सर्वत्र अव्यवस्था, मेस!

पता नहीं क्या होगा भारत का, हम हिंदुओं का! सर्वत्र ऐसी अव्यवस्था में जीते हुए कि सबकुछ खोखला, जर्जर और भटका हुआ!  सभी दिशाओं, सभी मामलों में खाली और खोखला। न सरकार में दिशा न विपक्ष में। न दिमाग चलता हुआ और न हाथ-पांव! चीन की चुनौती के आगे  दिमाग खाली तो शरीऱ लाचार। वायरस 138 करोड लोगों की जान से खेलते हुए है लेकिन जी रहे है इस झूठ में कि वायरस खत्म हो रहा है। लोग बीमार हो, दहशत में हो या भूख, बेरोजगारी से अधमरे, किसी को यह सुध नहीं जो झूठ से बाहर निकल सोचे कि ऐसा कब तक, कितने महिने, कितने साल चलेगा? मानों पूरा देश सूखी लकड़ी की तरह ठूंठ, संवेदनाशून्य- चेतनाशून्य हो। किसी को कोई फ्रिक नहीं है। आर्थिकी जिन्न की तरह हवा-हवाई है लेकिन लोग श्मशान में राशन-पानी के भंडारे से संतुष्ट है।  बुद्धी, दिमाग, सत्य छू मंतर लेकिन  जादूगर का शो जस का तस!  लोकतंत्र वैंटिलेटर पर मुर्दा लेकिन डाक्टर उसके जीने होने के झूठ में नागरिकों में भ्रम बनाए हुए है कि सब ठिक है।

ब ठिक है लेकिन है कुछ नहीं। चीन जमीन कब्जाए बैठा है। वायरस से लोग मरे रहे है। बरबाद आर्थिकी में जेबे खाली है लेकिन सब ठिक है। मैंने आज की गपशप से पहले सोचा कि सुर्खियों पर फोकस बना कर गपशप लिखी जाए। मतलब लंगूर टीवी चैनलों में लंगूरों की आपसी लड़ाई पर लिखा जाए। रिहा चक्रवर्ती की रिहाई पर लिखा जाए या हाथरस की घटना पर लिखा जाए या बिहार की चुनावी लड़ाई में चिराग पासवान के एक्स फैक्टर पर लिखा जाए या राहुल गांधी की किसान राजनीति पर लिखा जाए। लेकिन क्या ये सुर्खियां अपने आपमें अव्यवस्था-बरबादी-पूरे देश के भटके होने की प्रतीक नहीं है?

आप दुनिया के अलग-अलग देशों के मीडिया, वैश्विक टीवी चैनल की सुर्खियों पर गौर करें तो हर देश में नंबर एक चिंता व नैरेटिव वायरस और उससे आर्थिकी पर प्रभाव, जनजीवन के पटरी से उतरने की होगी। हर देश, हर सरकार महामारी और उससे जीवन के अलग-अलग पहलूओं (सरकार की रीति-नीति, अच्छाई-बुराई, लोगों की मानसिक दशा, बच्चों के स्कूल, अलग-अलग आर्थिक क्षेत्रों, लोगों को अनुदार-भत्ते-राहत के नित नए पैकेज आदि) पर खबर लेते-देते-सुनते-पढ़ते मिलेगे लेकिन भारत पूरी तरह बिना फोकस के है।

ऐसा इसलिए है क्योंकि समझ-बुद्धी-विचार-व्यवस्था होगी तो विचार होगा। आजाद भारत के इतिहास में यह पहला मौका है जब भारत का प्रधानमंत्री, केंद्र-प्रदेश की तमाम सरकारे, नौकरशाही, कार्यपालिका, विधायिका, न्यायपालिका मीडिया और पार्टिया (पक्ष-विपक्ष सभी) इस एक सूत्र में काम कर रहे है कि असली मुद्दों पर, रियल इश्यू पर फोकस नहीं बने। उस नाते मोदी-भाजपा सरकार लोगों की जान से जितनी खेल रही है उतनी कांग्रेस या आप पार्टी या बाकि पार्टियों की सरकारे भी खेल रही है। अरविंद केजरीवाल भी टीवी पर भाषण कर रहे है कि हमने वायरस पर काबू पा लिया है तो नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार मार्च से ही 21 दिनों में महामारी पर महाविजय का ऐलान किए हुए है।

इसकी कीमत जन-जन को, आर्थिकी को, राष्ट्र-राज्य के आत्मबल को दस तरह से चुकानी पड रही है। हां, नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार का आत्मबल चीन के आगे फटा हुआ है तो बेकग्राउंड में वायरस से बनी परिस्थितियां भी है। सही है भारत वायरस से पहले ही दिवालिया हुआ पड़ा था। आर्थिकी खोखली थी लेकिन महामारी ने आर्थिकी को पूरी तरह बरबाद, जर्जर बना वैंटिलेटर पर लेटा दिया है। तभी यदि सर्दियों में चीन ने यदि गडबड की तो क्या होगा, यह सोचना कंपकंपा देने वाला है।

दलील है कि असली मुद्दे खबर में छाए तो जनता में पैनिक बनेगा। लोग घबराएंगे। आर्थिकी नंगी हो जाएगी। शेयर बाजार घड़ाम गिरेगा। लोग थू-थू करेंगे। चीन शेर हो जाएगा। हालात बेकाबू होंगे। विपक्ष और लोग जीना हराम कर देंगे। असंतोष से अव्यवस्था बढ़ेगी। इसलिए तमाम तरीकों से झूठ, हल्ले, सनसनी, किस्सागोई की अव्यवस्था बेहतर है बनिस्पत रियल इश्यू में रियल लाचारगी से पैदा होने वाली अव्यवस्था के।

तभी अपना निष्कर्ष है कि हिंदूओं को राज करना नहीं आता है! अमेरिका, ब्रिटेन, योरोप, इजराइल आदि तमाम देश जब रियल इश्यू को आगे रख कर भिड़े हुए है, महामारी वहां नंबर एक इश्यू है, आर्थिकी नंबर दो इश्यू है, चीन से भिड़ना नंबर तीन इश्यू है तो भारत में इन तीनों मुद्दों से किनाराकस्सी क्या यह साबित नहीं करती कि हममें न रियलटी से सामना करने की हिम्मत है और न हम सच्चाई में जीते है। राष्ट्र-राज्य के सामने जो सर्वोच्च चुनौतियां है उसमें सरकार और जनता दोनों यदि मुंह चुराएं इधर-उधर की बातों, झूठ में जीते हुए अपने को वैंटिलेटर पहुंचा देने की मूर्खता करते है तो वह बरबादी की और बढ़ना है या स्वस्थ होना है।

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