की इतिहास में यह दास्ता लिखाए हुए होगा कि वैश्विक महामारी के वक्त जब मोदी राज था तो लोगों की जान के साथ कैसे खेला गया?21वी सदी में भी भारत के हिंदू कैसे अंधविश्वासों, ताली-थाली-दीये के टोटको, और अवैज्ञानिकता में राजा के दिवाने थे।

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तभी वैक्सीन, टीके से पहले की संक्रमण वेव और टीका आने के बाद की दूसरी लहर की जमीनी हकीकत में फर्क नहीं है। पिछड़े-गरीब देशों को एक तरफ कर यदि सोचे तो भारत दुनिया का अकेला देश होगा जिसका मार्च 2020 और मार्च 2021 का बजट महामारी से लड़ने के पैमाने वाला पैसा, लोगों को राहत के वैसे पैकेज लिए हुए नहीं था जैसे अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी आदि के बज़ट प्रस्तावों में हुआ हैं। हां, सन् 2020 में प्रधानमंत्री मोदी ने जरूर अपनी कमान में एक पीएम केयर फंड बनाया था। उसमें देश भर से चंदा डलवाया गया। और साल बाद सेकेंड वेव के दौरान किसी को पता नहीं है कि वह फंड कहां गया? महामारी की रोकथाम मेंउसका कहां-क्या और किस-किस मद में उपयोग हुआ या हो रहा है! अन्यथा 138 करोड लोगों का देश कोरोना महामारी के आगे बिना स्पेशिफिक फंड के लड़ाई लड़ता हुआ है!

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भारत चलती का नाम गाड़ी है, भारत राष्ट्र-राज्य अपनी तह, एकाग्रता, संकल्पशक्ति, फोक्स्ड हो कर संकट विशेष या समस्या, आपदा-विपदा-महामारी के स्थायी ईलाजमें खप नहीं सकता, इस हकीकत के खुलासे का नाम है कोरोना महामारी में एक साल का सफर। अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप हो या बाईडेन, ब्रिटेन में बारिस जॉनसन या जर्मनी में मर्केल या चीन के शी जिन पिंग इन सबका पिछले पूरे साल लगातार वायरस पर फोकस रहा। रोजमर्रा के तमाम मुद्दों और ब्रिटेन में ब्रेक्सिट जैसी समस्या की चुनौती के बावजूद विश्व नेताओं का फोकस वैक्सीन बनवाने, एक के बाद एक लॉकडाउन, लोगों के घर पैसा पहुंचाने, चिकित्सा से लेकर अंतिम संस्कार के बंदोबस्तों के चाकचौबंद बंदोबस्त पर था। वहां संसद लगातार बैठी और ईमानदारी के साथ प्रधानमंत्री, मंत्री सूचना देते हुए थे। मतलब पूरे बारह महिनों दुनिया के इन देशों में सरकार, मीडिया सबका सौ फिसद फोकस महामारी पर था। क्यों? इसलिए कि इन देशों की बुद्धी, राष्ट्र-राज्य की बुनावट में यह सत्य पैंठा हुआ है कि महामारी है तो अर्थ लोगों की मौत है। और इसमें पहली प्राथमिकता एक-एक नागरिक की जान बचाना है। सो जब भी वैज्ञानिक कहें संक्रमण रोकने के लिए बार-बार लाक़डाउन हो। टेस्ट- ट्रेसस-ईलाज में कमी न आने दो। वैक्सीन विकास के लिए आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय या किसी भी संस्थान को पैसा चाहिए तो उसके लिए खजाना खोल दों।

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ठिक विपरित भारत के प्रधानमंत्री ने बिना तैयारी के घोषित एक लॉकडाउन पर ही 21दिनों में कोरोना पर विजय का डंका पीट डाला। लोगों से टोटके कराएं। झूठ-अंधविश्वास से महामारी के प्रति लापरवाही बनवाई और जब लगा कि वायरस खत्म नहीं होने वाला तो महामारी के साथ जीने का मनोभाव बनवाया। जान के साथ जहान की चिंता का आव्हान, महामारी आत्मनिर्भरता का अवसर, अवसर के वक्त में  कृषि बिल, एक के बाद एक चुनाव आदि से फोकस बांट, अपना प्रोपेगेंडा बना 138 करोड़ लोगों की भीड़ को हर तरह से महामारी के प्रति लापरवाह बना डाला।

तभी तब और अब का नंबर एक फर्क है कि पहले 138 करोड़ों लोग चिंता, डर व अनहोनी होने, मौत के खतरे को समझे हुए थे जबकि अब जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बिना मास्क के जंगी चुनावी सभाओं में भाषण करते हुए है तो लोगों का बेफिक्र होना, बेपरवाह बनना स्वभाविक है। सो सेकेंड वेव, संक्रमण की दूसरी लहर में सरकारे कितनी ही पांबदी लगाए, डंडा चलाए लोग अप्रैल 2020 जैसी फिक्र में नहीं लौटने है। लोगों के दिल-दिमाग में महामारीकी खबरे है लेकिन फिक्र नहीं। वह संक्रमित नहीं होगा, यह मनोविज्ञान बहुसंख्यक लोगों का है। अप्रैल 2020 में लोग मौत के खौफ में स्वंयस्फूर्त घरों में बंद हुए थे। अपनी सुरक्षा के लिए गरीब जन भी पैदल  घरों  के लिए निकल पड़े थे। वैसा क्या आज मूड़ है?कतई नहीं! और ऐसा तब है जब वायरस की दूसरी लहर, सुनामी की तरह उठती हुई है। और तो और सरकार भी वापिस लॉकडाउन की जरूरत नहीं मान रही!

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By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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