अमेरिकी मॉडल अपनाए भारत - Naya India
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अमेरिकी मॉडल अपनाए भारत

कोरोना वायरस के संक्रमण के मामले में भारत की तुलना किस देश के साथ की जा सकती है? क्या चीन के साथ इसकी तुलना हो सकती है या दक्षिण एशिया के किसी देश के साथ या जापान, दक्षिण कोरिया के साथ हो सकती है? ऐसा लग रहा है कि इनमें से किसी के साथ भारत की तुलना नहीं हो सकती है। न वायरस का संक्रमण फैलने के तरीके और स्पीड के मामले में और न उससे लड़ने के संभावित मॉडल के मामले में। भारत चीन की तरह कंपलीट लॉकडाउन नहीं कर सकता है। या पाकिस्तान, अफगानिस्तान की तरह लोगों को मरने के लिए भी नहीं छोड़ सकता है। जापान, दक्षिण कोरिया की आबादी कम है और संसाधन बहुत हैं इसलिए उनका मॉडल भी भारत के लिए मुश्किल है। सो, भारत को हर हाल में अमेरिकी मॉडल को फॉलो करना होगा। भारत में मामले भी उसी अंदाज में बढ़ रहे हैं, जैसे अमेरिका में बढ़े, भारत में भी उसी तरह शुरुआत में लापरवाही हुई, जैसे डोनाल्ड ट्रंप ने की थी और भारत में भी आबादी बहुत बड़ी है। अच्छी बात यह है कि भारत के सामने अमेरिका का मॉडल है और उसे लागू करने के लिए अभी समय भी है।

चीन में कोविड-19 की महामारी से लड़ने में अहम भूमिका निभाने वाले डॉक्टर झांग वेन हांग का अनुमान है कि भारत में कोरोना संक्रमितों की संख्या वैसे ही बढ़ रही है, जैसे अमेरिका में बढ़ी है। यह एकदम से पीक पर पहुंचने वाली नहीं है, बल्कि धीरे धीरे बढ़ती रहेगी। वैसे भी भारत की जितनी बड़ी आबादी है अगर संक्रमितों की संख्या धीरे धीरे भी बढ़ती रही तो वह संख्या बहुत बड़ी हो जाएगी। बहरहाल, वेन हांग संक्रामक रोगों के मामले में चीन के बड़े विशेषज्ञ हैं और शंघाई के हुशान हॉस्पिटल के डायरेक्टर हैं। उन्होंने भारत के चीनी दूतावास में चीनी लोगों के साथ वीडियो कांफ्रेंस के जरिए संवाद किया है। उन्होंने कहा है कि भारत में कुछ मामलों से ऐसा लग रहा है कि सामुदायिक संक्रमण शुरू हो गया है और यहां संख्या सीमित रहने की बजाय अमेरिका व यूरोप के मॉडल पर आगे बढ़ेगी। यह भारत के लिए चिंता की बात होनी चाहिए और तभी जरूरी है कि भारत अमेरिका के मॉडल को अपनाए।

अमेरिका के मॉडल की खास बात यह है कि वह संघीय शासन प्रणाली की संवैधानिक व्यवस्था वाला देश है, जहां राज्यों के गवर्नर अपने हिसाब से फैसला करने को स्वतंत्र हैं। सो, सबसे पहले भारत में भी केंद्र सरकार को यह बात समझ लेनी चाहिए कि कोराना वायरस का मामला स्वास्थ्य से जुड़ा है और इसमें राज्यों को पूरी स्वतंत्रता दी जानी चाहिए और जहां जरूरत है वहां उनके लिए संसाधनों का इंतजाम करना चाहिए। जिस तरह तमाम राजनीतिक विरोध के बावजूद राष्ट्रपति ट्रंप ने न्यूयॉर्क के विरोधी पार्टी के गवर्नर के साथ सहयोग किया वैसे ही भारत सरकार को भी राजनीतिक विरोध छोड़ कर हर राज्य के मुख्यमंत्री को अपने राज्य की जरूरत और हालात के हिसाब से फैसला करने देना चाहिए। इसके बाद केंद्र की जिम्मेदारी है कि वह दुनिया भर के देशों से, जहां से भी हो टेस्टिंग किट मंगवाए, पीपीई मंगवाए, वैक्सीन पर चल रहे शोध में शामिल हो और दवाओं पर हो रहे शोध का हिस्सा बने। सरकार को चाहिए कि जितना ज्यादा से ज्यादा हो सके टेस्टिंग किट, पीपीई, वेंटिलेटर, ऑक्सीजन और आईसीयू बेड्स की व्यवस्था करनी चाहिए।

