श्रेय मोदी को, ठीकरा राज्यों पर

ऐसा कमाल सिर्फ भारत में हो सकता था और तभी सिर्फ भारत में ही हो रहा है। कोरोना वायरस के संक्रमण से लड़ाई में जो अच्छा है उसका श्रेय तो केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जाता है लेकिन जो भी कमी है, गड़बड़ी है उसका ठीकरा राज्यों पर फोड़ा जा रहा है। वह भी खासतौर से विपक्षी पार्टियों वाले राज्यों की सरकारों पर। भले अपनी पार्टी के शासन वाले राज्यों कोरोना की महामारी चौतरफा फैल रही हो पर उनके ऊपर सवाल नहीं उठाना है। कठघरे में सिर्फ विपक्षी पार्टियों के मुख्यमंत्रियों को खड़ा करना है। और हां, जहां तक संभव हो उनको राजनीति में भी उलझाए रखना है, चाहे उसके लिए कुछ भी करना पड़े, राज्यपाल के कार्यालय का ही इस्तेमाल क्यों न करना पड़े।

बहरहाल, पहले श्रेय और ठीकरा फोड़ने का खेल समझें। आबादी के अनुपात में और कोरोना वायरस का संक्रमण शुरू होने की सूचना देने वाले पहले केस की तारीख के हिसाब से भारत में कम मामले हैं। इसमें कोई संदेह नहीं है। भारत में पहला केस 30 जनवरी को आया और भारत की आबादी 130 करोड़ है। फिर भी तीन महीने आठ दिन बाद भारत में कोरोना संक्रमण का मामला 56 हजार से ज्यादा पहुंचा है। यह संख्या कम है तो इसका समूचा श्रेय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दिया जा रहा है। वे खुद कई बार यह श्रेय ले चुके हैं और बचा-खुचा काम उनकी पार्टी का आईटी सेल और सोशल मीडिया में उनके लंगूर कर रहे हैं। उनके हिसाब से दुनिया ने लोहा मान लिया है कि प्रधानमंत्री मोदी के कारण यह चमत्कार है। वे इसके लिए भगवान को धन्यवाद दे रहे हैं कि आज देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं।

हालांकि यह विचार नहीं किया जा रहा है कि इस संख्या को कम रखने के लिए देश को कितनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ी है और न इस पर विचार किया जा रहा है कि कब तक संख्या को काबू में रखा जा सकेगा। हकीकत है कि सरकार देश की जनता को वायरस से सौ जूते भी खिला रही है और सौ प्याज भी खिला रही है। संख्या कम रखने के लिए जब देश में चार सौ से भी कम मामले थे तभी पूरे देश में लॉकडाउन कर दिया गया और पुलिस को खुली छूट दे दी गई कि जैसे भी हो लोगों को घरों से निकलने से रोका जाए। इसमें संदेह नहीं है कि इसकी वजह से संक्रमण की रफ्तार घट गई। पर चार घंटे के नोटिस पर किए गए लॉकडाउन का नतीजा यह निकला कि शहरों और महानगरों की झुग्गी झोपड़ियों और कच्ची बस्तियों में अंदर-अंदर नासूर की तरह कोरोना फैलता रहा। आज अहमदाबाद, इंदौर, मुंबई, दिल्ली आदि शहरों की जो दशा है वह इसी का नतीजा है कि बिना सोचे समझे सब कुछ बंद किया गया। जिस समय मामले कम थे उस समय बड़े शहरों और महानगरों को खाली कराया गया होता तो आज यह स्थिति नहीं होती। पर उसके लिए केंद्र सरकार को कठघरे में खड़ा करने की बजाय उलटे संख्या कम होने का श्रेय दिया जा रहा है।

