हिंदी पट्टी में बड़ा खतरा

भारत में एक तरफ केरल का मॉडल है तो दूसरी ओर हिंदी पट्टी के राज्यों का मॉडल है। बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ आदि राज्यों में कोरोना वायरस के संक्रमण को लेकर अलग ही सोच है। वहां न तो पहले से कोई तैयारी है और न संक्रमण फैलने के बाद भी उसे रोकने को लेकर कोई गंभीरता दिख रही है। ध्यान रहे हिंदी पट्टी के ज्यादातर राज्य स्वास्थ्य सेवाओं के हर मानक पर हर सूचकांक में सबसे नीचे आते हैं।

सबसे खराब स्वास्थ्य सेवा वाले दो राज्य- बिहार और झारखंड को लेकर इस बात का सबसे ज्यादा प्रचार है कि उनके यहां कोरोना वायरस के बहुत कम केसेज हैं। पर हकीकत अलग है, जिससे राज्यों की सरकारें आंख चुरा रही हैं। असलियत यह है कि इन राज्यों में जांच के नाम पर कुछ नहीं हो रहा है। कोरोना के संदिग्ध मरीजों का सैंपल जिलों से इकट्ठा किया जाता है, फिर से राजधानी, पटना या रांची भेजा जाता है, जहां से जांच के लिए उसे कोलकाता भेजा जाता है। जानकारों का कहना है कि ट्रांजिट में ही याने आने-जाने में ही सैंपल की क्वालिटी खराब हो जाती है। तभी इन राज्यों में सबसे देर से कोरोना वायरस के केसेज आए और अब भी इनकी संख्या बहुत कम है।

एक हकीकत यह भी है कि ये दोनों राज्य स्वास्थ्य सेवाओं के मामले में सबसे फिसड्डी हैं। प्रति व्यक्ति स्वास्थ्य पर खर्च के मामले में ये दोनों राज्य नीचे से एक और दो नंबर पर हैं। प्रति व्यक्ति स्वास्थ्य सेवा पर सबसे ज्यादा खर्च गोवा सरकार करती है और सबसे कम बिहार और झारखंड की सरकार। इसी तरह अगर सरकारी अस्पतालों की बात करें तो भारत में 1,833 लोगों पर सरकारी अस्पताल में एक बेड है। पर बिहार में 8,789 लोगों पर एक बेड है। झारखंड में 6.052 लोगों पर एक बेड है। इन राज्यों में अगर कोरोना वायरस से संक्रमण के मामले नहीं दिख रहे हैं तो क्या हैरानी है? न डॉक्टर हैं, न अस्पताल है और न लैब्स हैं, फिर भी सरकारों को इस बात का भरोसा है कि उनके यहां कोरोना के मामले नहीं हैं।

यह बिल्ली को आते देख कबूतर की तरह आंख मूंद लेने वाली एप्रोच है। बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश आदि राज्यों की सरकारें इसी एप्रोच में काम कर रही हैं उनके यहां कोरोना के ज्यादा मामले न सामने आएं। अगर अस्पतालों में किसी फ्लू या वायरल के लक्षण वाले लोग भरती हो रहे हैं, निमोनिया के मरीज आ रहे हैं और उनकी मौत हो रही है तो उसे कोरोना से मौत की श्रेणी में नहीं डाला जा रहा है क्योंकि सैंपल लेने और उनकी जांच करने का कोई सिस्टम ही नहीं है। तभी इस बात का खतरा है कि इन राज्यों में अंदर अंदर ही मामले बढ़ रहे हैं और एकदम विस्फोट हो सकता है। अचानक से बड़ी संख्या में मामले आ सकते हैं। इन राज्यों की सरकारों को भी केरल की तरह या हिंदी पट्टी के ही दूसरे राज्यों जैसे राजस्थान और मध्य प्रदेश की तरह जांच बढ़ानी चाहिए और जल्दी से जल्दी संक्रमितों का पता लगाना चाहिए ताकि उन्हें दूसरे लोगों को संक्रमित करने से रोका जा सके।

इस मामले में मध्य प्रदेश और राजस्थान का रिकार्ड अपेक्षाकृत ठीक है। हालांकि इन दोनों राज्यों में भी स्वास्थ्य सेवाएं बहुत अच्छी नहीं रही हैं और प्रति व्यक्ति डॉक्टर, अस्पताल, बेड आदि के मामले में ये राज्य भी डब्लुएचओ के मानक पर औसत से पीछे हैं फिर भी कोरोना महामारी से लड़ने में इन दोनों राज्यों ने हिम्मत और समझदारी दिखाई है। जैसे राजस्थान में जैसे ही भीलवाड़ा में वायरस का एपीसेंटर होने की खबर आई तुरंत उसे लॉकडाउन किया गया और घर-घर जाकर लोगों की स्क्रीनिंग शुरू हुई। इसी तरह मध्य प्रदेश में भी सरकार ने इंदौर और खरगौन के डॉटस्पॉट पर जांच और स्क्रीनिंग बढ़ाई हुई है। इससे मरीजों की संख्या का पता चल रहा है। उन्हें आइसोलेट किया जा रहा है और ज्यादा संक्रमण फैलाने से रोक जा रहा है।

लेकिन हिंदी पट्टी के ज्यादतर राज्यों, आदिवासी बहुल राज्यों और पूर्वोत्तर के राज्यों में इस पर ज्यादा फोकस नहीं है। दिल्ली में निजामुद्दीन में हुए तबलीगी जमात के मरकज से निकले लोग बड़ी संख्या में पश्चिम बंगाल, बिहार, असम, उत्तर प्रदेश, झारखंड आदि राज्यों में पहुंचे हैं। इनके अलावा दिल्ली, हरियाणा, पंजाब से जो प्रवासी मजदूर पलायन करके गए हैं वे भी इन्हीं राज्यों में गए हैं। इसलिए ये राज्य ज्यादा खतरे वाले जोन में हैं। फिर भी अपनी तरफ से पहल करके लोगों की जांच करने, संक्रमितों का पता लगाने और उनका इलाज करने की पहल नहीं हो रही है।

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