दुनिया से कितना कुछ सीख सकते हैं

भारत में कोराना वायरस के संक्रमण के पहले मामले की पुष्टि 30 जनवरी को हुई थी। पर दुनिया उससे पहले से इस संक्रामक बीमारी से जूझ रही थी। उससे एक महीना पहले यानी 30 दिसंबर को चीन ने विश्व स्वास्थ्य संगठन, डब्लुएचओ को जानकारी दी थी कि इंसान से इंसान में फैलने वाला एक वायरस पाया गया है, जो जानलेवा हो रहा है। पर ताइवान का कहना है कि उसे इससे भी एक महीने पहले इस वायरस की जानकारी मिल गई और चीन ने इसे छिपाए रखा। इस आरोप की भी जांच होगी। लेकिन वायरस का पता चलने के बाद चीन सहित दुनिया के सभ्य और विकसित देशों ने इस पर काबू पाने के लिए जो उपाय किए उनसे भारत बहुत कुछ सीख सकता है।

बचाव के उपायों को लेकर दो मिसालें दी जा सकती हैं। एक तो खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दी। उन्होंने राष्ट्र के नाम अपने आखिरी संबोधन में कहा कि ग्राम प्रधान से लेकर देश के प्रधान तक सब पर एक समान कानून लागू होता है। ऐसा कहते हुए वे बुल्गारिया का उदाहरण दे रहे थे, जहां के प्रधानमंत्री के मास्क नहीं लगाने पर उनके ऊपर 13 हजार रुपए का जुर्माना किया गया था। सोचें, बुल्गारिया जैसे देश में जिसकी आबादी महज 70 लाख है और कोरोना वायरस के भी सिर्फ पांच हजार मामले हैं वहां के प्रधानमंत्री को मास्क नहीं लगाने के लिए जुर्माना लगा दिया गया। इसके उलट भारत में राजनीतिक गतिविधियां चल रही हैं, सरकारें बन-बिगड़ रही हैं, मंत्री शपथ ले रहे हैं और फोटो खिंचवा रहे हैं और मास्क नदारद है, जबकि संक्रमण के मामले सवा छह लाख से ज्यादा हो गए हैं।

दूसरी मिसाल न्यूजीलैंड की है, जहां के एक मंत्री ने लॉकडाउन का उल्लंघन किया और उन्हें मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा। उनकी गलती यह थी कि वे लॉकडाउन के दौरान समुद्र के किनारे चले गए थे। ध्यान रहे न्यूजीलैंड वह देश है, जिसने सबसे पहले कोरोना से मुक्ति पाई। भारत को यह बुल्गारिया और न्यूजीलैंड के अनुभव से सीखना चाहिए कि अगर कोरोना की महामारी पर काबू पाना है तो सोशल डिस्टेंसिंग, लॉकडाउन के नियम, मास्क, सैनिटाइजर या इस तरह के जितने भी उपाय देश की सरकार या विश्व स्वास्थ्य संगठन ने बताए हैं उनका पालन किया जाना चाहिए।

चीन में जहां सबसे पहले कोरोना वायरस का पता चला, वहां से भारत को सीखना चाहिए कि कैसे संक्रमित व्यक्ति का पता लगाया जाता है, उसके संपर्क में आने वाले लोग कैसे खोजे जाते हैं, उन्हें कैसे क्वरैंटाइन किया जाता है और इस तरह मामले को खत्म किया जाता है। वह सबक टेस्टिंग का है। चीन की आबादी एक सौ 45 करोड़ के करीब है और उसने कोरोना का पता लगाने के लिए नौ करोड़ चार लाख से ज्यादा टेस्ट कराए हैं। उसने हर दस लाख की आबादी पर 63 हजार टेस्ट कराए। इसके उलट भारत में एक सौ 30 करोड़ आबादी है और टेस्ट सिर्फ 92 लाख हुए हैं। भारत ने दस लाख लोगों पर 67 सौ टेस्ट कराए हैं। यानी आबादी चीन के बराबर है और टेस्टिंग उससे दस गुना कम है। इसके बावजूद भारत का दावा है कि कोरोना पर काबू पा लेंगे, जो कि संभव नहीं है।

चीन के अनुभव से भारत ने पहले सबक नहीं लिया अन्यथा पूरे देश में एक साथ उतना सख्त लॉकडाउन नहीं लागू किया जाता। चीन ने सिर्फ वुहान शहर को लॉकडाउन किया था और वहीं पर वायरस को रोकने का उपाय किया। इसके उलट भारत बिना सोचे समझे पूरे देश में लॉकडाउन कर दिया और वह भी लोगों को बिना समय दिया। इससे जो घबराहट पैदा हुई उसका नतीजा था कि देश भर से लाखों की संख्या में मजदूर, कामगार, पेशेवर अपने घर लौटने लगे। सरकार इसे रोक नहीं पाई और उसके बाद आम लोगों के बीच लोकप्रिय धारणा को मैनेज करने के लिए मजदूरों को घर पहुंचाया जाने लगे। इसका नतीजा यह हुआ है कि लॉकडाउन का पूरा सिद्धांत ही फेल हो गया। कोरोना वायरस पूरे देश में पहुंच गया। जब वायरस पूरे देश में पहुंच गया और संक्रमण के पांच हजार से ज्यादा मामले रोज आने लगे तो लॉकडाउन हटा दिया गया। अब अनलॉक का दूसरा चरण चल रहा है और 20 हजार से ज्यादा मामले रोज आ रहे हैं।

ऐसे में भारत को अमेरिका और दूसरे यूरोपीय देशों से सीखने की जरूरत है, जिन्होंने पूरे देश को लॉकडाउन नहीं किया। उसकी बजाय लोगों के लिए परामर्श जारी हुए कि उन्हें क्या करना चाहिए और क्या नहीं। बिल्कुल उसी स्टेज में आज भारत है। सो, भारत को यूरोप के सबसे ज्यादा प्रभावित इटली, स्पेन, फ्रांस और ब्रिटेन के साथ साथ अमेरिका से भी सबक लेना चाहिए, जिन्होंने संकट के बीच टेस्टिंग, ट्रेसिंग और ट्रीटमेंट के फार्मूले से कोरोना पर काबू किया। स्पेन ने दस लाख लोगों पर एक लाख 16 हजार और इटली ने दल लाख की आबादी पर 90 हजार टेस्टिंग की। टेस्टिंग के अलावा इन देशों ने अपने पहले से बेहतर मेडिकल सुविधाओं को और बेहतर बनाया। भारत को इनसे सीखना चाहिए कि कैसे अपनी मौजूदा मेडिकल सुविधाओं का बेहतर इस्तेमाल हो सकता है।

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