वैक्सीन में देशी कंपनियां

भारत में भी वैक्सीन की कोशिश चल रही है। भारत बायोटेक, आईसीएमआर और एनआईवी मिलकर वैक्सीन बना रहे है। क्लीनिकल ट्रायल चल रहा है। इसके अलावा जायडस-कैडिला और अरविंदों फार्मा भी वैक्सीन परीक्षण कर रही है। लेकिन भारत की यह कोशिश ज्यादा सार्थक है जो वह दुनिया में इस लॉबिंग में है कि अमेरिकी-योरोपीय कंपनियां जो वैक्सीन बना रही है वे मानवता के तकाजे में बिना पेंटेंट के हो। फाइज़र/बायोएनटेक मॉडर्ना, ऑक्सफोर्ड-एस्ट्राजेनेका आदि कंपनियां तमाम देशों और कंपनियों को तकनीक-फार्मूला दे कर फ्री में वैक्सीन बनाने दे। यदि ऐसा हो जाए भारत के मजे होंगे। 138 करोड़ आबादी के कारण भारत को इतने अधिक डोज चाहिए कि वह वैक्सीन बनाने की देशी क्षमता का भरपूर उपयोग और विस्तार दोनों कर सकती है। ऐसा हो सकना संभव नहीं लग रहा है। भारत को महंगे दाम पर वैक्सीन खरीदनी होगी। भारत की दवा कंपनियों की वैक्सीन के भरोसे 138 करोड़ लोगों के टीकाकरण का प्रोग्राम नहीं चल सकता है। अपना मानना है कि स्वास्थ्य मंत्री ने जुलाई-अगस्त 2021 तक चालीस-पचास करोड डोज उपलब्ध होने की जो बात कही है उसमें विदेशी कंपनियों से खरीद अधिक होगी। फिर भले वह रूस से खरीदी हुई हो या ब्रितानी कंपनी से।

दिक्कत यह है कि वैश्विक वैज्ञानिकों-मीडिया में फाइज़र/बायोएनटेक मॉडर्ना, ऑक्सफोर्ड-एस्ट्राजेनेका वैक्सीन की भले धूम हो लेकिन ये भारत की गर्मी, इंफ्रास्ट्रक्चर के अनुकूल नहीं है। ये और इनके साथ रूस की वैक्सीन का भंडारण बहुत कम तामपान में होना चाहिए।। किसी को माइनस 38 सेंटीग्रेड के तापमान में तो किसी को बीस डिग्री से कम तामपान पर। उस नाते सोचा जा रहा है कि एमआरएनए, डीएनए, वायरल वेक्टर आधारित वैक्सीन के बजाय प्रोटीन आधारित वैक्सीन का भारत में टीकाकरण मिशन बन। ऐसे वैक्सीन भी अमेरिका की नौवावेक्स, सेनोपी कंपनियां बना रही है लेकिन इसके रिजल्ट, इसके परीक्षण, मूल्य आदि में फिलहाल सबकुछ अनिश्चित है। तभी अपने यहां कैसी वैक्सीन बनेगी, किस वैक्सीन को चुना जाएगा और उसकी कीमत के फैसले आसान नहीं है। फिलहाल सबकुछ रामभरोसे माना जाए!

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