तब भारत में सवा दो करोड़ लोग मरे थे!

यों मैं प्रकृति बनाम इंसान की लड़ाई में इंसान की जीत का विश्वासी हूं। मानना है कि वैज्ञानिक बना लेंगे वैक्सीन याकि टीका। मैंने 10 फरवरी को अपने कॉलम ‘सोचें, वायरस में थर्राई दुनिया पर!’ में लिखा था- कि प्रकृति और मानव में यह होड़ अंतहीन है कि तुम डाल, डाल तो मैं पात, पात!’ इसलिए वायरस प्रकृति की मार है तो इंसान पात-पात में आगे टीका बना ही लेगा। लेकिन साल तो लगेगा। (यदि चार-छह महीने वैज्ञानिकों ने लिए तो फैक्टरियों से प्रोडक्शन हो कर भारत तक पहुंचने में कुछ महीने) और चार-महीनों का लम्हा ही बहुत है देशों को, मानवता को बरबाद करने के लिए। उस नाते कल लंदन की ‘द इकॉनोमिस्ट’ पत्रिका ने अपने संपादकीय अगली विपदा (the next calamity) में भारत जैसे विकासशील देशों पर पड़ने वाले कहर में याद दिलाया आंकड़ा अपने पाठक भी ध्यान रखें। हां, राज तब अंग्रेजों का था और स्पेनिश फ्लू (ब्यूबोनिक प्लेग) ने भारत की कुल आबादी में छह प्रतिशत लोगों को लील लिया था।

इसका वायरस भी भारत में चीन, हांगकांग के रास्ते 1894 में आया था। वायरस के पहले झटके में एक करोड़ लोग मरे और फिर धीरे-धीरे सवा करोड़ लोग। वह वायरस भारत में तीस साल तक लोगों की जान लेता रहा। गांवों में सालों पसरा रहा। शुरुआत मुंबई, पुणे, कोलकाता, कराची से हुई थी। मतलब महानगरों से शुरुआत और फिर धीरे-धीरे शेष भारत में। उससे चीन में ज्यादा लोग नहीं मरे थे लेकिन भारत में मरे जबकि राज अंग्रेजों का था। इतिहास की पुनारवृत्ति व वक्त की त्रासदी का यह सिलसिला गौरतलब है कि तब भी पश्चिमी भारत, पंजाब, यूनाइटेड प्रोविंस (यूपी) सर्वाधिक प्रभावित घोषित हुआ था और अब भी महाराष्ट्र, पंजाब, उत्तर भारत पर खतरा मंडरा रहा है।

ब्रितानी सरकार के तब उपाय थे क्वारैंटाइन, आईसोलेशन कैंप, यात्रा पाबंदी और लोगों पर पाबंदियां। तब भारतीयों ने और राष्ट्रवादी नेताओं ने, बाल गंगाधर तिलक ने सरकार की सख्ती और लापरवाही को ले कर अंग्रेज सरकार की आलोचना की तो अंग्रेजों ने पाबंदियां और बढ़ाईं। तिलक को आलोचना के लिए 18 महीने की सश्रम कैद हुई।

तब और अब का फर्क इसलिए नहीं है कि तब भी एक वायरस था अब भी एक वायरस है। तब भी चीन से आया था और अब भी वहीं से आया हुआ है। तब भी बीमारी की न दवा थी और न इलाज था।

इसलिए लॉकडाउन से हम 21 दिन में विजय पा लेंगे, यह संभव ही नहीं है। कोरोना वायरस से भारत में लड़ाई दुनिया के सभी देशों के मुकाबले ज्यादा लंबी चलनी है क्योंकि हम 130 करोड़ लोगों की भीड़ लिए हुए हैं और आबादी के अनुपात में मेडिकल सुविधा, संसाधनों में सर्वाधिक गरीब हैं। हमें मुक्ति तभी मिलेगी, हम तभी जीतेंगे जब पश्चिमी देश हमें वैक्सीन बना कर दें।

6 thoughts on “तब भारत में सवा दो करोड़ लोग मरे थे!

  1. Lockdown is without proper planning Migrant workers suffering the most government is making fake announcement but nothing on ground please make arrangements to send them to there places on humantrian ground otherwise they will die without carona there tears will finish the rulers shame on word largest party

  2. Our resources and facilities are insufficient for 130 cr people, most of them ignorant and irresponsible. It is very difficult to manage things in this country with such a big population unless population is controlled effectively. This also leads to anti national activities also during this outbreak of epidemic. People
    don’t fully co-operate with govt.
    programs. No govt. can make such arrangements for millions within a short period.

