विपक्षी नेतृत्व का संकट

विपक्ष के सामने एक बड़ा संकट नेतृत्व का है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी बरसों से रिटायर होने की प्रतीक्षा में हैं। उनकी उम्र 70 साल से ज्यादा हो गई है और वे बीमार भी रहती हैं। कायदे से राहुल गांधी को उनकी जगह संभाल लेनी चाहिए थी और जिस तरह 20 साल पहले अध्यक्ष बनने के बाद सोनिया गांधी लड़ती-भिड़ती और हारती रहीं उसी तरह राहुल भी करते तो अब तक उनका नेतृत्व तैयार हो गया होता। पर ऐसा लगता है कि उन्होंने बिना जिम्मेदारी के अधिकार चाहिए थे, जो उनकी मां के अध्यक्ष रहते उनको मिला। सोनिया के साथ साथ कांग्रेस का पुराना और सक्षम नेतृत्व भी अब धीरे धीरे रिटायर होने की कगार पर पहुंच गया है। सोनिया के समकक्ष लगभग सारे नेता 70 साल के हो गए हैं। उनकी जगह लेने के लिए कांग्रेस में जो नेतृत्व तैयार होता दिख रहा है उसमें एकाध अपवादों के अलावा बाकी बहुत उम्मीद नहीं जगाता है।

लंबे समय तक देश में विपक्ष की आवाज रहे और भाजपा विरोध का चेहरा रहे लालू प्रसाद कई सालों से जेल में बंद हैं और दस तरह की बीमारियों के शिकार हैं। आखिरी बार उन्होंने 2015 में भाजपा को निर्णायक रूप से पराजित किया था। पर उसके थोड़े समय के बाद ही बिहार में उनकी बनवाई सरकार चली गई और उनको सजा हो गई। भाजपा विरोध का एक और बड़ा चेहरा मुलायम सिंह यादव का रहा है। उनकी उम्र भी बहुत हो गई है और वे भी बेटे को नेतृत्व सौंप कर बुढ़ापा काट रहे हैं। लालू प्रसाद के बेटे तेजस्वी या मुलायम सिंह के बेटे अखिलेश की नीयत, समझ या भलेपन को लेकर सवाल नहीं है, पर इन दोनों में संघर्ष की कमी है, जिसकी आज सबसे ज्यादा जरूरत है।

बहरहाल, कांशीराम नहीं हैं और मायावती की भी राजनीतिक सक्रियता पहले जैसी नहीं है। करुणानिधि का निधन हो गया है और लेफ्ट का लगभग समूचा पुराना नेतृत्व बदल गया है। गाहे-बगाहे विपक्षी एकता का प्रयास करने वाले चंद्रबाबू नायडू को पिछले चुनाव में ऐसी चोट पड़ी है कि वे चुनाव के डेढ़ साल बाद तक अपने जख्म सहला रहे हैं। शरद पवार जरूर सक्रिय हैं, पर उनकी उम्र 80 साल के करीब हो गई है, वे कैंसर सर्वाइवर हैं और उनका पूरा प्रयास अब किसी तरह से बेटी की राजनीतिक सत्ता मजबूत करने पर है। सो, कांग्रेस हो या समाजवादी और वामपंथी पार्टियां हों, उनका संघर्ष करने वाला नेतृत्व खत्म हो गया है। अब जो नेतृत्व बचा है वह ट्विटर पर राजनीति करने वाला है। उसने न आजादी की लड़ाई देखी है, न आजादी की दूसरी लड़ाई देखी है और न उसके बाद के राजनीतिक समय में संघर्ष किया है। ज्यादातर नेताओं को राजनीति विरासत में मिली है, इसलिए वे इसे अपना अधिकार मानते हैं। परंतु सच ये है कि उनके पास इसे बचाए रखने और अपने को मजबूत करने की क्षमता नहीं है। विरासत में सत्ता मिलने से जो अहंकार आता है वह इन नेताओं का सबसे बड़ा शत्रु है।

कांग्रेस से निकले नेताओं में से ममता बनर्जी इकलौती नेता हैं, जिनमें कुछ संभावना है। उन्हें राजनीति विरासत में नहीं मिली है। उन्होंने सड़कों पर संघर्ष करके सत्ता हासिल की है। वे किसी नेता की बेटी, बहू, पत्नी या प्रेमिका नहीं हैं। यह बात उन्हें सिर्फ भारत में नहीं, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया में खास बनाती है। वे अखिल भारतीय स्तर पर विपक्ष को नेतृत्व दे सकती हैं, पर उसकी शर्त होगी कि विरासत में नेतृत्व व सत्ता हासिल करने वाले नेता उनको अपना नेता मानें, जिसकी संभावना अभी नहीं दिख रही है।

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