मरने वाले सिर्फ नंबर हैं

भारत में कोरोना वायरस के संक्रमण से 77 हजार से ज्यादा लोग मर चुके हैं। दुनिया के सिर्फ दो देशों, अमेरिका और ब्राजील में ही इससे ज्यादा लोगों की मौत हुई है। अमेरिका में जब मरने वालों की संख्या एक लाख पहुंची तो वहां के एक अखबार ने अपने पहले पन्ने पर मरने वालों के नाम छापे। सिर्फ नाम, जिसका मकसद यह बताना था कि मरने वाले सिर्फ आंकड़ा या एक संख्या नहीं हैं, बल्कि नागरिक हैं, जिनकी इंसानी गरिमा का ख्याल रखा जाना चाहिए। क्या भारत में अगर कोई मरने वाले नागरिकों की सूची निकालना चाहे तो वह संभव हो पाएगा? मुश्किल लग रहा है क्योंकि यहां अस्पतालों में या घरों में या कोविड सेंटरों पर मरने वाले इंसान नहीं भेड़-बकरियां हैं।

उनकी मौत किस खाते में दर्ज हुई, उसकी रिकार्ड रखा गया या नहीं, किस तरीके से अंतिम संस्कार हुआ, यह सब पता लगाना आसान नहीं होगा। यहां तो ऐसा भी हुआ कि कोरोना के मरीज को ठीक बता कर अस्पताल से छोड़ दिया गया और बाद में उसका शव कहीं बाहर सड़क पर पड़ा मिला। यहां तो अनेक अस्पतालों ने मरीज और शव का भेद ही मिटा दिया। कई वीडियो ऐसे वायरल हुए, जिसमें मरीज लेटा हुआ है और उसके बगल में कोरोना संक्रमण से मरे मरीज का शव पड़ा हुआ है।

आम आदमी की क्या बात की जाए, सबने देखा कि उत्तर प्रदेश के अस्पताल में डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों की टीम ने राज्य सरकार के एक मंत्री और पूर्व टेस्ट क्रिकेटर के साथ कैसा बरताव किया। मौके पर मौजूद एक विधायक ने यह किस्सा विधानसभा में खड़े होकर बताया। सो, क्या आम आदमी और क्या मंत्री-विधायक सब सिस्टम के डंडे का शिकार हुए हैं। जिसके  हाथ में डंडा है उसने सबको एक तरह से हांका है।

अस्पतालों की नारकीय स्थिति को लेकर ऐसी खबरें आईं कि लोगों ने अस्पताल जाना बंद कर दिया। एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत हेल्थकेयर के टाइम बम पर बैठा है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक फरवरी के मुकाबले अभी अस्पतालों की ओपीडी में कैंसर के मरीजों का पहुंचा 80 फीसदी कम हो गया है। सोचें, कैंसर जैसी बीमारी के 80 फीसदी मरीज अस्पताल जाने से डर रहे हैं। कोरोना से तो क्या मर रहे हैं लोग जो दूसरी बीमारियों से मरेंगे। जिन बीमारियों में रेगुलर मेडिकल केयर की जरूरत होती है उसके मरीज भी अस्पताल जाने की जोखिम नहीं उठा रहे हैं। इसी तरह लाखों करोड़ों बच्चों को कोरोना काल में जरूरी टीके नहीं लगे हैं, उनकी सेहत का क्या होगा, भगवान मालिक है। अस्पतालों में होने वाली डिलीवरी में भारी गिरावट आई है, जिसका मतलब है कि घरों में असुरक्षित डिलीवरी बढ़ी है। भारत में टीबी के 27 लाख मरीज हैं, जो दुनिया में सबसे ज्यादा है। हर साल सवा चार लाख लोग टीबी से मरते हैं। कोरोना काल में टीबी के मरीजों की देखभाल बंद है या बहुत मामूली है। आगे इससे मरने वालों की तादाद बढ़े तो हैरानी नहीं होगी।

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