बचत, पूंजी स्वाहा

कोरोना वायरस का संक्रमण रोकने के लिए सरकार ने जिस तरह आनन-फानन में और जितनी सख्ती से देश भर में लॉकडाउन लागू किया, उससे देश के हर आदमी की जमा पूंजी स्वाहा हुई है और इस बात को समझने के लिए अलग से किसी सर्वेक्षण की या बहुत ज्यादा बुद्धि लगाने की जरूरत नहीं है। देश के धन्ना सेठों से लेकर सबसे निचले तबके के आदमी के बयानों और उसके हालात को देख कर खुद ही अंदाजा हो रहा है। बजाज ऑटो समूह के प्रबंध निदेशक यानी एमडी राजीव बजाज ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी से बात करते हुए कहा कि सरकार ने गलत ग्राफ या कर्व को समतल कर दिया। उन्होंने कहा कि कोरोना वायरस का ग्राफ समतल करना था पर सरकार ने अर्थव्यवस्था का ग्राफ समतल कर दिया। राजीव बजाज देश के बड़े धन्ना सेठ हैं उनका कहना है कि अर्थव्यवस्था का भट्ठा बैठ गया।

जिस दिन उन्होंने यह बात कही उसी दिन सरकार के बहुत प्रिय माने जाने वाले देश के नंबर दो धन्ना सेठ गौतम अडानी की कंपनी ने दो बातें कहीं। अडानी की कंपनी ने कहा कि वह लॉकडाउन की वजह से इस समय हवाईअड्डों के संचालन का काम संभालने में सक्षम नहीं है। अहमदाबाद, लखनऊ और मैंगलोर हवाईअड्डा नीलामी में अडानी समूह को मिला पर कंपनी इसे अभी संभालने से इनकार कर रही है। इतना ही नहीं कंपनी ने यह भी कहा कि उसे असेट ट्रांसफर के मद में एयरपोर्ट ऑथोरिटी ऑफ इंडिया को अगस्त तक जो एक हजार करोड़ रुपए देने हैं उसकी अवधि दिसंबर तक बढ़ाई जाए क्योंकि कंपनी अभी इसका भुगतान करने में सक्षम नहीं है।

केंद्र सरकार ने मार्च में कंपनियों से कहा था कि वे लॉकडाउन की अवधि के वेतन का भुगतान कर्मचारियों को करें। इसके विरोध में कंपनियां सुप्रीम कोर्ट पहुंची हैं। उनका कहना है कि लॉकडाउन के कारण उनका काम ठप्प है और भारी घाटा हुआ है ऐसे में वे कर्मचारियों को वेतन कहां से दें। कंपनियों के इस रुख को देखते हुए सरकार के सुर बदल गए हैं। अब सरकार ने कहना शुरू कर दिया है कि यह कंपनियों और कर्मचारियों के बीच का मामला है। सुप्रीम कोर्ट ने कंपनियों से ऑडिट किया हुआ बैलेंसशीट दिखाने को कहा है। जाहिर है कि बैलेंसशीट जीरो मिलनी है। सो, इस बात की संभावना कम है कि लॉकडाउन अवधि में अपनी सारी जमा पूंजी गंवा चुके कर्मचारियों को इस अवधि का पूरा वेतन मिलेगा।

सरकार के कहने के बाद रिजर्व बैंक ने आम लोगों की कर्ज की किश्तों के भुगतान में राहत दी है। उन्हें छह महीने तक किश्तें नहीं भरने की छूट दी गई है पर बैंकों का हिसाब ऐसा है कि इन छह किश्तों के ऊपर पूरी कर्ज की अवधि तक ब्याज चलेगा और ब्याज के ऊपर ब्याज  लगेगा। इसका मतलब है कि छह किश्तों के बदले लोगों को 15-20 अतिरिक्त किश्तें भरनी पड़ सकती हैं। इसे लेकर भी लोग सुप्रीम कोर्ट पहुंचे हैं और मांग की है कि ब्याज माफ किया जाए। रिजर्व बैंक ने हलफनामा देकर हाथ खड़ा किया हुआ है कि अगर ब्याज माफ किया तो बैंकों की हालत खराब होगी। सोचें, रिजर्व बैंक, जिसके पास अभी भी नौ लाख करोड़ रुपए का आरक्षित कोष है और जो देश की सबसे ज्यादा मुनाफा कमाने वाली कंपनी है और जिसकी देख रेख में हर साल हजारों करोड़ रुपए का कर्ज बट्टेखाते में डाला जाता है उसकी ये हालत है।

धन्ना सेठों, कंपनियों, बैंकों की जो स्थिति है वहीं स्थिति सरकारों की है। दिल्ली सरकार इसकी मिसाल है, जिसने जनता के बीच जाकर कहा है कि उसके पास अपने कर्मचारियों को वेतन देने के पैसे नहीं हैं। दिल्ली सरकार ने केंद्र से पांच हजार करोड़ रुपए मांगे हैं ताकि दो महीने वेतन दिया जा सके। सोचें, दिल्ली सरकार, जिसका राजस्व सरप्लस में था, ढाई महीने के लॉकडाउन में उसकी क्या हालत हो गई। लगभग सभी राज्यों की हालत ऐसी ही है। उन्हें राहत इस बात से है कि केंद्र सरकार ने कर्ज लेने की सीमा को थोड़ा बढ़ा दिया है तो वे कर्ज लेकर अपना काम जैसे-तैसे चलाएंगे।

अंत में आम लोगों की हालत है। नीचे से जो शुरुआत हुई थी वह मध्य वर्ग तक पहुंच गई है। सबसे पहले सबसे कमजोर वर्ग के लोगों की जमा पूंजी स्वाहा हुई है और इसी वजह से वे घरों से निकल गए। अपने छोटे छोटे बच्चों, घर की महिलाओं और अपनी सारी जमा पूंजी, जो एक गठरी में या एक साइकल पर आ गई, उसे लेकर निकल पड़े। इस दौरान वे कैसी भयावह स्थितियों से गुजरे इस बारे में बहुत कुछ कहा जा चुका है। उसके बाद निम्न मध्य वर्ग के लोगों की जमा पूंजी स्वाहा हुई और वे स्पेशल ट्रेनों के जरिए घर जाने लगे। राजधानियों को जोड़ने वाली विशेष ट्रेनों, एक जून से शुरू हुई ट्रेनों और हवाईअड्डों पर दिखने वाली भीड़ निम्न मध्य वर्ग और मध्य वर्ग के लोगों की है, जमा पूंजी खत्म होने की चिंता में पलायन कर रहे हैं। मध्य वर्ग की जमा पूंजी खत्म होने का आलम यह है कि घर में रखे पैसे खत्म हो गए तो बैंकों से निकाला गया और रिजर्व बैंक का आंकड़ा है कि एक अप्रैल से 22 मई के बीच लोगों ने एक लाख 35 हजार करोड़ रुपए की नकदी बैंकों से निकाली। यानी लोगों बैंकों में रखी गई जमा पूंजी भी निकाल कर खा रहे हैं और सरकार के सब कुछ खोल देने के बावजूद इस चिंता में हैं कि अगर अर्थव्यवस्था की स्थिति ऐसी ही रही तो आगे क्या होगा! इस जमा पूंजी के साथ साथ एक बड़ी आबादी की निजता, इंसानी गरिमा, सम्मान से जीने का संविधान से मिला अधिकार सब कुछ स्वाहा हो चुका है।

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