हरिशंकर व्यास कॉलम | गपशप | बेबाक विचार

इस बार सारी जिम्मेदारी लोगों पर

कोरोना वायरस के संक्रमण की पहलू और दूसरी लहर का एक फर्क हर व्यक्ति महसूस कर रहा है कि दूसरी लहर में वायरस ज्यादा तेजी से फैल रहा है। यह स्वाभाविक है। क्योंकि म्यूटेशन के बाद वायरस के जो नए स्वरूप बन रहे हैं उनकी मारक क्षमता कम हो रही है और संक्रमण की क्षमता बढ़ रही है। दूसरे, ब्रिटेन वाले स्ट्रेन के केसेज भारत में बढ़ रहे हैं, जिसके संक्रमण की रफ्तार 70 फीसदी ज्यादा है। सो, अंदाजा लगाया जा रहा है कि पिछली बार से 70 फीसदी ज्यादा लोग तो जरूर संक्रमित होंगे। पिछली बार के पीक के समय 97 हजार के करीब लोग संक्रमित हुए थे, जो इस बार डेढ़ लाख के पार जाएगा। गुरुवार को ही यह आंकड़ा एक लाख 31 हजार के पार चला गया है।

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संक्रमण की रफ्तार के अलावा जो दूसरा फर्क है वह ये है कि इस बार सरकार कुछ नहीं कर रही है। उसने सारी जिम्मेदारी नागरिकों पर डाल दी है। दुनिया भर के देशों ने कोरोना के खतरे को 2019 के अंत में या ज्यादा से ज्यादा 2020 के पहले महीने में भांप लिया था। भारत में भी पहला केस 30 जनवरी 2020 को ही आया था इसके बावजूद भारत सरकार ने मार्च में इसकी गंभीरता को समझा और तब अचानक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक दिन का जनता कर्फ्यू लगाया और उसके बाद चार घंटे की नोटिस पर पूरे देश को बंद कर दिया। वह दुनिया का सबसे बड़ा और हार्ड लॉकडाउन था। करीब तीन महीने के लॉकडाउन पीरियड में प्रधानमंत्री ने देश के लोगों को कई बार संबोधित किया। कई नारे दिए। पीएम-केयर्स फंड बनाया, जिसके लिए लोगों से दिल खोल कर चंदा देने की अपील की गई। वित्त मंत्री ने धारावाहिक के अंदाज में कोरोना का राहत पैकेज जारी किया, जिसके बारे में कहा गया कि यह 21 लाख करोड़ रुपए का है। बैंकों से कह कर लोगों को किस्तें चुकाने से छूट दी गई हालांकि बाद में वह लोगों के लिए बड़ी मुसीबत साबित हुई, लेकिन वह अलग कहानी है। मुफ्त राशन की घोषणा हुई। अस्पतालों में कोविड वार्ड बनाए गए। स्पेशल कोविड सेंटर खोले गए, जैसे दिल्ली में एक ही सेंटर बना 10 हजार लोगों के इलाज की क्षमता वाला। सो, चारों तरफ सरकार कुछ करती दिख रही थी। लग रहा था कि सरकार सक्रिय है और लोगों को भरोसे में रहना चाहिए।

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लेकिन कोरोना वायरस की दूसरी पीक के समय सब कुछ बदल गया है। अब सरकार कुछ नहीं कर रही है। सरकार चुनावों में बिजी है। प्रधानमंत्री पिछले एक महीने में 30 से ज्यादा चुनावी रैलियां कर चुके हैं, जिनमें से कुछ रैलियों के बारे में तो उनका कहना है कि जीवन में उन्होंने इतनी भीड़ किसी रैली में नहीं देखी थी। वे विदेश का दौरा भी कर आए हैं, जिसका एक मकसद पश्चिम बंगाल चुनाव को प्रभावित करना भी था। कोरोना वायरस की दूसरी पीक के समय कुल मिला कर एक दिन यह खबर आई कि प्रधानमंत्री ने अधिकारियों के साथ एक उच्च स्तरीय बैठक की और दूसरी खबर आई कि प्रधानमंत्री ने राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ वर्चुअल बैठक की है। इसमें उन्होंने राज्यों से कहा कि टेस्टिंग, ट्रेसिंग बढ़ाने को कहा और एक समय में वैक्सीनेशन को रामबाण नुस्खा बताने वाले प्रधानमंत्री ने बताया कि वैक्सीन से ज्यादा जरूरी कोरोना के प्रोटोकॉल का पालन करना है। उन्होंने कहा कि नौजवान अगर कोरोना के प्रोटोकॉल का पालन करते हैं तो कोरोना उन्हें छू भी नहीं पाएगा। अभी तक यह खबर नहीं आई है कि गृह मंत्री ने कोरोना से मुकाबले की कमान संभाल ली है।

