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Monday, April 19, 2021
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एक जज और देश का मन

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हरिशंकर व्यासhttp://www.nayaindia.com
भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था।आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य।संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

मैं 1975 की इमरजेंसी के युवा मन पर जेएनयू में हुए अनुभव में मानवाधिकारों और सिविल लिबर्टी का घनघोर समर्थक रहा हूं। दक्षिणपंथ और पश्चिमी सभ्यता बनाम सोवियत संघ के कम्युनिस्ट तंत्र पर अपनी सोच में, मैं लेखन की शुरुआत से हर पंथ के विचार अधिकार, मानवाधिकारों का समर्थक रहा हूं। 1975 से ही मैं एमनेस्टी इंटरनेशनल जैसे मानवाधिकार संगठनों का मुरीद रहा हूं (जिसे मोदी सरकार ने भारत छोड़ने को मजबूर किया)। मैं कांग्रेस राज के वक्त में संघ-भाजपा-मोदी-शाह के खिलाफ झूठे आरोपों पर लिखता रहा हूं तो नक्सल नेताओं के मानवाधिकारों का भी पैरोकार रहा हूं। इसी अखबार में काली-सफेद दाढ़ी याकि इसरत जहां केस के झूठे नैरेटिव में मैंने मोदी-शाह के साथ हो रही पुलिस ज्यादती और झूठ का जिस पुरजोर अंदाज में खुलासा करते हुए पहले पेज पर किस्त-दर-किस्त छापा था तो वह खम ठोंक था। तब किसी में हिम्मत नहीं थी वैसा लिखने की। जबकि आज मुझे मोदी-शाह, लंगूरी भक्त यह ज्ञान देते हुए हैं कि 21-22 साल की हुई तो क्या हुआ, दिशा देशद्रोही है तो उसका आप कैसे बचाव कर रहे हैं।

ऐसी बुद्धि पर क्या रोना रोएं! यदि उद्धव ठाकरे कल अपनी पुलिस से हजार-दो हजार नामी भक्त लंगूरों पर देशद्रोह, राजद्रोह, सांप्रदायिक वैमनस्य की कंपलेन लिखवा इन्हें जेल में डालें और बिना जमानत ये जेल में सड़ते रहें तो इन सबकी सिविल लिबर्टी संविधान-लोकतंत्र बचाने, मानवता-इंसानियत की रक्षा में अपने आपको झोंकना होगा या नहीं। 21 साल की दिशा या 88 साल के वरवरा राव सभी को (या एक वक्त में कथित हिंदू आंतक के नाम पर प्रज्ञा आदि) जेल में रखना ही देश रक्षा है तो तय मानें भारत हमेशा वैसे ही शापित रहना है जैसे इतिहास में रहा है!

तभी जिस तेजी से मोदी-शाह ने छह वर्ष में भारत के लोगों को, भारत की संस्थाओं को मारा है, उन्हें अमानवीय और पालतू बना सिविल लिबर्टी का जो फलूदा बनाया है उसमें 21 साला दिशा रवि का प्रकरण मील का पत्थर है तो देश के मन (कई मायनों में दुनिया को भी) को झिंझोडने वाला भी। भारत राष्ट्र-राज्य का गृह मंत्रालय, महाबली दिल्ली पुलिस के आला नेतृत्व ने एक 21 साला लड़की को राजद्रोही, देशद्रोही करार देने के लिए क्या-क्या नहीं किया! ऐसे तमाम नौजवानों को पुलिस चाहे फांसी पर चढ़वा दे लेकिन देश-दुनिया का मन इस घृणा को अब पाले रहेगा कि यह कैसा लोकतंत्र है, कैसा देश है और मोदी-शाह के राज का वक्त कैसा था।

तभी इस सबके बीच एक जज ने साहस में जो लिखा उसकी देश के नामी सभी अखबारों ने यदि संपादकीय लिख वाह की है तो समझना चाहिए कि कथित गोदी मीडिया भी मन ही मन क्या सोच रह है। सुप्रीम कोर्ट के 30 और देश भर के हाई कोर्टों के कोई हजार जज (ये सभी संवैधानिक अधिकार प्राप्त) और लोअर कोर्ट के कोई 20 हजार सामान्य जजों में दिल्ली की पटियाला हाउस के एक जज के फैसले से देशव्यापी मैसेज और सुकून बना है। यही पते की बात है कि 138 करोड़ लोगों के राष्ट्र में न्यायपालिका, मीडिया, संसद, राष्ट्रपति, सीएजी, चुनाव आयोग जैसी तमाम संस्थागत व्यवस्थाओं में इतना विचार तो जरूर बना होगा कि एक लोअर कोर्ट का जज यदि हिम्मत दिखा रहा है तो वे अपने अधिकारों के साथ न्याय कर रहे हैं या अन्याय? पटियाला हाउस के लोअर कोर्ट में यदि 21 साला दिशा की सिविल लिबर्टी बचाने की हिम्मत है तो बाकी 21 हजार न्यायमूर्तियां अपने मंदिर की ध्वजा का मान बनाएं रखने में क्या समर्थ नहीं हो सकतीं?

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