केरल के लिए बजाएं ताली

दुनिया भर में कोरोना वायरस के संक्रमण को पहचानने और उसे रोकने के दो मॉडल चर्चा में हैं। पहला दक्षिण कोरिया और सिंगापुर का है और दूसरा बाकी दुनिया है। बाकी दुनिया में थोड़े बहुत फेरबदल के साथ एक ही मॉडल लागू किया जा रहा है। कहीं टेस्टिंग हो रही है, कहीं लॉकडाउन हो रहा है तो कहीं स्वास्थ्य सुविधाओं में सुधार के जुगाड़ हो रहे हैं। पर दक्षिण कोरिया और सिंगापुर ने ट्रिपल टी यानी टेस्ट, ट्रेस एंड ट्रीटमेंट का जो मॉडल अख्तियार किया है वह सबसे अच्छा माना जा रहा है। भारत में अगर कोई राज्य इस मॉडल पर काम कर रहा है तो वह केरल है।

ध्यान रहे केरल देश का इकलौता ऐसा राज्य है, जिसकी आर्थिकी बहुत हद तक खाड़ी देश से आने वाले पैसे पर टिकी है। केरल से मजदूर, नर्सें, कंपाउंडर और दूसरे पेशेवर बड़ी संख्या में खाड़ी देशों में काम करते हैं। दूसरा तथ्य यह भी जान ले कि 31 जनवरी को देश का पहला कोरोना वायरस का केस केरल में ही सामने आया था। इस लिहाज से केरल सबसे ज्यादा संक्रमण फैलने वाला जोन था। इसके बावजूद राज्य ने न केवल संक्रमितों की संख्या को नियंत्रित किया, बल्कि मृत्यु दर को न्यूनतम कर दिया। कई राज्यों में संक्रमित मरीजों के मरने की शुरुआत होने के कई दिन के बाद केरल में पहली मौत हुई थी और अब भी वहां सिर्फ दो मरीजों की मौत हुई है। यानी मरने की दर एक फीसदी से भी कम है।

केरल में पहला मामला भी बाहर से आए व्यक्ति की वजह से हुआ था। तभी राज्य सरकार ने इस खतरे को भांप लिया। कह सकते हैं कि केरल में कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार है और कोरोना वायरस कम्युनिस्ट तानाशाही वाले देश चीन से आया है, इसलिए भी केरल ने पहले ही चीन की तरह अपने को तैयार करना शुरू कर दिया था। पर चाहे कारण जो हो, पहला केस आने के बाद ही चीन ने इसका संक्रमण रोकने के उपाय शुरू किए थे।

केरल में कोरोना वायरस का केंद्र कासरगौड जिला है। राज्य में शुक्रवार की सुबह तक कुल 286 मामले थे, जिनमें से 90 के करीब मामले अकेले कासरगौड जिले का है। यह जिला केरल में सबसे खराब स्वास्थ्य सेवा वाला जिला है। सबसे पहले इस जिले में कोरोना वायरस का संक्रमण फैलना शुरू हुआ था। उसी समय राज्य सरकार ने ज्यादा से ज्यादा लोगों के सैंपल लेकर उनकी जांच कराने और संदिग्धों को अलग थलग करने का काम शुरू कर दिया। यह काम केरल ने पूरे प्रदेश में किया। उसने करीब दो लाख संदिग्धों की पहचान की है और उन्हें अलग थलग रखा है। यह किसी भी दूसरे राज्य में आइसोलेशन में रखे गए लोगों की संख्या से ज्यादा है। इस तरह उसने संक्रमण फैलने से रोका। उसने टेस्ट की रिपोर्ट आने से पहले ही संदिग्ध लोगों को आइसोलेट कर दिया था। इसके बाद केरल सरकार लगातार टेस्टिंग पर जोर देती रही। केरल देश का पहला राज्य है, जहां एंटीबॉडी टेस्ट यानी सेरोलॉजिकल टेस्ट की शुरुआत हुई। आईसीएमआर से अनुमति लेकर उसने सेरोलॉजिक टेस्ट शुरू किया। इसके नतीजे जल्दी आते हैं। सो, केरल में मरीजों की पहचान जल्दी होने लगी और उनका इलाज, आइसोलेशन और क्वरैंटाइन सब आसान हो गया।