  3. भारतीय आयुर्वेद में एक दवा का उल्लेख मिलता है जो नैनो पार्टिकल के रूप में होती है,इस दवा की 100 mg की मात्रा मानव शरीर को अंदर ओर बाहर से रिसेट कर मानव को लगभग 250 साल तक कि उम्र तक जीवित रखने की क्षमता होती है।साथ ही शरीर को किसी भी बहुत ही भयानक बीमारी को भी ठीक करने की ताकत होती है।एक लाइन में “”काया कल्प”” सम्भव होता है।
    लेकिन भारतीय आयुर्वेद की जिम्मेदारी व्यापारीक मानसिकता के कंधों पर है।

  4. हरीशंकर व्यास। 28-3-2020-। तब भारत में सवा दो करोड़ लोग मरे थे।
    लाकडाउन। पहली जरूरत
    1980सऺवाद परिक्रमा। *****। वर्तमान ?
    1857। भारत का पहला स्वतंत्रता संग्राम। अंग्रेजों और काले अंग्रेजों का ,,गदर,, इसे याद रखें!
    1984। स्पेनिश फ्लू।? बयूबोनिक प्लेग। चीन से भारत वाया हांगकांग। कौन , किसलिए,और क्यों?
    अंग्रेजी झूठ—– जहाजों में चूहे खोज करें ,सत्य की! इसमें कितने शासक मरे और कितने भारतीय? भारतवासी का आंकड़ा सवा दो करोड़। आपके लेख का शीर्षक, शेष????
    चर्चिल और उसके बयानों को देखें ,उसमें छुपी भारतीयों के प्रति घृणा को समझें ,प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की थमक को सुने ,उस पर ब्रिटिश शासन की छटपटाहट को समझ सके तो, बयूबोनिक प्लेग का सच सामने आ जायेगा। जैविक हथियार , मस्टर्ड,यलो, लाफिंग मीथेन इत्यादि गैसों के साथ साथ महामारी फैलाने वाले विषाणुओं का प्रयोग गुप्त रूप से सामरिक रणनीति में हुआ था, शत्रुओं के विनाश के लिए। हर सभ्यता में इस तरह के षणयत्रो की भरमार है।बस कहानियां अलग-अलग रूपों में रही। आप सेल्यूलर जेल की तीर्थयात्रा पर पता नहीं गये या नहीं , वहां भी शारीरिक यातनाओं में बहुत प्रकार के ज़हर और बीमारी के विषाणुओं का प्रयोग उस समय के शासकों ने किये।यह कपोल कल्पना नहीं, वास्तविक इतिहास है जिसे हमेशा-हमेशा छुपाया गया ठीक ऐसे ही जैसे चीन ने करोना वायरस के सच को छुपाया ।
    आप का प्रिय विषय , राजनैतिक लेख,,है ,कारण आप हमारे से ज्यादा जानते होंगे! ।आंज की सामरिक रणनीति का रूप बदल गया है, शत्रु का विनाश उसके विकास को , अर्थव्यवस्थाओं को तहस नहस कर के करने की नमी नीति है । HIV,Ebola,Nipah, SARS इत्यादि संयोग नहीं प्रयोग है ।
    आज का भारत तब का भारत नहीं है । आलोचक और अफवाहों के बाजार गर्म रखने वाली ताकतों को यह समझ लेना चाहिए!
    लाकडाउन। पश्चिम , विकास शील सुपरपावर का चित्र आपके सामने है Next Calamity जैसे लेख लिखने वालों को भारत की तरफ उंगली उठाने से पहले अपने गिरेबान में झांक कर अपनी हालत देखनी चाहिए। वुहान से निकले पचास लाख ,विष कन्या पुरुष अपने संक्रमण से दुनिया के देशों को संक्रमित करते हैं । तथ्य और साक्ष्य के लिये उस समय सोशल और मेन मीडिया पर वायरल वीडियो , जिसमें खूबसूरत चीनी लड़की और लड़का एक तख्ती ,जिस पर लिखा है ,,,I AM CHINESE NOT VIRUS LOVE ME. HUG ME..और लोग वाग उनके गले मिल रहे हैं मानवतावादी दृष्टिकोण से,और अनजाने में संक्रमित हो रहे हैं ।चीन , चमगादड़ सांप की रट लगा रहा है ,यह नहीं बता रहा कि ,यह वायरस मनुष्य से मनुष्य में फैलता है। इटली की भयावह हालत वहां चर्चों में पड़े लावारिस ताबूत सुना रहे हैं ।उसी इटली में एक शहर है ,,,,यूगेनिया। ( Vo euganeo) वहां की आबादी है अढ़ाई लाख उन्होंने बहुत कड़ाई से लाकडाउंन का पालन किया । नतीजा बेहद अच्छा और अनुकरणीय है!