इसी तरह से पिछले एक साल में कोरोना का नैरेटिव भी बदला है। प्रधानमंत्री ने पहले लॉकडाउन को रामबाण नुस्खा बताया और पूरे देश को बंद कर दिया। यह भरोसा जताया कि जैसे महाभारत का युद्ध 18 दिन में जीत लिया गया था उसी तरह कोरोना के खिलाफ युद्ध 21 दिन में जीत लिया जाएगा। 21 दिन का यह लॉकडाउन कुछ छूट के साथ अगले तीन महीने तक चलता रहा। उसके बाद प्रधानमंत्री को इलहाम हुआ कि यह बेकार की चीज है, फिर धीरे धीरे सब कुछ खोल दिया गया। उनके समर्थकों ने जिस तर्क से लॉकडाउन को सही ठहराया उसी तर्क से सब कुछ खोले जाने को भी सही ठहराया। पहले कहा गया कि वह तो नरेंद्र मोदी थे, जिन्होंने लॉकडाउन लगा दिया, वरना करोड़ों लोग मर जाते। फिर कहा गया कि वह तो नरेंद्र मोदी थे, जिन्होंने सब कुछ खोल दिया वरना करोड़ों लोग कंगाली में मर जाते।

बहरहाल, फिर जब दुनिया भर में वैक्सीन बन गई और निजी कंपनियों के वैज्ञानिकों ने अपनी मेधा, क्षमता से वैक्सीन तैयार की तो प्रधानमंत्री को इलहाम हुआ कि यह रामबाण इलाज है। फिर उन्होंने दुनिया के ‘सबसे बड़े वैक्सीनेशन अभियान’ की शुरुआत की। समर्थकों ने निजी कंपनियों में बनी वैक्सीन की श्रेय प्रधानमंत्री को दिया और पूरे देश में ढोल-नगाड़े के साथ वैक्सीन का रंगारंग उत्सव शुरू हुआ। लेकिन अब प्रधानमंत्री को इलहाम हुआ है कि वैक्सीन से बात नहीं बनेगी, इसलिए उन्होंने गुरुवार को मुख्यमंत्रियों के साथ बैठक में कहा कि वैक्सीन से ज्यादा जरूरी है कि लोग कोरोना वायरस के प्रोटोकॉल का पालन करें। राष्ट्रीय टेलीविजन पर यह कहते समय प्रधानमंत्री ने मास्क नहीं लगाया हुआ था। यह भी पिछले एक साल का फर्क है। एक साल पहले जब प्रधानमंत्री टेलीविजन पर राष्ट्र को संबोधित करते थे तो मास्क लगाते थे या गमछे से मुंह ढकते थे। अब उन्होंने इसे काफी कम कर दिया है। उन्होंने टेलीविजन पर तो नौजवानों से कहा कि वे कोरोना के प्रोटोकॉल का पालन करें पर जब बंगाल में उनकी रैली में हजारों नौजवान बिना मास्क के इकट्ठा होते हैं तो वहां वे यह बात नहीं कहते हैं। लेकिन मीटिंग में यह जरूर कहा जाता है कि लोग कैजुअल हो गए हैं, लापरवाह हो गए हैं, नियमों का पालन नहीं करते हैं, इसलिए कोरोना फैल रहा है। सो, लोगों से ही उम्मीद की जा रही है कि वे मास्क लगाएं, सामाजिक दूरी रखें, वैक्सीन लें, इलाज कराएं और कोरोना से लड़ें।

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