अमेरिका और भारत के नेताओं का फर्क

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिकी लोकतंत्र को सूली पर टांगा है। सारी दुनिया में अमेरिका का मजाक बन रहा है। जिन देशों में नेताओं और लोगों में लोकतंत्र की बुनियादी समझ नहीं है वे भी अमेरिकी लोकतंत्र पर सवाल उठा रहे हैं। सोशल मीडिया में मीम बनाए जा रहे हैं। कहा जा रहा है कि दुनिया भर को लोकतंत्र का निर्यात करते करते अमेरिका के पास अपने लिए ही लोकतंत्र नहीं बचा। अमेरिकी संसद कैपिटल हिल में ट्रंप के हिंसक समर्थकों के लंगूरों की तरह दिवार पर चढ़ने की फोटो शेयर करके अमेरिका का मजाक हो रहा है।

यह हुआ है और इससे इनकार नहीं किया जा सकता है। सिर्फ वहीं नहीं जो छह जनवरी को हुआ, बल्कि तीन नवंबर को चुनाव के बाद पिछले 64-65 दिन में राष्ट्रपति ट्रंप और उनके समर्थकों ने जो कुछ भी किया है वह अमेरिकी लोकतंत्र पर धब्बा है। छह जनवरी की घटना वह  कलंक है, जिसे मिटाने में बरसों लगेंगे। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने अमेरिकी राजनीति, वहां के नेताओं, अधिकारियों और आम लोगों का वह शानदार पक्ष भी जाहिर किया है, जिसकी कल्पना भारत या दुनिया के किसी और देश में करना मुश्किल है। निर्वाचित राष्ट्रपति जो बाइडन ने अपने भाषण में कहा कि दुनिया जिसे देख रही है वह अमेरिका की असलियत नहीं है। उन्होंने ठीक कहा, छह जनवरी को लोगों ने जो देखा या ट्रंप ने जो किया वह अमेरिका की असलियत नहीं है। वह एक व्यक्ति की सत्तालोलुपता और नीचता की मिसाल है।

बहरहाल, जरा अमेरिकी नेताओं और उनके चेहरे के साथ भारत के नेताओं और उनके चेहरों की तुलना करें फिर पता चलेगा कि अमेरिकी लोकतंत्र में क्या खूबसूरत है। ट्रंप की अपनी रिपब्लिकन पार्टी के अमेरिकी कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व में शामिल मैकमॉरिस रोजर्स ने ट्रंप की खुल कर आलोचना की और कहा कि पार्टी जो बाइडेन के वोट को मान्यता देती हैं। उप राष्ट्रपति माइक पेंस ने अपने को ट्रंप से अलग किया और दुनिया के सबसे शक्तिशाली उच्च सदन यानी सीनेट में रिपब्लिकन पार्टी के नेता मिच मैकॉनेल ने ट्रंप से नाता तोड़ने का ऐलान किया।

अमेरिकी लोकतंत्र की क्या खूबसूरती है यह सीनेट और प्रतिनिधि सभा के सदस्यों ने दिखाया।  हिंसा के बाद जब कांग्रेस वापस बैठी और इलेक्टोरल कॉलेज के वोट के सर्टिफिकेशन की प्रक्रिया शुरू हुई तो पार्टी लाइन पूरी तरह टूट गई। जिनको लग रहा था कि रिपब्लिकन पार्टी ट्रंप का साथ देगी वे दंग रह गए। एक सौ सदस्यों की सीनेट के रिपब्लिकन पार्टी के पास 50 के करीब सांसद हैं, लेकिन सिर्फ सात ने उनका साथ दिया। निर्वाचित राष्ट्रपति बाइडेन के लिए हुई वोटिंग पर उठाई गई आपत्तियां सात के मुकाबले 93 वोट से नामंजूर की गईं। इन 93 लोगों में 40 से ज्यादा रिपब्लिकन सांसद थे। ऐसे ही 444 सदस्यों की प्रतिनिधि सभा में दो आपत्तियां करीब तीन-तीन सौ वोट के बहुमत से खारिज की गईं। इनमें भी एक सौ के करीब सांसद ट्रंप की पार्टी के थे, जिन्होंने उनका साथ नहीं दिया।