    आप जिस‌WHO और उसके वर्तमान डायरेक्टर की बात करते हैं ,उस की सम्पूर्ण भूमिका दिसम्बर 2019
    से आज तक संदिग्ध है। ताईवान सरकार के आधिकारिक पत्राचार जो विश्व स्वास्थ्य संगठन को लिखे गयेथे ,,यह बताते हुए की यह वायरस मनुष्य से मनुष्य में फैलता है ,चीन की चमगादड़ सांप थ्योरी झूठ का पुलिंदा है !संसार को सावधान करे और इसे महामारी घोषित करै। इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया गया, क्यों?
    आगे लिखता हूं, इथोपिया अफ्रीका का लिटिल चाइना कहलाता है,1991 से वहां विकास के नाम पर चीन ने निवेश करने के साथ-साथ राजनैतिक उथल-पुथल में पूरी गंदगी फैलायी। कम्यूनिस्ट सरकार को स्थापित
    करने में । वर्तमान विश्व स्वास्थ्य संगठन का मुखिया भी इथोपिया निवासी, बदनाम कम्युनिस्ट पार्टी का बड़ा कार्यकर्ता, पूर्व सरकार में विदेश, हैल्थ मंत्री रहा है 2017मे चीनी लौबी ने उसे अपने स्वार्थ के लिए इस पद पर आसीन करवाया। नमक हलाली का आलम यह रहा की , इसने चीन के हर झूठ पर पर्दा डाला ।खुद जनवरी में चीन में जी हजूरी बजा कर आया ,पर WHO की खोजी टीम को चीन नहीं जाने दिया न ही इतनी मौतों के बाद महामारी घोषित कि।जब पड़ा दबाव और सच्चाई सामने आने लगी तब इसने कार्यवाही की ।उसके बाद भी ,,भारत,, के प्रति उसके बयान हमेशा दुर्भावना पूर्ण रहै ।सारी कल्पना नहीं ,WHO के टि्वटर अकाउंट पर सब साफ़ है ।
    भारत की विशाल आबादी ,और विभिन्न कार्य क्षेत्रो में लगे असंगठित लोग ,अभी भी इसे हल्के में ले रहे हैं ,
    नीम करेले की कहावत को चरितार्थ करते हैं महामूर्ख आलोचना करने वाले , अफवाहों के बाजार गर्म रखने अपने स्वार्थ की रोटियां सेंकने वालों की भी कमी नहीं है । जो मरजी आई बोलना जो दिल आया लिखना आसान है ,इतने बड़े देश का प्रशासन चलाना आसान नहीं है ।कमियां रह जाती है , उन्हें दूर भी करने के प्रयास भी लगातार चलते हैं यह सतत प्रक्रिया है ,उस पर व्यंग और दोषारोपण क्या दर्शाता है! हिम्मत है तो खुद मैदान मैं उतरो , जन-मानस को इस गम्भीर समय में आशा का संदेश दो ,उनकी समस्याओं का अपनी सामर्थ्य अनुसार हल करो या कराने का प्रयास करो ,यही सच्ची देश सेवा है देश और देशवासियों के लिये।जहां चाह है वहां राह है , कुछ भी असम्भव नहीं है हर कठिन घड़ी में भारत और भारतीय जनता ने हमेशा सिद्ध कर के दिखाया है । नकारात्मक सोच रखने वाले लोग , अपने स्वार्थ के लिए अपने जमीर को चन्द टुकड़ों के लिए बेच देने वाले लोग संसार में सब जगह है ।इनका अंत इनके पाप का घड़ा भरने पर फूट ही जाता है।मेरा भारत महान ,भारत की जनता महान ,इस महामारी से भी लड कर जीता हासिल करेगी ,मेरा पूर्ण विश्वास है।

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