सवाल है जब देश में संख्या कम है और उसका श्रेय प्रधानमंत्री को जाता है तो किसी राज्य या शहर में केसेज ज्यादा हैं तो उसकी जिम्मेदारी भी तो प्रधानमंत्री की ही बनती है! ऐसा तो नहीं हो सकता है कि संक्रमितों की संख्या 58 हजार ( कम टेस्ट से कम आंकड़े में) होने का श्रेय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जाए और उसी 56 हजार में से 18 हजार महाराष्ट्र में होने का ठीकरा उद्धव ठाकरे पर फूटे? या पश्चिम बंगाल, दिल्ली, तमिलनाडु में ज्यादा मामले टेस्ट से आ रहे हैं तो वहां के मुख्यमंत्री जानें! या तो इसे समग्रता में देखना होगा या टुकड़ों में देखना होगा। यह नहीं होगा कि देश का आंकड़ा प्रधानमंत्री का है और राज्यों का आंकड़ा उनका अपना है। अगर ऐसा करना है तो फिर सीधे ऐसे कह दिया जाए कि जिन सात राज्यों में कुल 80 फीसदी मामले हैं उनका जिम्मा प्रधानमंत्री का नहीं है और बाकी राज्यों में जहां 20 फीसदी मामले हैं, वह प्रधानमंत्री की वजह से है!

असल में कोरोना वायरस के संकट के समय में ही सारा फोकस झूठी बातों के प्रचार पर है। विपक्षी शासन वाले राज्यों को बदनाम करने पर है। अपनी जिम्मेदारी को लेकर सवाल से बचने का है। इस बात की जांच क्यों नहीं होनी चाहिए कि अहमदाबाद में इतने मामले आ रहे हैं तो कहीं उनके पीछे फरवरी के अंत में हुआ नमस्ते ट्रंप कार्यक्रम का हाथ तो नहीं है? यह सब जानते हैं कि लॉकडाउन से वायरस खत्म नहीं होता है, बल्कि उससे रफ्तार कम होती है और यह मौका मिलता है कि देश अपनी मेडिकल तैयारियों को दुरुस्त करें। क्या भारत में लॉकडाउन के 45 दिनों का इस्तेमाल मेडिकल तैयारियों को दुरुस्त करने के लिए हुआ है? रेलवे कोचेज को कोरोना मरीजों के लिए अस्पताल में बदलने के अलावा कोई ऐसा काम नहीं दिख रहा है, जिससे कहा जाए कि सरकार ने इस अवधि का सही इस्तेमाल किया है। टेस्टिंग किट से लेकर पीपीई किट्स तक का 90 फीसदी हिस्सा भारत आयात कर रहा है। इनकी खरीद में कैसी गड़बड़ियां हो रही हैं, यह भी सबने देखा है। या तो किट्स खराब हैं या बहुत ज्यादा महंगी हैं।

दुनिया ने देखा कि कैसे चीन ने दस दिन में वुहान में अस्थायी अस्पताल बना कर खड़ा कर दिया। क्या भारत में कहीं दिखा है कि सरकार ने अस्थायी अस्पताल खुलवाए? उलटे जो पहले से चल रहे निजी अस्पताल थे वे बंद हो गए। उनकी ओपीडी बंद हुई और ऑपरेशन थिएटर भी बंद कर दिए गए। कोरोना से इतर दूसरी बीमारियों वाले मरीजों को उनके हाल पर मरने के लिए छोड़ दिया गया। इलाज के लिए अस्पतालों में भरती मरीजों और क्वरैंटाइन में रखे गए लोगों की मुहंजबानी पता चल रहा है कि इन जगहों की क्या हालत है। ज्यादातर जगहों पर टॉयलेट गंदे हैं, नल टूटे हुए हैं, पंखे नहीं चल रहे हैं, नलों में पानी लगातार नहीं आ रहा है, साबुन या डिसइन्फेक्टेंट ज्यादातर जगहों पर नहीं है, स्वास्थ्यकर्मियों के पास पीपीई किट्स नहीं हैं, वे हाथ और पैर में प्लास्टिक की थैलियां बांध कर काम कर रहे हैं और बावजूद ऐसे अधकचरे प्रबंध की बजाय केसेज कम होने का श्रेय प्रधानमंत्री को देने की हल्लेबाजी हुई। कोरोना से जंग जीत जाने याकि 18 दिन में महाभारत की तरह 21 दिन में कोरोना से जंग जीत लेने के मोदी के दावे में दीये, ताली-थाली बजवाने की नौटंकियां हुई। उसके बाद फिर देश के आम लोगों के त्याग, समर्पण, तपस्या, प्रार्थना, प्रतिबद्धता, अनुशासन आदि के दम पर 40 दिन में जंग जीत लेने का बिगुल बजा।यह तो  बुरा हो कोरोना वायरस का जो इतने कठोर लॉकडाउन और राष्ट्र के नाम इतने संबोधनों के बावजूद भी खत्म नहीं हुआ और उलटे फैलता जा रहा है।