ट्रंप की विरोधी डेमोक्रेटिक पार्टी के किसी भी नेता से पहले इलियोनॉय के रिपब्लिकन सांसद एडम किन्जिंगर ने कहा कि 25वें संशोधन का इस्तेमाल करके ट्रंप की शक्तियां वापस ली जाएं और उन्हें राष्ट्रपति पद से हटाया जाए। सोचें, कैसे अमेरिकी संसद पर ट्रंप के हिंसक समर्थकों ने हमला किया और उसके बाद उनकी अपनी पार्टी के लोगों ने उन्हें हटाने का अभियान शुरू कर दिया। अब बतौर राष्ट्रपति उनका कार्यकाल सिर्फ 12 दिन का है फिर भी उन्हें हटाने के लिए सारे संवैधानिक उपाय किए जा रहे हैं और उनके विरोधियों से पहले उनकी अपनी पार्टी के लोग ऐसा कर रहे हैं। क्या भारत में कभी इसकी कल्पना की जा सकती है कि प्रधानमंत्री की पार्टी का कोई भी नेता उसके खिलाफ बोलेगे या उसके किसी फैसले को चुनौती देगा? याद नहीं आ रहा है कि 1975 की आधी रात को इंदिरा गांधी ने लोकतंत्र पर सबसे बड़ा हमला किया और इमरजेंसी की घोषणा की तो कांग्रेस के किसी नेता ने उनके इस फैसले पर सवाल उठाया। कुछ लोगों ने पार्टी जरूर छोड़ी पर वह दो साल बाद चुनाव के समय। ऐसे ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नोटबंदी का विध्वंसक फैसला किया तो उनकी पार्टी के किसी नेता ने सवाल नहीं उठाया। उस फैसले की मार से आज तक देश की आर्थिकी और करोड़ों लोग कराह रहे हैं पर अब भी किसी की हिम्मत नहीं होती उस फैसले का विरोध करने की।

इसके उलट अमेरिका में थोड़े से लोगों को छोड़ कर लगभग पूरी रिपब्लिकन पार्टी ट्रंप के खिलाफ खड़ी है। इसके बावजूद कि उन्हें सात करोड़ से ज्यादा अमेरिकियों के वोट मिले हैं। लेकिन उनकी पार्टी के नेताओं को पता है कि उन वोटों की गिनती से ज्यादा जरूरी लोकतंत्र का बचना है। सोचें, जिस समय कैपिटल हिल पर हमले की खबरें आ रही थीं उसी समय वायमिंग की रिपब्लिकन सांसद लिज चेनी ने दो टूक कहा कि ट्रंप ने दंगा भड़काया है, वे दोषी हैं। मिसौरी के रिपब्लिकन सांसद रे ब्लंट ने सार्वजनिक बयान दिया और हिंसा के लिए ट्रंप को जिम्मेदार ठहराते हुए इस पूरी घटना पर दुख जताया।

ट्रंप की पार्टी की सांसद कैली लोफ्लेर ने संसद में बुधवार को हुई घटना पर अफसोस जाहिर किया। इसे शर्मनाक घटना बताया। साथ ही यह भी कहा वे इलेक्टोरल कॉलेज की वोटिंग के दौरान सर्टिफिकेशन पर विरोध जताना चाहती थीं लेकिन, इस घटना के बाद उन्होंने इरादा बदल दिया। कैली ने कहा- बुधवार सुबह मैं वाशिंगटन यह तय करके पहुंचीं कि इलेक्टोरल सर्टिफिकेशन प्रोसेस में आपत्ति दर्ज कराऊंगी। लेकिन, यहां जो कुछ देखा उसके बाद अपना फैसला बदल दिया। मेरा ईमान मुझे अब सर्टिफिकेशन प्रोसेस में अड़ंगा लगाने की इजाजत नहीं देता। ये हिंसा, कानून तोड़ना हमारे लोकतंत्र की पवित्रता पर हमला है।

भगवान न करे भारत में कभी ऐसी स्थिति बने पर सोचें, अगर आज ऐसी स्थिति भारत में बन जाए तो सत्तारूढ़ दल का कौन सा चेहरा दिख रहा है, जो अपने नेता के खिलाफ इस तरह का स्टैंड ले पाएगा? आजादी के बाद नेहरू से लेकर नरेंद्र मोदी तक यह भारत की हकीकत है कि कुर्सी पर बैठा नेता ही सर्वोच्च रहा। वह अपनी समझदारी या सनक में जो कुछ करता रहा, पूरी पार्टी और सारे नेता उस पर सहमति जताते रहे। वह गड़ेरिए की तरह पार्टी और सरकार को हांकता रहा।

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