विज्ञान-पश्चिम को सलाम!

मैंने 10 फरवरी 2020 के अपन तो कहेंगे कॉलम ‘सोचें, वायरस में थर्राई दुनिया पर!’ में लिखा था कि प्रकृति और मानव में यह होड़ अंतहीन है कि तुम डाल, डाल तो मैं पात, पात! किसने सोचा था कि प्लेग, चेचक, टीबी जैसी बीमारियों पर इंसान काबू पाएगा तो कैंसर, सार्स, इबोला या कोरोना वायरस जैसे नए रोग आ खड़े होंगे? …मगर मैं आशावादी नजरिया लिए हुए हूं। इंसान जीत लेगा यह लड़ाई। उस नाते हम-आपको विज्ञान और उसके सत्य में जीते हुए पश्चिमी देशों-अमेरिकी-योरोपीय सभ्यता के लिए ताली बजाना चाहिए जो वर्ष 2020 में मानव सभ्यता के लिए नया गौरव, नई उपलब्धि बनाई है।

सोचे, एक साल से भी कम अवधि मे अमेरिका-योरोपीय देशों की प्रयोगशालाओं में वैज्ञानिक ने वह चमत्कार किया जो मानव इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ। हम नहीं समझ सकते लेकिन समझे इस बात को कि कुछ ही महिनों में वायरस -महामारी का तोड़ निकल आया। इससे पहले जितनी महामारियों से इंसान का सामना हुआ है उसमें सालों लगे महामारी के कारण को जानने और उसका तोड़ निकालने में। मगर सन् 2020 में यह आश्चर्य है कि जनवरी में चीन से वैज्ञानिकों को नए कोरोना वायरस का जेनेटिक क्रम मिला और दस महिने के भीतर वैक्सीन खोज ली गई। ज्योहि वैज्ञानिकों को अनाम वायरस की रचना प्राप्त हुई और वैज्ञानिक उसे पिंजरे में बांधने, शरीर के भीतर अनजाने वायरस को कैद कर, बांधने, मारने की वैक्सीन बनाने में जुट गए।

वैज्ञानिकों ने क्या सोचा? शरीर में घुसे वायरस को वायरस से याकि लौहे को लौहे से मारने का रिसर्च किया। वे ऐसी वैक्सीन डिजाइन में जुटे जिससे शरीर का इम्युन-प्रतिरोधक सिस्टम में अनचिंहित-अनचाहे वायरस को पहचाने। फिर वायरस के ही उपयुक्त अंश को चिंहित कर टीका सोचा। यह कोरोनावायरस की बाहरी सतह पर क्राउन (मुकुट) की तरह दिखने वाले अंश से संभव हुआ। सरंचना के इस बिंदु से वायरस प्रोटीन निकालता है जिसे स्पाइक प्रोटीन कहते हैं। इसी प्रोटीन से संक्रमण की शुरुआत होती है। उसी स्पाइक प्रोटीन पर फाइजर व मॉडर्ना की वैक्सीन बनी है। एमआरएनए (mRNA) तकनीक की वैक्सीन से कोरोना वायरस के जेनेटिक कोड का एक हिस्सा शरीर में इंजेक्ट होगा। यह फिर शरीर में वॉयरल प्रोटीन बनाएगा ना की पूरा वायरस। इससे शरीर की प्रतिरोधक प्रणाली को वायरस पर हमला करना सिखाया जाता है। मतलब शरीर को एंटीबॉडी और प्रतिरोधक प्रणाली के और तत्व टी-सेल का निर्माण करना सिखाएगे। मतलब कमजोरी ताकत हो जाएगी। अर्थ यह भी कि शरीर में जा कर क्या करना है, कैसे करना है इसको इनकोड करने की तकनीक का नाम है एमआरएनए (mRNA)।

वैक्सीन का उद्देश्य शरीर के इम्यून-प्रतिरोधकस सिस्टम को नुकसान पहुंचाए बगैर कोरोना वायरस के कुछ हिस्सों में पहुंचाना है। हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली हमलावर वायरस की पहचान कर उससें लड़े व अप्रभावी बनाएं। योरोपीय कंपनी जानसेन की वैक्सीन में कॉमन कोल्ड वायरस का उपयोग है जिसमें वे अनुवांशिक बदलाव किए गए हैं ताकि यह इंसानी शरीर को नुकसान नहीं पहुंचाए। ये मॉलिक्यूलर स्तर पर कोरोनावायरस से मिलते जुलते हैं। इन्हे कोरोना वायरस को पहचानने और उससे लड़ने के लिए इम्यून सिस्टम को प्रशिक्षित करने के निर्देश होंगे।

रिसर्च की इस बारीक को हिंदी में समझना आसान नहीं है। बावजूद इसके जान लिया जाए कि पश्चिमी देशों के वैज्ञानिकों ने आठ महिनों में जो किया है और वैक्सीन के 50 प्रतिशत होने की संभावना की बात अब जैसे 95 प्रतिशत सफल होने के मुकाम है तो वह ऐतेहासिक उपलब्धि है। इस नई तकनीक से आगे केंसर जैसी बीमारी के इलाज की नई दवा, नया रास्ता खुल सकता है। ऑक्सफोर्ड-एस्ट्राजेनेका का दांवा कम महत्वपूर्ण नहीं जो बुजुर्ग याकि 65 साल से अधिक उम्र के लोगों पर वैक्सीन असरकारक होगी। इसलिए बहुत संभव है कि वर्ष 2020 यदि प्रकृति के गुस्से, महामारी के विनाश के लिए याद रहेगा तो महामारी पर तुरंत काबू पा नई तकनीक के वैक्सीन बना लेने के लिए भी याद किया जाएगा।

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