लॉकडाउन और अनलॉक के मारे

कोरोना वायरस का संक्रमण रोकने के लिए लॉकडाउन लागू हुआ तो कौन मारा गया और अब अनलॉक चल रहा है तो कौन मर रहा है? इस सवाल पर जितना विचार करेंगे उतना दिमाग भन्नाएगा, अपने सिस्टम पर उतना गुस्सा आएगा लेकिन आप कुछ नहीं कर सकते हैं क्योंकि सिस्टम डंडे के सहारे चल रहा है। एक दिन रात आठ बजे डंडा चला कि रात 12 बजे से पूरा देश बंद हो जाएगा और पूरा देश बंद हो गया। लोग घरों में दुबक गए। जो घरों से निकला उसका डंडों से स्वागत हुआ। महीनों तक पूरा देश पुलिस राज में बदला रहा। हजारों, लाखों लोगों ने सड़क पर पुलिस के डंडा चलाने के वीडियो शेयर किए, देखे और दिखाए। लेकिन यह भी देश के लोगों के लिए मजाक की बात थी। जिस तरह से भेड़ें डंडा मारे जाने पर मिमियाने के सिवा कुछ नहीं करती है वैसे ही इस देश के करोड़ों लोग सड़कों पर मिमिया रहे थे और जो घरों में बैठे थे वे इस पर हंस रहे थे। लाखों लोग डंडों की परवाह किए बगैर पैदल, परिवार को लेकर अपने घरों के लिए निकले और मरते-खपते अपने घर पहुंच गए। उन्होंने नौकरी और रोजगार सब गंवाए।

लॉकडाउन की सबसे भारी मार इसी गरीब वर्ग पर पड़ी। उसे हजार की किस्म की मुश्किलें झेलनी पड़ी हैं। वह नौकरी और रोजगार गंवा कर घर पहुंच गया पर उसे वहां भी चैन नहीं है क्योंकि उसके लिए वहां न नौकरी है और न रोजगार। सरकार अभी तक स्किल मैपिंग कर रही है। घर लौटे प्रवासी मजदूरों को काम देने के लिए पोर्टल बनाए गए हैं, जिस पर लाखों मजदूरों ने जैसे तैसे रजिस्ट्रेशन कराया है पर उनमें से पांच फीसदी को भी नौकरी नहीं मिल पा रही है। मजदूर जब घर लौटे तो राहत पैकेज के तहत सरकार ने महात्मा गांधी नरेगा में 40 हजार करोड़ रुपए का अतिरिक्त फंड दिया पर उसके तुरंत बाद मॉनसून शुरू हो गया और मनरेगा के भी सारे काम बंद हो गए। सो, मनरेगा के काम के लिए अप्रैल के बाद से 85 लाख के करीब लोग रजिस्ट्रेशन करा चुके हैं, यह अपने आप में एक रिकार्ड है। लोग रजिस्ट्रेशन करा कर काम मिलने के इंतजार में हैं।

गांव, कस्बों में पहुंचे लाखों लोग अब काम की तलाश में वापस लौटने लगे हैं। वे इस भ्रम में हैं कि अब अनलॉक है तो उन्हें अपनी नौकरी और रोजगार वापस मिल जाएगा। पर शहरों, महानगरों में बड़ी निराशा उनका इंतजार कर रही है। वहां अब काम पहले के मुकाबले 10-20 फीसदी बचा हुआ है। इसका मतलब है कि जो लोग लॉकडाउन के प्रयोग में मारे गए, वे ही अनलॉक के प्रयोग में भी मर रहे हैं। उनके लिए न अपने गांव में काम है और न पुरानी काम की जगह पर कोई संभावना है। सरकार ने अनलॉक तो कर दिया पर लाखों लोगों की किस्मत पर जो ताला लगा है वह अनलॉक नहीं होने वाला है। वह न घर का है न घाट का।

ऐसा नहीं है कि सिर्फ निम्न वर्ग पर लॉकडाउन की मार पड़ी। शुरू के दो-तीन महीने तो ऐसा लगा कि गरीब लोगों पर इसकी मार ज्यादा पड़ रही है। पर जैसे जैसे हालात बिगड़े और कोरोना का मामला छठे महीने में पहुंचा, समूचा मध्य वर्ग और निम्न मध्य वर्ग संकट में पड़ गया दिख रहा है। जैसे तैसे तीन-चीर महीने गृहस्थी की गाड़ी खींचने के बाद अब लोग बुरी तरह मुसीबत में फंसे हैं। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी का कहना है कि अप्रैल से अभी तक दो करोड़ दस लाख वेतनभोगियों की नौकरी गई है। दस करोड़ से ज्यादा लोगों ने स्वरोजगार गंवाया है। पर उनके सर पर हर तरह के भुगतान का डंडा लटका रहा। पेट भरने के साथ साथ बिजली, पानी से लेकर टेलीफोन और कर्ज की किस्तें चुकाने का डंडा लटका हुआ है। कर्ज की किस्तें चुकाने से छह महीने की छूट लोगों को मिली, लेकिन उस दौरान ब्याज के ऊपर ब्याज लगता रहा है। लोगों को समझ में नहीं आ रहा है कि वे कैसे तो कर्ज की किस्तें भरेंगे और कैसे ब्याज के ऊपर ब्याज देंगे।

जिस समय देश में पांच सौ केसेज थे, उस समय सारे दफ्तरों के साथ साथ सारे स्कूल-कॉलेज बंद करा दिए गए है। पर अब जब 90 हजार से ज्यादा केसेज रोज आ रहे हैं तब सरकार ने डंडे के जोर पर परीक्षाएं कराई हैं। इंजीनियरिंग में दाखिले के लिए जेईई मेन्स की परीक्षा एक से छह सितंबर के बीच हुई है। कोरोना की वजह से एक चौथाई से ज्यादा छात्र परीक्षा में शामिल नहीं हुए। उन दो लाख से ज्यादा छात्रों के भविष्य के बारे में सोचिए, जो परीक्षा में नहीं शामिल हुए। उनका पूरा साल बरबाद हुआ। जो शामिल हुए उन्होंने कोरोना का जोखिम लिया। उनमें से कितने संक्रमित होते हैं, यह कभी पता नहीं चल पाएगा। देश भर में छात्र, अभिभावक, शिक्षाविद, सुब्रह्बण्यम स्वामी जैसे सुधि लोग परीक्षा रोकने की अपील करते रहे पर सरकार ने डंडे के दम पर परीक्षा कराई। 13 सितंबर को डंडे के दम पर ही मेडिकल में दाखिले के लिए नीट की परीक्षा होगी। कोई सुनने वाला नहीं है। सरकार ने डंडा चला दिया और अदालत ने कह दिया कि कोई उसके पास नीट की परीक्षा टलवाने नहीं आए, वह कोई याचिका नहीं सुनेगी। क्या दुनिया के किसी और देश में नागरिकों को ऐसी असहायता का सामना करना पड़ा होगा? लॉकडाउन किया तब से घरों में बंद छात्र अनलॉक में भी घरों में ही हैं और घरों में ही रहना चाहिए पर स्कूल, कॉलेजों की फीस की तलवार लोगों के सर पर लटकी है।

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