न दवा है और न वैक्सीन

कोरोना वायरस की हकीकत है कि अभी न तो इसकी कोई दवा है और न कोई वैक्सीन है। जिस रेमडिसिविर दवा को कोरोना के गंभीर मरीजों के ऊपर रामबाण दवा की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है उसके बारे में दुनिया के वैज्ञानिकों का कहना है कि इसका असर बहुत सीमित है। यानी यह पक्का इलाज नहीं है। इसी तरह प्लाज्मा थेरेपी को भी बहुत सीमित असर वाला माना जा रहा है। यह सही है कि केसेज बढ़ने के बावजूद मृत्यु दर कम हुई है पर यह भी कोई बहुत राहत की बात नहीं है क्योंकि बड़ी संख्या में ऐसे मामले सामने आ रहे हैं, जिनमें कोरोना के मरीज ठीक होने के दो-चार-छह महीने बाद मर रहे हैं। उन्हें कोविड की मौत नहीं माना जा रहा है पर इसमें भी संदेह नहीं है कि कोरोना ऐसी बीमारियों पैदा कर रहा है या बढ़ा रहा है, जो जानलेवा हो रही हैं।

हर दिन कोरोना को लेकर नए रिसर्च आ रहे हैं। अभी तक दुनिया इसको पूरी तरह से जान ही नहीं सकी है तो इसे रोकने के लिए प्रभावी वैक्सीन बना लेने के दावे पर भरोसा करना भी संभव नहीं है। यहीं कारण है कि दुनिया भर की मेडिकल संस्थाएं कह रही हैं कि अगर वैक्सीन 50 फीसदी भी कारगर रही तो उसका इस्तेमाल कर लिया जाएगा। यह अपने आप में बड़े खतरे वाली बात है। इसके बावजूद विश्व स्वास्थ्य संगठन, डब्लुएचओ ने कहा है कि जो स्वस्थ हैं और युवा हैं उन्हें 2022 तक वैक्सीन नहीं मिलेगी। यह याद रखना होगा कि युवा और स्वस्थ होना कोरोना से बचने की गारंटी नहीं है। बहरहाल, सब मान रहे हैं कि वैक्सीन का इतनी मात्रा में उत्पादन नहीं हो पाएगा कि सबको एक डेढ़ साल में वैक्सीन दी जा सके।

जिनको वैक्सीन लग जाएगी वे भी सुरक्षित रहेंगे इसका भी दावा कोई नहीं करेगा। आखिर दुनिया भर ने मान लिया कि जो लोग इलाज से ठीक हो रहे हैं और जिनके बारे में माना जा रहा था कि छह महीने तक एंटीबॉडी उनके शरीर में रहेगी वे भी एक सौ दिन के भीतर दोबारा संक्रमित हो रहे हैं। दुनिया में कम से कम 24 ऐसे केसेज आए हैं। वैक्सीन की पहली या दूसरी डोज हो सकता है कि बहुत  कारगर नहीं हो, इसका अंदाजा इस बात से भी लगता है कि सारी दुनिया को वैक्सीन उपलब्ध कराने की ठेकेदारी अपने ऊपर लेने वाले बिल गेट्स ने कहा है कि दूसरी जेनेरेशन की वैक्सीन आएगी तब जाकर दुनिया पहले जैसी सामान्य अवस्था में लौटेगी। इसका मतलब है कि पहले जेनेरेशन की वैक्सीन जैसे तैसे जान बचाने का जुगाड़ है।

कोरोना को लेकर हर दिन नए रिसर्च आ रहे हैं, जिनसे इसके फैलने के नए तरीकों का पता चल रहा है तो साथ ही इससे होने वाली दूसरी बीमारियों और अन्य खतरों का भी पता चल रहा है। अब रिसर्च से पता चला है कि करंसी नोट पर यह वायरस लंबे समय तक जीवित रह रहा है। हालांकि हर चीज में साजिश थ्योरी देखने वालों का कहना है कि यह अमेरिका की डिजिटल पेमेंट कंपनियों वीजा और मास्टर कार्ड की फैलाई हुई अफवाह है, जिसका मकसद दुनिया में डिजिटल पेमेंट को बढ़ावा देना है। लेकिन इसे अफवाह मान कर लापरवाह होना भारी पड़ सकता है। कुल मिला कर कोरोना का वायरस अब हर जगह है और हर चीज से फैल रहा है।

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