गिनी पिग से है हम लोग!

कोरोना वायरस की महामारी ने भारत के लोगों और यहां की शासन व्यवस्था की सचाई दुनिया के सामने बताई है। उसमें एक सचाई यह भी है कि यहां के लोग गिनी पिग हैं। कोरोना के बहाने इस देश के लोगों पर जितने प्रयोग हुए हैं या हो रहे हैं वह बेमिसाल है। दुनिया के किसी भी देश ने अपने नागरिकों पर इतने प्रयोग नहीं किए, जितने इस देश की सरकार ने किए हैं। वायरस का संक्रमण शुरू होते ही लॉकडाउन लगाने से लेकर अनलॉक तक में हकीकत जनता के गिनी पिग होने की है।

गिनी पिग वह प्राणी है, जिसकी सेहत की चिंता किए बगैर उसके ऊपर किसी तरह का परीक्षण किया जा सकता है। इसकी ताजा मिसाल ऑक्सफोर्ड एस्ट्राजेनेका की वैक्सीन के परीक्षण का है। ब्रिटेन में इस वैक्सीन के परीक्षण में शामिल एक व्यक्ति की जैसे ही तबियत खराब हुई वैसे ही वहां परीक्षण रोक दिए गए। वैक्सीन बनाने वाली कंपनी ने खुद आगे आकर इसका ऐलान किया। सरकार की किसी एजेंसी को इसके लिए नोटिस नहीं जारी करना पड़ा। पर उसी वैक्सीन के भारत में ट्रायल का क्या हुआ? एक वालंटियर के बीमार होने और वैक्सीन का ट्रायल रोके जाने के 48 घंटे बाद तक भारत में ट्रायल चलता रहा। उलटे वैक्सीन बनाने वाली कंपनी ने ट्विट करके कहा कि यहां कोई दिक्कत नहीं है या ट्रायल चलता रहेगा। क्यों चलता रहेगा? क्या यहां के लोग ब्रिटेन की तरह देश के नागरिक नहीं हैं, गिनी पिग हैं? जब कंपनी पर ड्रग एजेंसी का डंडा चला तो वैक्सीन का ट्रायल रूका।

इसी तरह कोरोना के प्लाज्मा थेरेपी से इलाज का जैसे प्रयोग भारत में हुआ वैसा दुनिया में और कहीं नहीं हुआ। दुनिया के देश पहले कई बीमारियों में प्लाज्मा थेरेपी का इस्तेमाल करते रहे हैं। पर कोरोना वायरस के संक्रमितों के इलाज में इसके प्रभावी होने का कोई साक्ष्य नहीं होने के बावजूद भारत में जून में ही प्लाज्मा थेरेपी से इलाज शुरू हो गया। कई राज्यों में इसकी मंजूरी दे दी गई और प्लाज्मा बैंक बनाने का जोर-शोर से प्रचार शुरू हो गया। अब कहा जा रहा है कि इससे गंभीर संक्रमण वाले मरीजों को कोई फायदा नहीं है।

ऐसे ही मास्क और सैनिटाइजर के टनल का प्रयोग जैसा भारत में हुआ वैसा दुनिया में कहीं नहीं हुआ है। यह अमानवीयता भारत के लोगों ने ही देखी कि भेड़-बकरियों की तरह इंसानों की भीड़ को बैठा कर उनके ऊपर सैनिटाइजर के नाम पर मच्छर मारने वाली दवा का छिड़काव किया गया। वह भी एक प्रयोग था, जो बाद में डिसइंफ्केटेंट टनल के रूप में दिखा। देश भर में कंपनियां इस किस्म के टनल बनाने लगीं, जिनसे गुजर कर आदमी सैनिटाइज हो जाता था। जब इसमें सैकड़ों करोड़ रुपए का कारोबार हो गया तो अब सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि यह किसी काम का नहीं है, बल्कि इसक तरह के टनल बनाना अवैध है। सोचें, कंपनियों की तो कमाई हो गई पर जिन लोगों ने पैसे लगा दिए उनका क्या? यहीं काम मास्क के मामले में हुआ था। पहले एन-95 मास्क की ऐसी महिमा का प्रचार हुआ कि सौ रुपए का मास्क चार सौ-पांच सौ रुपए में बिकने लगा पर बाद में पता चला कि वाल्व लगा मास्क कोरोना का संक्रमण रोकने में सक्षम नहीं है।

कोरोना की टेस्टिंग जैसे मामूली मामले में देश के लोग मारे-मारे फिर रहे हैं। दुनिया के ज्यादातर देशों ने अपने यहां टेस्टिंग फ्री की है। उसके बाद इलाज के लिए भले लोगों को ज्यादा पैसे देने पड़ रहे हैं पर टेस्टिंग फ्री है। जिसको जब लगे कि टेस्ट की जरूरत है तो वह जाकर टेस्ट करा सकता है। पर भारत में कोरोना वायरस की टेस्टिंग हिमालय पहाड़ पर चढ़ने जैसा है। न सहज भाव से टेस्टिंग हो रही है और न सहज तरीके से किसी दूसरी बीमारी के लिए लोग अस्पताल में भरती हो पा रहे हैं। अस्पताल में भरती और इलाज के लिए इतने तरह के दिशा-निर्देश बना दिए गए हैं कि उनके हवाले अस्पताल वाले मरीजों को बाहर से ही टरका दे रहे हैं। कोरोना संकट के बीच अस्पताल में भरती होना एक उपलब्धि की तरह है।

कोरोना वायरस के इलाज के लिए सबसे ज्यादा जोर वेंटिलेटर पर दिया गया। खबर है कि पीएम केयर्स फंड से सबसे ज्यादा पैसा वेंटिलेटर खरीद के लिए ही दिया गया है। पर इसमें देश के नागरिक गिनी पिग ही निकले हैं क्योंकि वेंटिलेटर बनाने वाली कई नई कंपनियों ने अलग अलग जो उत्पाद पहुंचाएं हैं उनमें से काफी वेंटिलेटर नकली निकले हैं और हाल ही में खबर आई है कि एक अस्पताल में वेंटिलेटर से ही धुआं निकलने लगा और आग लग लग गई। कुल मिला कर मास्क से लेकर डिसइंफ्कटेंट टनल का मामला हो या वैक्सीन के ट्रायल से लेकर वेंटिलेटर बनाने तक का मामला हो, हर जगह प्रयोग ही हुए हैं।

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