6 thoughts on “श्रेय मोदी को, ठीकरा राज्यों पर

  1. आप जैसे चाटूकार पत्रकार आलोचना करते समय भारत देश का कोरोना चीरहरण के जमाती फैलाव पर भीष्म पितामह बन नजरें क्यों चुरा लेते हैं चेहरा फेर कर मुँह में दही जमा लेते है? निर्भीक पत्रकारिता का दम्भ भरने वाले इतने कमज़र्फ है? नमस्ते ट्रम्प की जलन में जलने वाले चाटुकारों को अपनी पत्रकारिता की लेखनी में तब्लीगी जमात का फैलता दावानल नज़र न आया?

    1. ये पोंगा पंडित हैं …. कांग्रेस के तथाकथित हिंदुवादी इको सिस्टम को बखूबी चला रहे थे जब बीजेपी विपक्ष में थी। जब मोदी शाह ने बीजेपी का घोषणापत्र लागू किया तो इनके नकाब उतर गए….. नोटबंदी में इनका बहुत नुकसान हुआ … तब से पोंगा पंडित जी एकदम विषाक्त हो गए हैं… इनके सारे आंकलन गलत साबित होते रहते हैं और ये बेशर्मी से लगे रहते हैं …

      1. नवीन रावत जी,

        बिल्कुल सही कहा आपने।

        ये हँसोड़ निर्लज्ज है कांग्रेसियों की तरह इनकों कितना भी फटकार लगा लो, इनकी 70 सालों में मलाई खा खा कर गैंडे जैसी मोटी हो गई चमड़ी पर कोई असर नहीं पड़ता है। इनके लिए सही शब्द ढूंढ निकाला आपने पोंगा पण्डित! तथाकथित हिन्दूवादी इको सिस्टम से नतमस्तक चाटूकार को सहलाने वाले यदा कदा चापलूस टिप्पणी कर दे तो ये आत्मविभोर हो आत्ममुग्ध हो जाते है और खुद को पण्डित समझने लग जाते है। आलोचना की पीत पत्रकारिता करते करते ये समालोचना को भूल ही गये है जो कि पत्रकारिता का मूल है। ये अपने आपको विपक्ष समझ मीडिया के डंडे से जनता व जनप्रतिनिधियों के चुने हुए प्रधानमंत्री मोदी की हँकाई करना चाहते हैं और चाटूकारिता में पोंगा पण्डिताई का प्रदर्शन कर अपनी दबी कुचली भड़ास निकालने का प्रयास कर रहे हैं।

  2. Vyas ji.
    Aap k hisab se PM bekar h. Directly aapka aarop yahi rahta h. Mere hisab se aap ek interview maa aur bete ka le hi le.
    Open interview ho koi support Karne wala nahi ho. Hum bhi jane ki jinko aap parde k piche se support karte h unki Kya knowledge h.
    Modi ji pahla interview aapne hi liya that 2014 me an Kya ho Gaya.
    Hamara Kam Naya India read karna h Baki Jo aap likho

    1. ये कहने को हिन्दू, ब्राह्मण और पण्डित बन जाते हैं पर ये सब शब्द इनकी स्वार्थ की टाट तले दबे रहते है, ताई पप्पू जो काम नहीं कर पा रहे हैं उनका बीड़ा, चापलूसी में रत ये महाशय प्रधानमंत्री पर पत्रकारिता के तीर कमान चला उठा रहे हैं।

      कैलाश माहेश्वरी
      भीलवाड़ा-राजस्थान।
      94141-14108

  3. Marna toh sabko hai ,jiska uday uska aast bhi sunischit hai fir bhi log bhrama mey jite hai.Manavata ke leye bahut birle hi jite hai jo uske kathani or karni se hi dikh jata hai.Manav muly ki baate sunane mey aachchhi lagti hai,pt.din dayal upadhyay bahut birle hi paida hote hai.

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