चुनाव को गृहयुद्ध बनाना!

किस देश में ऐसा है या हुआ है कि चुनाव गृहयुद्ध जैसे लड़ा जाए? लोकतंत्र को गृहयुद्ध का रूप मिले? देशभक्त बनाम देशद्रोही और हिंदू बनाम मुस्लिम में वह कन्वर्ट हो? ध्यान रहे गृहयुद्ध अपने ही घर में दो जमातों में आमने-सामने की लड़ाई है। यमन, सीरिया, दक्षिणी सूडान आदि में गृहयुद्ध देश की सीमा, राष्ट्र-राज्य के भीतर आमने-सामने की लड़ाई में लड़ा जा रहा है। मुसलमान बनाम ईसाई या हुथी बनाम सुन्नी के गृहयुद्ध वाले शहर, प्रांत में अलग-अलग इलाकों के बाड़े और उनमें रहते लोग हैं, जिनमें झगड़ा होता है और हुंकारा लगता है मारो सालों को। फलां इलाके में नहीं जाना है और वह उनका इलाका और यह हमारा! झगड़े में एक-दूसरे पर गोली, बंदूक तानने, मारने-पीटने की बातें होती हैं और नेता-कमांडर अपने-अपने लोगों को भड़काते-उकसाते हैं कि वे तो दुश्मन और मारो सालों को।

दुनिया का अनुभव है, भारत का अनुभव है कि जो सोचा नहीं होता है वह चिंगारी याकि गृहयुद्ध वाली राजनीति देश का बंटवारा करवा देती है। उस नाते पुराणों का कहा यह सही है कि एक छोटा सा पत्थर वक्त आने पर पहाड़ बन जाता है। शहर बंटते हैं, देश बंटते हैं।

उस अनुभव में जरा दिल्ली महानगर की पिछले एक महीने की तस्वीर पर गौर करें। पूरी दुनिया में, भारत में शाहीन बाग एक अलग इलाका प्रचारित है, जिसके मुसलमानों से मैसेज है कि वे पीड़ित हैं तो दूसरी और हिंदुओं से कहा गया है कि शाहीन बाग में लाखों लोग इकट्ठा हो जाते हैं। दिल्ली के लोगों को इसके बारे में सोच समझकर फैसला लेना होगा। वो लोग आपके घरों में घुसकर आपकी बहन बेटियों के साथ दुष्कर्म करेंगे, उन्हें मार डालेंगे। अभी समय है, मोदी जी और अमित शाह कल आपको बचाने नहीं आएंगे। आज अगर दिल्ली के लोग जाग जाएंगे तो अच्छा रहेगा। लोग आज सुरक्षित महसूस कर रहे हैं और तब तक करेंगे जब तक मोदी जी प्रधानमंत्री हैं। अगर कोई और प्रधानमंत्री बन जाएगा तो कोई आपको बचाने नहीं आएगा। यह बयान भाजपा के सांसद प्रवेश वर्मा का है।

और शाहीन बाग के परिप्रेक्ष्य के बीच भारत के गृहमंत्री अमित शाह का आह्वान है – (ईवीएम का) का बटन इतनी ज़ोर से दबाओ कि उसका करंट शाहीन बाग में महसूस हो।

जाहिर है शाहीन बाग चुनावी गृहयुद्ध का वह क्षेत्र बना है, जिसके दसियों संस्करण सीएए कानून बनने के बाद देश के अलग-अलग शहरों में हैं। मुसलमान, सेकुलर, विरोधियों ने धरना-प्रर्दशन के जो शाहीन बाग बनाए हैं वे आर-पार की लड़ाई की चिंगारियों के साथ हैं तो यह हवा भी बना रहे हैं कि देश में रहना है तो लड़ कर जीना होगा।

क्या मैं गलत लिख रहा हूं? लोकतंत्र की एक सामान्य प्रक्रिया, कायदे, तरीके को राजनीति ने किस माहौल में परिवर्तित कर दिया है? दो खेमों, खेमों के दो इलाकों में क्या कन्वर्ट नहीं कर दिया है? एक इलाका देशभक्तों का व दूसरा देशद्रोहियों का? देशद्रोहियों के शाहीन बाग इलाके को अरविंद केजरीवाल द्वारा बिरयानी सप्लाई करने का एक मुख्यमंत्री का आरोप है तो एक सामान्य बुद्धि का हिंदू शाहीन बाग पर बंदूक तान बोलता है- हिंदू राष्ट्र जिंदाबाद! हमारे देश में किसी की नहीं चलेगी, सिर्फ हिंदुओं की चलेगी! तो हिंदू सांसद लोगों से कहता है- यदि केजरीवाल लौट आया तो शाहीनबाग टाइप के लोग सड़कों पर उतर आएंगे!

मानो यह कम हो तो अपने लोगों को आह्वान के ये तराने भी हैं कि -दिल्ली तू अब जाग ले, जोरों से गांठ बांध ले, हर द्रोही तू पहचान ले, देश अपना अभिमान ले! या इस तराने को सुनें– हो कर वहां नाकाम वो (कश्मीरी मुसलमान), दुबक कर दिल्ली आए भाग, और खड़े कर दिए सैकड़ों शाहीन बाग!

उफ! हम हिंदुओं को सचमुच राज करना नहीं आता। बुद्धि का ऐसा भारी अजीर्ण जो देश हिंदू का, घोर हिंदू राष्ट्रवादी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और सरदार पटेल जैसे लौह पुरूष माने जाने वाले अमित शाह देश के गृहमंत्री के रहते हुए भी हिंदुओं को चेताया जा रहा है कि सैकेड़ों शाहीन बाग! और यदि उन्हें नहीं हराया तो लोग आपके घरों में घुसकर आपकी बहन बेटियों के साथ दुष्कर्म करेंगे, उन्हें मार डालेंगे।

निश्चित ही जुबानी जंग और असली जंग, जुबानी गृहयुद्ध और असली गृहयुद्ध फर्क लिए होता है। मगर ईमानदारी से सोचें कि पिछले पांच वर्षों में हिंदुओं का भारत राष्ट्र-राज्य जुबानी गृहयुद्ध में धीरे-धीरे क्रमशः कितना जहरीला होता गया है जो एक नगरपालिका माफिक दिल्ली चुनाव में नौबत आई पड़ी है कि केंद्रीय मंत्री अपने मैदान के लोगों से आह्वान कर रहा है कि ”जो अपने देश के टुकड़े होना मंजूर कर ले वो कब आपके टुकड़े करने के लिए उतारू हो जाए पता नहीं” या बकौल दूसरे मंत्री — ‘देश के गद्दारों को… और मंच के नीचे मौजूद लोगों का हुंकारा – ‘गोली मारो सा…को’।

सोचें दिल्ली के बाद बिहार, बंगाल और उत्तरप्रदेश में एक के बाद एक चुनाव हैं तो 2024 में चुनावी गृहयुद्ध क्या रूप लिए हुए होगा?

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