यह जरूरत इसलिए है क्योंकि अमेरिका ने संक्रमितों की संख्या दबाने, छिपाने या कम बताने की बजाय ज्यादा से ज्यादा जांच करके सारे संक्रमितों को सामने लाने का मॉडल चुना। उसने हर नागरिक की जांच का बंदोबस्त किया ताकि किसी कोने में एक भी मरीज छिपा न रह सके। यह इसलिए जरूरी है क्योंकि यह वायरस एक आदमी से ही फिर फैल सकता है। वैसे भी अमेरिका संक्रमण की दूसरी लहर आने की आशंका लिए हुए है। इसलिए भारत को भी इसी मॉडल पर ज्यादा से ज्यादा टेस्ट करने चाहिए। टेस्ट के जरिए संक्रमितों और उनके संपर्क में आए लोगों की पहचान करके आगे उनकी टेस्टिंग करनी चाहिए। जितने ज्यादा टेस्ट होंगे उतने ज्यादा संक्रमितों का पता चलेगा और उनका इलाज करके बाकी नागरिकों को सुरक्षित रखने की संभावना उतनी ज्यादा बढ़ेगी।

अमेरिका की तरह ही भारत में अनेक राज्यों में संक्रमण मामूली है केरल जैसे राज्य में जहां पहले से संभालने का काम चालू हो गया था वहां इसकी पहली लहर खत्म होने वाली है। इसलिए जहां केरल दूसरी लहर को संभालने की तैयारी करे वहीं केरल, गोवा या पूर्वोत्तर के राज्यों के लिए लॉकडाउन की अलग रणनीति बने। जैसे कि केरल के मुख्यमंत्री ने कहा था- वन साइज फिट फॉर ऑल, की रणनीति भारत में नहीं चल सकती है। सो, राज्यवार और हो सके तो जिलावार रणनीति अलग अलग बननी चाहिए।

अमेरिकी मॉडल की एक और सबसे अहम बात, जिसे भारत को अपनाना चाहिए वह यह है कि सरकार खजाना खोले। इस समय वित्तीय व राजकोषीय घाटे की चिंता में न पड़े या अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसियों की चिंता न करे। विकास दर जीरो के नीचे जानी है यह तय है। उसकी चिंता करने की बजाय सरकार को अपने हर खाते से पैसा निकाल कर कोरोना से लड़ाई में झोंकना चाहिए। राज्यों को मेडिकल सुविधाएं देनी चाहिए, लोगों को जरूरत की चीजों की कमी न पड़े, इसका बंदोबस्त करना चाहिए और लोगों तक पैसे पहुंचाने चाहिए। जैसे अमेरिका ने पहले ही राहत पैकेज में अपनी जीडीपी का दस फीसदी हिस्सा झोंक दिया, उसी तरह भारत को भी करना चाहिए। भारत की जीडीपी का दस फीसदी 15 से 17 लाख करोड़ रुपया बनता है इतना तो तत्काल झोंकना चाहिए। इससे आर्थिकी भी बचेगी, लोगों की जान भी बचेगी और कोरोना से लड़ाई भी आसान होगी।

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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