हरिशंकर व्यास कॉलम | गपशप | बेबाक विचार

आर्थिकी भी खलास!

हिसाब से आर्थिकी की बरबादी को नंबर एक पर मानना चाहिए। पर मैं अशिक्षा, अज्ञानता को इसलिए अधिक घातक-गंभीर समझता हू क्योंकि यदि भारत (प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, हम-आप से लेकर आम नागरिक सभी) अशिक्षा-अज्ञान के वायरस में जकड़ गए तो आर्थिकी के सकंटों का आगे निदान ही संभव नहीं। महामारी के आगे हम लावारिस इसलिए मर रहे हैं और आगे भी मरेंगे क्योंकि अशिक्षा-अज्ञान-अंधविश्वासों में सदियों से जकड़े हुए हैं।

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गुजरे सप्ताह भारत की बरबादी में सन् 2020-21 की विकास दर में 7.3 प्रतिशत की गिरावट की खबर आईसबर्ग का महज ऊपरी हिस्सा था। पानी के नीचे समुद्र में 140 करोड़ लोगों का जीवन बरबादी की उन जंजीरों में जकड़ा है, जो महामारी के बाद भी जस की तस रहेगी। महामारी और कोरोना वायरस न इस साल जाने वाला है और न अगले साल। हम लोगों के चलते कोविड-19 भारत में पंचवर्षीय योजना लिए हुए हो सकता है। ध्यान रहे आर्थिकी की बरबादी नोटबंदी के बाद से है। वायरस आया तो उसने महामागर में गहरे धकेला है। इससे भारत को बाहर निकालना अब मोदी सरकार के बस की बात नहीं है।

क्यों? पहली बात चंद अमीरों और सरकारी नौकरीधारियों (हाकिमों) को छोड़ कर भारत का हर नागरिक, हर परिवार गरीब होता जा रहा है। बचत खत्म है या होती हुई है। कमाई के कोई आसार नहीं। ऐसे ही सरकारों की स्थिति है। सरकार का घाटा जीडीपी के प्रतिशत में रिकार्ड स्तर पर है। सरकार को भारत-चीन सीमा पर सैनिकों की तैनातगी से लेकर सुरक्षा खर्चों में पैसा खर्च करते रहना होगा तो अपना खर्च चलाने, महामारी-वैक्सीन का खर्चा भी है। साथ ही प्रधानमंत्री मोदी ने नई संसद, सेंट्रल विस्टा जैसी फिजलूखर्ची बनाए रखने की जिद्द भी ठानी हुई है। सो, सरकार का खजाना खाली होता हुआ तो जनता की जेब दस तरह से खाली। बीमारी, घर-बैठे खाने, डीजल-पेट्रोल से लेकर सरसों के तेल आदि दस तरह की जरूरतें सब महंगी हैं व आने वाले महीनों में और मंहगी होंगी। पेट्रोलियम पदार्थों के दाम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तेज होने लगे हैं।

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तभी संभव है दीपावली-दिसंबर तक भारत में महंगाई और मुद्रास्फीति रिकार्ड स्तर पर हों। इससे दिनोंदिन 140 करोड़ लोगों की भीड़ में असमानता भयावह बनेगी। एक तरफ लोग मुफ्त के राशन में जैसे-तैसे पेट भरते हुए तो दूसरी तरफ अंबानी-अडानी का खजाना लगातार बढ़ता हुआ।

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इसलिए आने वाले वक्त में भारत का वेनेजुएला याकि लातिनी अमेरिकी देशों जैसा बनना संभव है। अभी तक नरेंद्र मोदी और उनका पीएमओ इस सावधानी में है कि सरकार के घाटे व नोट छाप मंहगाई को सुरसा की गति नहीं मिले। ऐसा हुआ तो वैश्विक रेटिंग एजेंसियां भारत को कबाड़ याकि जंक घोषित करेंगी और दुनिया के निवेशकों के लिए भारत खत्म आर्थिकी। वैश्विक एजेंसियों ने फिलहाल भारत को जंक-दिवालिया की रेटिंग से एक सीढ़ी ऊपर ही रखा हुआ है। इससे भारत की लाज बची हुई है।

लेकिन बात तो नहीं बन रही। लोगों की जेब में पैसा नहीं तो न मांग बन सकती है और न फैक्टरियों का पूरा उत्पादन संभव है। आर्थिकी की रफ्तार नहीं बनेगी। तभी एक लॉबी कोशिश में है कि कैसे भी हो रिजर्व बैंक नोट छापे और मोदी सरकार नोटों को आम जनता में बांटे। अपने को खटका है कि नरेंद्र मोदी यह काम यूपी चुनाव से ठीक पहले हर घर दस-बीस हजार रुपए बंटवा करके कर सकते हैं।

यह एप्रोच आर्थिकी को भयावह मंहगाई, मुद्रास्फीति की और धकेलेगी। इसलिए कि बिना उत्पादकता, बिना मांग बढ़े (क्योंकि अभी तो कई लहरों की महामारी में लोग घरों में घुसे रहने हैं। पैसा उन चीजों में मसलन दवा-दारू, सरसों के महंगे तेल जैसी जरूरी चीजों में खर्च होगा न कि साइकिल खरीदने या मकान की किस्त अदा करने पर) विकास में गति नहीं है तो वित्तीय घाटे का दिवालियापन और बेसिक चीजों की महंगाई का अलग हाहाकार! मतलब हर पहलू, हर कोण में आर्थिकी दिवालिया होने की तरफ!

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