केरल पहला राज्य है, जिसने अपने यहां 20 हजार करोड़ रुपए का पैकेज घोषित किया। इसमें आर्थिक पैकेज भी शामिल है और मेडिकल जरूरतों का पैकेज भी शामिल है। सोचें, उस राज्य ने सबसे पहले संक्रमण की चिंता को भी पहचाना और उससे होने वाले आर्थिक नुकसान की चिंता को भी समझा। फिर दोनों से लड़ने के उपाय किए। ऐसा नहीं है कि यह अचानक हो गया। असल में केरल कई मानकों पर देश का सबसे बेहतरीन सुविधाओं वाला राज्य है। वहां साक्षरता सबसे ज्यादा है। वह देश के उन छह राज्यों में से एक है, जहां विश्व स्वास्थ्य संगठन, डब्लुएचओ की ओर से तय किए गए औसत से ज्यादा प्रति व्यक्ति डॉक्टर हैं। डब्लुएचओ ने तय किय है कि प्रति एक हजार व्यक्ति पर कम से कम एक डॉक्टर होने चाहिए। केरल में 535 लोगों पर एक डॉक्टर है। केरल से बेहतर औसत तमिलनाडु, दिल्ली और कर्नाटक का है। देश में कई साल से होने वाले स्वास्थ्य सर्वेक्षणों में हर सूचकांक में केरल नंबर एक आता है। पिछले ही दिनों भारत सरकार के नीति आयोग ने जन्म दर, मृत्यु दर, प्रजनन दर, लिंग अनुपात जैसे अनेक मानकों पर केरल को स्वास्थ्य के मामले में नंबर एक राज्य बताया है। यानी वहां चाहे कांग्रेस की सरकार रही हो या कम्युनिस्ट पार्टी की, सबने शिक्षा और स्वास्थ्य में निवेश किया है। स्कूल और अस्पताल बनवाएं हैं, डॉक्टरों की भरती की, नर्सिंग की ऐसी व्यवस्था बनाई है कि केरल की नर्सें दुनिया भर में काम करती हैं।

इन सबका नतीजा केरल में कोरोना वायरस के इस संकट के समय देखने को मिला। पहले की तैयारियां, बुनियादी ढांचे का विकास और राज्य के नेतृत्व की इच्छाशक्ति ने केरल में इस संकट को महामारी बनने से रोका है। ध्यान रहे केरल में इस संकट के महामारी बन जाने के सबसे ज्यादा मौके थे। वहां बड़ी संख्या में लोग बाहर से खास कर खाड़ी देशों से आए थे। यह हकीकत का आंकड़ा है कि देश में जितने संक्रमण के मामले हैं, उनमें लगभग आधे मामले खाड़ी देशों से आए लोगों से हुए हैं। उसमें भी गैर ईरानी खाड़ी देशों यानी सऊदी अरब, दुबई आदि से आए लोगों की वजह से हुए हैं। दूसरे, देश के किसी अन्य राज्य के मुकाबले बुजुर्गों की आबादी केरल में सबसे ज्यादा है। ध्यान रहे बुजुर्ग ही सबसे ज्यादा कोरोना वायरस से संक्रमित हो रहे हैं। भारत की आबादी में बुजुर्गों की संख्या 8.6 फीसदी है पर केरल में बुजुर्गों की आबादी का अनुपात 12.7 फीसदी है। यानी राष्ट्रीय औसत से चार फीसदी ज्यादा। इसके बावजूद केरल ने न सिर्फ संक्रमण को फैलने से रोका, बल्कि मृत्यु दर को एक फीसदी से भी नीचे रखा।

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