भेड़-बकरियां, बस सोचो मत!

दुनिया के लोगों और भारत के लोगों के फर्क का प्रमाण सन् 2020 का वक्त है। दुनिया के तमाम देश महामारी, आर्थिकी और इंसानी अधिकारों (अमेरिका बनाम चीन या ब्रिटेन बनाम ब्रेक्जिट या ब्लैक लाइव्स मैटर या लोकतंत्र आदि) की सच्चाइयों में जी रहे हैं। शेष दुनिया में ऐसे ही मुद्दो पर टीवी चैनल, मीडिया हेडलाइन व राष्ट्रीय चिंता और बहस है। इन्हीं पर राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री व सरकारें जूझती हुई हैं। ठीक विपरीत भारत में क्या है? आप ही सोचिए, 138 करोड़ लोग इन दिनों (पिछले कई महीनों से) क्या पढ़-देख-सुन रहे हैं? क्या सुशांत-रिया जैसी बलात किस्सागोई नहीं?

क्यों? ताकि भेड़-बकरियां सोचें नहीं कि आर्थिकी का दिवाला निकल रहा है। न यह सोचें कि चीन की सेना भारत की सीमा में घुस रही है। और न ही यह सोचें कि वायरस सभी तरफ के बाड़ों में पहुंच चुका है और संक्रमण-मौत के साये में जी रहे हैं। भेड़ें इस चिंता में न आएं कि भारत दुनिया का सर्वाधिक बरबाद होने वाला देश बनने वाला है और आने वाले दिनों में चारे-पानी, रोजी-रोटी, सेहत सभी का संकट बनेगा।

तो एक तरफ गड़रियों का बहकाना कि देखो, देखों बॉलीवुड की कहानियां तो दूसरी तरफ भेड़-बकरियों का उनमें मगन होना, मजा लेना। किसे दोषी मानें? क्या कुंए में ही भांग नहीं है? सबकी प्रकृति एक सी है। उस नाते ज्यादा सोचने के लिए इसलिए कुछ नहीं है क्योंकि जंगल की भेड़-बकरियों की मनोदशा और गड़रियों की मनोदशा मे फर्क निकालें तो कितना निकलेगा! जब कहने वाले कहते हैं कि पांच-दस करोड़ लोग बीमार हो जाएं तो क्या फर्क पड़ेगा या आर्थिकी बरबाद हो जाए तब भी खाने के लिए राशन-खेती है या चीन यदि लद्दाख और अरूणाचल को खा जाए तो क्या फर्क पड़ेगा तो क्या तो गड़रियों पर रोएं और क्या भेड़-बकरियों पर।

कुल मिलाकर रिया या फिल्मी दुनिया याकि तमाम तरह की हस्तियों का भारत में अस्तित्व बाड़े के उस खेल का है, जिसमें सब कुछ तात्कालिकता से है। गड़रियों की प्राथमिकता, अकेला ध्येय भेड-बकरियों के मैंनेजमेंट का है। उन्हें कैसे ही बहकाओ, उनके चारे-पाने का कैसा ही प्रबंध हो, उन्हें कैसे ही भेड़िया आया-भेड़िया आया के शोर से डराओ सभी के पीछे, सभी की एक सी मानसिकता है। हांकने का, बहकाने का, डंडे का और हेडलाइन का इतना आसान उपाय दुनिया के भला किस दूसरे देश के गड़रियों की तासीर है? तभी दुनिया के बाकी देशों के लिए पहले भी संपेरों की बीन पर नाचता हुआ हमारा देश था और आज भी है! वायरस की महामारी में बाकी दुनिया का व्यवहार क्या है और हमारा क्या है, यह जंगल पुराण का फिलहाल सर्वोपरि प्रमाण है।

One thought on “भेड़-बकरियां, बस सोचो मत!

  1. सारे न्यूज के अलग चैनल हो एक चैनल सिर्फ एक ही न्यूज चल्ये

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