इशारों में नहीं, अब खुली लड़ाई - Naya India
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इशारों में नहीं, अब खुली लड़ाई

चुनाव प्रचार में भड़काऊ भाषण या विभाजनकारी बातें, जो इशारों में होती थी वह अब खुल कर होने लगी है। पहले प्रतीकों के सहारे बात कही जाती थी। पाकिस्तान एक प्रतीक था। तभी भारतीय जनता पार्टी ने समूचे विपक्ष को पाकिस्तान का समर्थक घोषित किया हुआ था और तभी अमित शाह ने बिहार के चुनाव प्रचार में कहा था कि भाजपा हारी तो पाकिस्तान में पटाखे फूटेंगे। पाकिस्तान के प्रतीक का ही इस्तेमाल 2017 के गुजरात विधानसभा चुनाव से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद किया। उन्होंने प्रचार के दौरान कांग्रेस नेताओं और पाकिस्तान के कुछ नेताओं की बैठक का जिक्र किया और दावा किया कि उसमें भाजपा को हराने की योजना पर चर्चा हुई। हालांकि वह पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ पाकिस्तान के नेताओं की औपचारिक मुलाकात थी। ध्यान रहे खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पाकिस्तान जाकर वहां के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ से मिले थे। पर कांग्रेस नेताओं की मुलाकात को भाजपा विरोध और इस तरह से देश का विरोध बताया गया।

ऐसे ही एक प्रतीक उत्तर प्रदेश के चुनाव में चुना गया था। प्रधानमंत्री ने श्मशान बनाम कब्रिस्तान की बात कही। उन्होंने कहा कि सरकार अगर कब्रिस्तान बनाने के लिए पैसा देती है तो श्मशान बनाने के लिए भी देना चाहिए। अब उनका ताजा प्रतीक पहनावा है। उन्होंने पिछले दिनों एक कार्यक्रम के दौरान कहा कि संशोधित नागरिकता कानून का विरोध करने वालों की पहचान उनके पहनावे से हो जाती है। उनका स्पष्ट तौर पर इशारा मुस्लिम पहनावे की ओर था। ध्यान रहे बहुत पहले संभवतः 2012-13 में नरेंद्र मोदी ने अपने एक सद्भावना कार्यक्रम में एक मौलाना के हाथों नमाजी टोपी पहनने से इनकार कर दिया था।

पाकिस्तान के साथ साथ एक प्रतीक कश्मीर भी था। अनुच्छेद 370 को दशकों से भाजपा ने विपक्षी पार्टियों की मुस्लिमपरस्त नीतियों का प्रतीक बनाया हुआ था। महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखंड के चुनाव में उस प्रतीक का भी खूब इस्तेमाल किया गया। दिल्ली के विधानसभा चुनाव में भी भाजपा के एक प्रत्याशी ने कहा कि आठ फरवरी का दिल्ली का चुनाव भारत और पाकिस्तान के बीच की लड़ाई है। इनमें से कोई भी प्रतीक ऐसा नहीं है, जो सीधे हिंदू बनाम मुस्लिम का मामला बनाता हो। पाकिस्तान, कश्मीर, अनुच्छेद 370, पहनावा, श्मशान-कब्रिस्तान आदि ऐसे मुद्दे हैं, जिनसे जरूरी मैसेज पहुंच जाता है।

पर ऐसा लग रहा है कि अब सीधे हिंदू-मुस्लिम का मामला बनाने का समय आ गया है। पहली बार ऐसा हुआ कि भारत सरकार ने एक कानून बनाया, जिसमें स्पष्ट रूप से धर्म के आधार पर नागरिकता का प्रावधान किया गया। केंद्र सरकार ने पिछले साल दिसंबर में संशोधित नागरिकता कानून पास किया, जिसमें कहा गया है कि पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश से धार्मिक उत्पीड़न का शिकार होकर भारत आने वाले गैर मुस्लिमों को भारत की नागरिकता दी जाएगी। मुस्लिम छोड़ कर हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, ईसाई, पारसी आदि सभी को भारत की नागरिकता मिलेगी।

इस कानून के बाद हिंदू-मुस्लिम विभाजन का सबसे बड़ा प्रतीक नागरिकता का मुद्दा बन गया। इस कानून के खिलाफ देश भर में प्रदर्शन शुरू हो गए। वैसे इसकी शुरुआत झारखंड चुनाव के समय ही हो गई थी पर तब यह बहुत कारगर नहीं हो सका था। पर दिल्ली में भाजपा इस प्रतीक को लेकर बहुत उम्मीद में है। कारण शाहीन बाग है। दिल्ली के मुस्लिम बहुल जामिया इलाके में शाहीन बाग में पिछले 49 दिन से मुस्लिम महिलाएं धरने पर बैठी हैं। उनके साथ और भी समुदाय के लोग हैं पर ज्यादातर मुस्लिम महिलाएं हैं। वे सड़क पर धरने पर बैठी हैं। शाहीन बाग की तरह छोटे-छोटे आंदोलन दिल्ली में कई और जगह शुरू हो गए हैं।

सो, इसके सहारे साफ साफ दिल्ली के चुनाव को हिंदू-मुस्लिम का चुनाव बनाया जा रहा है। भाजपा को चुनाव लड़ाने की जिम्मेदारी संभाल रहे केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह खुद हर सभा में शाहीन बाग का जिक्र कर रहे हैं। उन्होंने कम से कम दो सभा में कहा कि इतनी जोर से ईवीएम का बटन दबाना है कि करंट शाहीन बाग में लगे। अब इससे एक कदम आगे बढ़ कर उन्होंने कहा है कि दिल्ली का चुनाव बालाकोट में एयर स्ट्राइक करने वालों और शाहीन बाग का समर्थन करने वालों के बीच है। मतलब एयर स्ट्राइक करने वाले पाकिस्तान विरोधी और देशभक्त हैं जबकि शाहीन बाग का समर्थन करने वाले पाकिस्तानपरस्त, देशद्रोही हैं। सवाल है कि ऐसे ‘देशद्रोहियों’ के खिलाफ कार्रवाई करने में सरकार देरी क्यों कर रही है? क्यों नहीं दिल्ली पुलिस शाहीन बाग खाली करा रही है और वहां बैठी बूढ़ी अम्माओं के ऊपर मुकदमे दर्ज कर रही है? क्या सिर्फ इसलिए नहीं कि इसका चुनावी इस्तेमाल करना है?

दिल्ली में एक केंद्रीय मंत्री ने अपनी सभा में नारे लगवाए कि ‘देश के गद्दारों को, गोली मारो सालों को’ और इसके दो दिन के बाद एक नौजवान ने जामिया के पास नागरिकता कानून के खिलाफ प्रदर्शन की तैयारी कर रहे लोगों को गोली चला दी। भाजपा के एक सांसद ने दिल्ली के लोगों को यहां तक डराया कि शाहीन बाग में बैठे लोग घरों में घुस सकते हैं, मां-बहनों से बलात्कार कर सकते हैं और मार भी सकते हैं। इसके बावजूद पुलिस कार्रवाई नहीं कर रही है। इसका मतलब है कि नागरिकता के नए विभाजनकारी प्रतीक का अधिकतम इस्तेमाल करने की तैयारी है।

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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