14 अप्रैलः परीक्षा का दिन - Naya India
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14 अप्रैलः परीक्षा का दिन

हां, कोरोना वायरस से भारत की लडाई का अगला अहम दिन 14 अप्रैल है। तालाबंदी बढ़ाने, न बढ़ाने और उस अनुसार वायरस से लड़ने की नई मोर्चेबंदी का उस दिन अनुमान लगेगा। मैं शुरू से मेडिकल इमरजेंसी और सेना के सुपुर्द प्रबंधन छोड़ने की दलील देते हुए युद्ध स्तर पर लड़ाई की तैयारी के लिए कहता रहा हूं। जाहिर है अपनी इस थीसिस अनुसार लड़ाई का मैदान अस्पताल है और अस्पताल के मैदान में सेनानियों को उतारने के साथ जनरलों के लिए जरूरी है कि वे सेनानियों को हथियार (मेडिकल साजोसामान) दें और उन्हें मालूम हो कि दुश्मन कितनी संख्या में हैं।

यह बेसिक बात है। इस बेसिक बात को नरेंद्र मोदी ने गुरूवार को मुख्यमंत्रियों के साथ बात करते हुए पहली बार गंभीरता से उठाया। मतलब पहली बार उन्होंने टेस्ट, ट्रेसिंग की जरूरत को गंभीरता से कम्युनिकेट किया। मैं यह बात बार-बार लगातार लिखता रहा हूं, और विश्व स्वास्थ्य संगठन के कहने व अमेरिका, ब्रिटेन, चीन, दक्षिण कोरिया आदि तमाम देशों के अनुभव से प्रमाणित है कि वायरस को खत्म करना है तो शुरुआत का एक ही तरीका है टेस्ट, टेस्ट और टेस्ट। उसे बाईपास करेंगे तो वायरस जीतेगा, इंसान हारेगा।

और इस काम में भारत अभी भी पिछड़ा हुआ है। इसलिए हमें पता नहीं है कि वायरस कितना फैल चुका है। ब्रिटेन ने वायरस से लड़ना शुरू करने से पहले टेस्टिंग बढ़ाने पर फोकस किया। यहीं न्यूयार्क में हुआ और यहीं दुनिया के बाकि महानगरों, बाकी देशों में हो रहा है। ब्रिटेन के मंत्री ने कहा कि हमारे यहां डायग्नोस्टिक क्षेत्र नहीं के बराबर था (वहां हेल्थ पूरी तरह सरकारी एनएचएस व्यवस्था में है) लेकिन हमने फलां-फलां कंपनी व फार्मा कंपनियों से बात कर डायग्नोस्टिक का सबसे बड़ा इंफ्रास्ट्रक्चर बना डाला है और अगले सप्ताह से कोरोना के एक लाख टेस्ट प्रतिदिन हुआ करेंगे। यही काम धड़ाधड़ न्यूयार्क, अमेरिका में हुआ।

मगर भारत में प्राइवेट क्षेत्र में डायग्नोस्टिक के भारी फैले धंधे के बावजूद भारत सरकार और आईसीएमआर मुश्किल से पूरे देश में अब तक 40-45 हजार टेस्ट पर पहुंचे हैं। पिछले एक महीने से दुनिया के तमाम विशेषज्ञ कह रहे हैं कि टेस्ट न होने से भारत में रियलिटी मालूम नहीं होगी लेकिन न टेस्ट किट का रिजर्व बना पाए है और न टेस्टिंग ट्रेनिंग पर फोकस है। कोरोना की टेस्टिंग सामान्य ढर्रे वाली नहीं है बहुत जटिल और जोखिम वाली है। टेस्ट करने वाले को भी सुरक्षित रहने का ध्यान रखना पड़ता है। न्यूयार्क के 300 टेस्ट करने की क्षमता वाले एक अस्पताल के इंचार्ज का कहना था टेस्ट नतीजा सही निकले, इसमें बहुत सावधानी बरतनी होती है, यह खतरा अधिक होता है कि रिजल्ट सही नहीं, बल्कि गलत आ जाए। तभी हम अपनी क्षमता 500 टेस्ट की नहीं बना पा रहे हैं।

इसलिए पहले टेस्ट और टेस्ट के बाद लैब में उसे सही नतीजे में निकालना बहुत चुनौतीपूर्ण है। तभी हिसाब से तमाम सरकारों का पहला फोकस टेस्ट और टेस्ट नतीजे की शुद्धता का इंफ्रास्ट्रक्चर बनवाने पर होना चाहिए। और यदि 14 अप्रैल तक भारत में रोजाना 50 हजार से एक लाख के बीच टेस्ट की क्षमता नहीं बनी, वायरस को तलाशने, पकड़ने का टेस्टिंग महा अभियान शुरू नहीं हुआ और लॉकडाउन के ही भरोसे रहे तो पूरा देश कोरोना से लड़ रहा होगा बिना यह जाने कि दुश्मन कहां है और धूल में लट्ठ मारते हुए नैरेटिव चल पड़ेगा कि गर्मी ने वायरस को सूखा दिया! बिना टेस्ट के भारत का वायरस से लड़ना वैसे ही है जैसे हवा में लकड़ी की तलवार से गतकेबाजी करना!

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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