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Wednesday, April 14, 2021
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टीकाकरण अभियान में मुश्किल

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हरिशंकर व्यासhttp://www.nayaindia.com
भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था।आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य।संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

भारत का संकट 138 करोड आबादी के हिसाब से वैक्सीन की अरबों खुराक-डोजेज खरीदना है। फिलहाल साफ नहीं है कि टीका कितनी अवधि तक वायरस को रोकने-खत्म रखने में कारगर होगा? छह महिने-साल-डेढ साल ही टीका प्रभावी रहा तो अमेरिका-योरोप जैसे विकसित देशों में लगातार टीकाकरण-एकसाथ टीकाकरण का इंफ्रास्ट्रक्चर बनाना भले संभव हो मगर भारत में क्या यह संभव है?  तब कैसा महंगा होगा?

भारत का प्रमुख मसला यह है कि हम 2021 व 2022 में वैक्सीन के कितने करोड डोज खरीद सकेंगे? क्या पूरी आबादी के अनुसार खरीद की जा सकते है? नहीं। इसलिए कि फिलहाल वैश्विक पैमाने पर वैक्सीन निर्माण, एडवांस खरीद के हुए सौदों की जो रिपोर्ट है उसमें वॉल स्ट्रीट जरनल की एक रिपोर्ट के अनुसार अमीर और मध्य आय के देशों ने वैक्सीन निर्माता कंपनियों के साथ एडवांस में जो सौदे किये है उसकी सप्लाई मैन्यूफैक्चरर सन् 2021 के आखिर तक पूरी कर पाएंगे। इन देशों ने 3.8 बिलियन डोज का आर्डर दिया है। भारत ने 1.5  बिलियन डोज खरीद का आर्डर दिया है। पर यह अमेरिका-योरोप या दूसरे देशों की प्राथमिकता से पहले भारत को मिलेगा या भारत का आर्डर रूस की स्पूतनिक जैसी वैक्सीन के भरोसे है, यह स्पष्ट नहीं है। फिलहाल इतना ही कह सकते है कि जैसे भारत सरकार ने पिछले नौ महिनों में टेस्टींग के नाम पर रैपिड टेस्ट कीट से हल्ला बनाया वैसा आगे वैक्सीन के मामले में भी संभव है। यदि रूस से निर्मित स्पूतनिक या चीन में बनी रही वैक्सीन के भरोसे अपना टीकाकरण का कार्यक्रम बना तो मामला अलग बनेगा।

आने वाले महिनों में यह बवाल भारी होगा कि कौनसी वैक्सीन ज्यादा प्रभावी है? रूस, चीन सहित दुनिया के कई देशों में हौड है। एक रिपोर्ट अनुसार वैक्सीन विकास की 150 कोशिशे अलग-अलग चरण में है। भारत में भी यह काम हो रहा है तो ऑक्सफोर्ड-एस्ट्राजेनेका की वैक्सीन यदि पूणे की फर्म सीरम इंस्टीट्यूट से जल्दी मिलना शुरू हो जाए और उससे यदि दस करोड डोज से बी टीकाकरण काम शुरू हो तो पूरे प्रोग्राम की एक दिशा बनेगी। मतलब क्वालिटी आधार पर वैक्सीन का फैसला हो सकेगा। किस तकनीक ( रूस की स्पूतनिक, ऑक्सफोर्ड-एस्ट्राजेनेका, मोडर्ना, फाइजर की वैक्सीनों में तकनीक, सुरक्षा, डोज के असर की अवधि, वैक्सीन के संग्रहण, कब-कब डोज, कीमत आदि के फर्क है।), को अपनाएगें, उसमें सस्ते-आसानी का जुगाड़ होगा या क्वालिटी का, यह जून-जुलाई 2021 तक ही स्पष्ट हो पाएगा।

तभी वैक्सीन टीकाकरण का रोडमैप बनना महिनों बाद की बात है। अमेरिका, योरोप, चीन, जापान जैसे विकसित देश पहले नार्मल-सामान्य होने के कगार पर पहुंचे तब संभव होगा यह सोचना कि भारत सन् 2022 में या 2023 या कब इतना सामान्य बनेगा जो विदेशी पर्यटक वापिस भारत घूमने आने लगे।

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