कहां है पुण्यभूमि का गौरव - Naya India
हरिशंकर व्यास कॉलम | गपशप | बेबाक विचार| नया इंडिया|

कहां है पुण्यभूमि का गौरव

राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के नीति-सिद्धांत का कोर बिंदु पुण्यभूमि के गौरव में है। हम और वे का पूरा सिद्धांत इस बात पर है कि भारत जिनकी मातृभूमि है उनकी पुण्यभूमि दूसरी जगह कैसे हो सकती है? फिर इस पुण्यभूमि की आज ऐसी हालत क्यों है? इस पुण्यभूमि पर कैसा संकट आया हुआ है और इस संकटकाल में जिनके ऊपर इसकी रक्षा का भार है वे क्या कर रहे हैं? इस महान गौरवशाली सभ्यता का प्रतिनिधित्व करने वाले कहां हैं? साहिर ने आजादी के थोड़े समय बाद ही लिखा था- जरा मुल्क के रहबरों को बुलाओ, ये कूचे-ये गलियां-ये मंजर दिखाओ। आज फिर यह कहने का समय है। मुल्क के रहबरों को बाहर निकलना चाहिए। गंगा की रेती में दबी या गंगा की लहरों में डूबती-उतराती लाशों को देखना चाहिए। गलियों से उठते क्रंदन को सुनना चाहिए। अस्पतालों के अंदर-बाहर हो रही प्रार्थनाओं की आवाजें सुनने की कोशिश करनी चाहिए। इंसानियत के नाते नहीं तो अपनी पुण्यभूमि की रक्षा करने की जिम्मेदारी के नाते ही इसे बचाने की कोशिश करनी चाहिए। राष्ट्रकवि दिनकर ने आजादी से पहले और बाद में भी कई मौकों पर पुण्यभूमि के संकट का आख्यान लिखा और मुल्क के रहबरों व नागरिकों को ललकारते हुए उन्हें हकीकत का आईना दिखाया। आज फिर राष्ट्र के सामने संकट है, जैसा कि दिनकर ने लिखा- वीरान हुआ प्यारा स्वदेश! दूसरी ओर संकट की इस घड़ी में भी बूढ़े, कुटिल नीतिज्ञ लोगों को लड़वाने में लगे हैं। उन्हें याद रखना चाहिए, इतिहास में उनके नाम पर रोने वाला भी कोई नहीं होगा।

यह भी पढ़ें: झूठ को फिर भी शर्म नहीं!

सुखसिंधु, पंचनद, ब्रह्मपुत्र,
गंगा, यमुना की अमिय-धार
जिस पुण्यभूमि की ओर बही
तेरी विगलित करुणा उदार,
जिसके द्वारों पर खड़ा क्रान्त
सीमापति! तू ने की पुकार,
‘पद-दलित इसे करना पीछे
पहले ले मेरा सिर उतार।’
उस पुण्यभूमि पर आज तपी!
रे, आन पड़ा संकट कराल,
व्याकुल तेरे सुत तड़प रहे
डस रहे चतुर्दिक विविध व्याल।
मेरे नगपति! मेरे विशाल!
कितनी मणियां लुट गईं? मिटा
कितना मेरा वैभव अशेष!
तू ध्यान-मग्न ही रहा, इधर
वीरान हुआ प्यारा स्वदेश।

यह भी पढ़ें: जान से बड़ा कुछ भी नहीं

तुम्हीं टटोलो हृदय देश का

पर्वत पर, शायद, वृक्ष न कोई शेष बचा,
धरती पर, शायद, शेष बची है नहीं घास;
उड़ गया भाप बनकर सरिताओं का पानी,
बाकी न सितारे बचे चाँद के आस-पास ।
क्या कहा कि मैं घनघोर निराशावादी हूँ?
तब तुम्हीं टटोलो हृदय देश का, और कहो,
लोगों के दिल में कहीं अश्रु क्या बाकी है?
बोलो, बोलो, विस्मय में यों मत मौन रहो ।

नहीं डरना है

अब जो सिर पर आ पड़े, नहीं डरना है,
जनमे हैं तो दो बार नहीं मरना है।
कुत्सित कलंक का बोध नहीं छोड़ेंगे,
हम बिना लिये प्रतिशोध नहीं छोड़ेंगे,
अरि का विरोध-अवरोध नहीं छोड़ेंगे,
जब तक जीवित है, क्रोध नहीं छोड़ेंगे।

मेरे नगपति! मेरे विशाल!
कह दे शंकर से, आज करें
वे प्रलय-नृत्य फिर एक बार।
सारे भारत में गूँज उठे,
‘हर-हर-बम’ का फिर महोच्चार।
ले अंगडाई हिल उठे धरा
कर निज विराट स्वर में निनाद
तू शैलीराट हुँकार भरे
फट जाए कुहा, भागे प्रमाद
तू मौन त्याग, कर सिंहनाद
रे तपी आज तप का न काल
नवयुग-शंखध्वनि जगा रही
तू जाग, जाग, मेरे विशाल

मेरे नगपति! मेरे विशाल!
कितनी मणियाँ लुट गईं? मिटा
कितना मेरा वैभव अशेष!
तू ध्यान-मग्न ही रहा, इधर
वीरान हुआ प्यारा स्वदेश।
वैशाली के भग्नावशेष से
पूछ लिच्छवी-शान कहाँ?
ओ री उदास गण्डकी! बता
विद्यापति कवि के गान कहाँ?
तू तरुण देश से पूछ अरे,
गूँजा कैसा यह ध्वंस-राग?

वह कौन रोता है वहां-
इतिहास के अध्याय पर,
जिसमें लिखा है, नौजवानों के लहू का मोल है
प्रत्यय किसी बूढ़े, कुटिल नीतिज्ञ के व्यवहार का;
जिसका हृदय उतना मलिन जितना कि शीर्ष वलक्ष है;
जो आप तो लड़ता नहीं,
कटवा किशोरों को मगर,
आश्वस्त होकर सोचता,
शोणित बहा, लेकिन, गई बच लाज सारे देश की?

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *