गुजरातियों ने क्या पाप किया?

पता नहीं गुजरातियों को किन पापों का नतीजा भुगतना पड़ रहा है? भला गुजरातियों ने ऐसा क्या किया जो मरीज वेंटिलेटर पर लेटा है लेकिन फिर भी वायरस का टेस्ट नहीं। अहमदाबाद मिरर की एक रिपोर्ट ने दहला दिया है। दुनिया को भी पता पड़ा है कि भारत में सरकार की टेस्टिंग नीति का मकसद वायरस को घटा हुआ, खत्म हुआ बताना है। झूठे आंकड़े तैयार करना है। यह भी क्या गजब-बेबाक बात जो गुजरात सरकार के एडवोकेट जनरल ने अपने हाई कोर्ट में कही कि यदि अधिक टेस्ट हुए तो 70 प्रतिशत आबादी की कोविड-19 जांच रिपोर्ट पॉजिटिव निकलेगी और इससे पैनिक बनेगा।

इस पर हाई कोर्ट की टिप्पणी थी कि भला इस लॉजिक में टेस्टिंग कैसे कम होगी!

पर सरकार लॉजिक, तर्क, सत्य, वैज्ञानिकता पर नहीं चल रही है उसे देश में यह झूठ फैलाना है कि कोरोना वायरस की चिंता नहीं करो। कम मरीज हैं। कम मर रहे हैं और मरीज जल्दी ठीक भी हो रहे हैं। यह झूठ तब फलता-फूलता है जब टेस्ट न हो, टेस्ट हो तो उसके नतीजे तीन-चार दिन में दिए जाएं या सैंपल दबाए रखे जाएं। या बिना टेस्ट के मरीज को अस्पताल में रख उसे जल्दी बिना टेस्ट के ही छुट्टी भी दे दी जाए। फिर भले कोई मरीज सिविल अस्पताल से छुट्टी पा कर अहमदाबाद बस स्टैंड के पास मरा पड़ा मिले।

अहमदाबाद की एक खबर सुनी थी कि मरीज मर गया और उसकी पत्नी को सूचना नहीं दी गई। अहमदाबाद के सिविल अस्पताल से मरीज को ठीक हुआ बता छुट्टी दी गई लेकिन घर वालों को बुलवा कर मरीज सुपुर्द नहीं हुआ। वह घर जाते हुए रास्ते में ही गिर कर मर गया और फिर पुलिस ने परिवारवालों को सूचना दी कि फलां मरा मिला है।

मौत के कुएं में मौत का यह खेल इतना सहज-सामान्य है कि अहमदाबाद मिरर की रपट के अनुसार सरकारी, अहमदाबाद नगर निगम, एएमसी द्वारा संचालित और निजी अस्पतालों में भर्ती 18 मरीजों के मेडिकल दस्तावेज हैं, जो बताते हैं कि वे गंभीर हालत में हैं या वेंटिलेटर पर हैं, लेकिन उन्हें कोविड-19 टेस्ट की रिपोर्ट भर्ती होने के पांच दिन बाद भी नहीं मिली। भला क्यों? क्या इसलिए नहीं कि प्रदेश में वायरस के पॉजिटीव मरीज बढ़ने का आंकड़ा कंट्रोल में रहे। टेस्ट के बिना ही इलाज करा लो और बिना टेस्ट के ही इलाज हुआ मान अस्पताल से छुट्टी भी। मतलब मरीज की छुट्टी के साथ भी जरूरी नहीं कि टेस्ट करके पहले जान लिया जाए कि कोरोना खत्म हो गया है और मरीज अब निगेटिव है। मतलब रिकवरी और इलाज हो जाने का आंकड़ा भी इस टेस्ट गारंटी के साथ नहीं कि वह अब कोरोना नेगेटिव है। यहीं वह एप्रोच है, जिसमें सरकार सुविधा-सोच अनुसार आंकड़ों को कंट्रोल कर रही है। टेस्टिंग इस सोच, ऐसे प्रोटोकॉल से है, जिससे वायरस की हकीकत जानना नहीं, बल्कि उसकी हकीकत से खेलना बेसिक बात है।

क्या यह रवैया चीन से भी अधिक जघन्य, हकीकत को छुपाने वाला, संख्या को कृत्रिम रूप से नियंत्रित करने वाला नहीं है? आखिर भारत में तो सीधे मरीज की जान से खेला जा रहा है। प्राइवेट अस्पताल भी सरकार की अनुमति की मजबूरी में टेस्ट को ले कर लाचार हैं।

सोचें, अहमदाबाद के निजी अस्पतालों में भर्ती मरीज खाते-पीते परिवारों से ही होंगे। इन बेचारों का क्या कसूर या क्या पाप जो इलाज हो रहा है लेकिन बिना टेस्ट के। सरकार मरीज और अस्पताल दोनों को टेस्ट के लिए कई-कई दिन लटकाए रख रही है। दुनिया के दूसरे देशों में काउंटर लगा कर जनता को कार ड्राइव करते हुए टेस्ट की सुविधा है जबकि अहमदाबाद में हालात यह है कि पांच-छह दिनों से मरीज वेंटिलेटर पर हैं, उनका कोविड-19 का ट्रीटमेंट हो रहा है लेकिन यह पता नहीं है कि वे कोरोना पॉजिटिव हैं या नहीं! इसलिए क्योंकि उनके टेस्ट की लैब रिपोर्ट नहीं है।

गुजरात प्रधानमंत्री व गृह मंत्री का प्रदेश है। गुजरात के लोगों की बदौलत नरेंद्र मोदी का सत्ता शिखर बना है। उस नाते अहमदाबाद के सिविल हॉस्पिटल और टेस्टिंग आदि को लेकर जितनी-जैसी चर्चाएं हैं उसकी क्या मोदी-शाह को खबर नहीं होगी? पता नहीं। इतना ही कहा जा सकता है कि कम से कम अपने लोगों का, अपने सगों का तो बीमारी में सगा और सच्चा होना चाहिए। क्या नहीं?

2 thoughts on “गुजरातियों ने क्या पाप किया?

  1. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर सब को उड़ाने का हक है ,थोड़ा बहुत आटे में नमक तो पहले भी चलता था ,अब तो नमक में आटा ढूंढना मुश्किल है ,आज की पत्रकारिता ,,,,,फेंक न्यूज़ पोर्टल पर मार्केटिंग ,,,,,, का अजब-गजब धंधा चला रही है ।क्या नौसिखिया क्या धुरंधर सब जो मिल जाए, जैसे और जहां मिलजाये की झपटमारी में लगे हैं , आप कैसे पीछे रहेगें! कुंठा की मानसिकता से ग्रस्त व्यक्ति अपना आपा खो कर कहीं न कहीं तो भड़ास निकालेगा ही ,। उस में भी कुछ अर्थ लाभ हो जाते। तो इस मंहगाई और लाकडाऊन में क्या बुरा?
    अच्छी राह दिखा रहे हैं अगली पीढ़ी के पत्रकारों को !
    शुभकामनाएं।

  2. अरे भारत में संसद को अमेरिका जैसे बनना होगा ,आखिर क्या सोच कर प्रधानमंत्री ने संसद को रब्बर स्टंप बना दिया ।

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