यज्ञ, आहुति, स्वाहा कब तक?

मैं मार्च से सोचता-लिखता रहा हूं कि भारत में कोरोना वायरस काअसली रंग दिखना जून से प्रारंभ होगा। वह आकलन सत्य साबित हो रहा है। मैंने मार्च में यह आंशका भी जताई थी कि वायरस के खिलाफ लड़ाई में कहीं हम सौ जूते और सौ प्याज खाने की दोहरी गलती न कर बैठें। दुर्भाग्य से वहीं हो रहा है। इस कारण अब यह अनुमान बहुत मुश्किल हो गया है कि भारत कब तक वायरस से लड़ता रहेगा? मेरा अनुमान था कि अमेरिका चार जुलाई से सामान्य होने लगेगा तो भारत 14 नवंबर को दीपावली की लक्ष्मी पूजा सामान्य हालातों में कर ले तो वह भगवानजी की कृपा होगी।

पर भगवानजी भी क्या करेंगे!भय और मूर्खता के मिक्सचर ने हमें उस मुकाम पर पहुंचा दिया है, जिससे न वायरस से बच सकते हैं और न आर्थिकी को चला सकते हैं। सरकार कितनी ही कोशिश करे सबकुछ नॉर्मल दिखलाने की, कोरोना वायरस को फ्लू की तरह बतलाने की और मृत्यु दर कम होने और लोगों के अधिकाधिक ठीक हो कर लौटने का प्रोपेगेंडा कितना ही हो लेकिन संक्रमण फैलना ही है, इसके साथ टेस्ट और इलाज बंदोबस्तों का मामला क्योंकि डरावना है इसलिए भय रहेगा। यह बात घर-घर ऐसी पैठी है किकोरोना वायरस की बीमारी, इसकी मौत क्योंकि सामान्य नहीं है, वह जानवर वाली मौत है तो यह धारणाआने वाले दिनों-महीनों में गांव, कस्बे, शहर, महानगर के अनुभव में और फैलेगी। ऐसे में लोग मन से नॉर्मल कतई नहीं हो सकते।

मतलब वायरस का संक्रमण फैल रहा है, फैलेगा, मौतें होंगी, आंकड़ों में रिकार्ड बनेगा तो लोग अनचाहे-अनजाने भयाकुल रहेंगे। बावजूद इसके पापी पेट का सवाल है, भूख और रोजी-रोटी का सवाल है। इसके बहाने सरकारें सबकुछ नॉर्मल दिखला कर लोगों को काम पर लौटाने की रणनीति बना रही है। सोच है कि लोग ज्यादा दिन निठल्ले, बेरोजगार, भूखे नहीं बैठे रह सकते हैं। उद्योगपति, दुकानदार, कारोबारी ताला लगाए नहीं बैठे रह सकते हैं। इसलिए इनकी मजबूरी आर्थिकी के पहिए को चलवाएगी। जाहिर है 138 करोड़ों लोगों का देश, सरकार और व्यवस्था दो बेसिक बातों में भारत की विजय मान रही है। एक, वायरस तो फ्लू है, लोग उसके साथ जीने की आदत बना लेंगे। दूसरे वायरस से ज्यादा भूख लोगों को काम के लिए मजबूर करेगी। उससे वायरस पस्त होगा।

ऐसी सोच दुनिया के समझदार देशों में नहीं है। वहां पहले वायरस को काबू में करके लोगों को आश्वस्त करना, उनमें भरोसा बनवाना प्रथम और सर्वोपरि लक्ष्य है। इसके बाद फिर नियंत्रित अंदाज में काम-धंधे शुरू करवाना है। भय है तो काम नहीं हो सकता है, जान खतरे में है तो काम नहीं कराया जा सकता, इस बेसिक समझ पर पश्चिमी देशों ने (या दक्षिण कोरिया, जापान, सिंगापुरआदि) महामारी को मारने का अपना महायज्ञ चलाया है। भारत में पहले तो बुरी तरह डरा कर, लक्ष्मण रेखा खींचकर सबको वायरस के खिलाफ यज्ञ में सबकुछ की आहुति देने के लिए बैठा दिया गया। नतीजतन सब स्वाहा। लेकिन वायरस मरा नहीं तो यजमानों से अब कहा जा रहा है कि वापस पहले कमाओताकि अधूरे यज्ञ के लिए आहुति जुट सकें। रोटी खाओगे तो यज्ञ में बैठे रह सकोगे। वायरस से लड़ सकेंगे।

कैसी गिचपिच बन गई है तीन महीनों में। कितनी बार गोलपोस्ट बदला गया? तभी अपने को खतरा है कि भारत में तो वायरस से तब तब पार नहीं पाया जा सकता है जब तक वैक्सीन याकि टीका घर-घर नहीं लग जाए और यह काम न जाने कितने सालों में निपटेगा। सीधा अर्थ है कि कोरोना वायरस आजाद भारत में बरबादी की पंचवर्षीय योजना के साथ आया लगता है। ईश्वर करें मैं गलत साबित होऊं लेकिन तब तो हम लोगों का चलना, जीना पैंदे का सफर क्या नहीं बनेगा? यू शेप, वी शेप में आर्थिकी के उठने का तब ख्याल भूल जाएं।

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