मोदी झुकेंगे या किसान?

जवाब में याद करें उस भूमि अधिग्रहण बिल को जिसे सत्ता में आते ही मोदी सरकार ने बनाया था। क्या हुआ उसका? किसानों का विरोध हुआ नहीं कि मोदी सरकार सरेंडर हो गई। उसके बाद किसानों को खुश करने के लिए किसान बीमा योजना से ले कर खातों में पैसा जमा करवाने जैसे दस झुनझुने प्रधानमंत्री मोदी ने सोचे। वह सरकार का पहला अंहम सुधार फैसला था जिससे पीछे हटने में उन्होने उतनी ही फुर्ती दिखाई जितनी बिना आगा-पीछा सोचे लाने में फुर्ती की थी।

तब से अब तक मोदी सरकार के जितने ब़ड़े अंहम सुधार वाले काम या कानून बनाने के फैसले है उन सबके ट्रेक रिकार्ड में या तो बिना आगा-पीछा सोचे फैसले लेना है या पीछे हटते हुए जान बचाने की रीति-नीति का है। जरा गौर करें मोदी सरकार की सुरक्षा-सामरिक नीति पर। पाकिस्तान और चीन को ले कर कभी लाहौर जा कर पकौड़े खाने, कभी सर्जिकल स्ट्राइक, कभी साबरमती नदी के किनारे शी जिन पिंग के साथ झुले झुलने और फिर डोकलाम, गलवान घाटी में धोखा खाने के व्यवहार का ट्रेक रिकार्ड है। ऐसे ही आर्थिक क्षेत्र में नोटबंदी और जीएसटी की रीति-नीति का अनुभव है। सबमें पहले बड़ी-बड़ी बाते, फैसले और मूछं वाली जिद्द लेकिन विरोध और असफलता तो या तो पीछे हटना या एक के बाद एक गोलपोस्ट बदलना।

याद करे कि नोटबंदी की घोषणा किस उद्देश्य से हुई थी और बाद में मूल मकसद को छोड़ कर डिजिटल इकॉनोमी, जनधन खाते जैसे कितने गोलपोस्ट असफलता को छुपाने, लोगों को भरमाने के बने। ऐसे ही जीएसटी में छह महिनों में इतने संशोधन- फेरबदल हुए कि व्यापारियों की व आर्थिकी की ऐसी कमर टूटी कि छोटे कारोबारियों से ले कर अब राज्य सरकारों को भी  मन ही मन लग रहा है कि इससे अच्छा तो पुरानी व्यवस्था ठिक थी।

अपना मानना था और मैं लिखता भी रहा हूं कि कृषि क्षेत्र में सुधार जरूरी है। मैं कृषि, श्रम सुधार से ले कर निजीकरण, शिक्षा नीति सभी का पैरोकार रहा हूं। लेकिन नरेंद्र मोदी ने अपने अकेले की सर्वज्ञता और सपने में हुए इलहाम के अंदाज में बिना किसी को विश्वास में लिए जो किया है उससे सुधार की हर जरूरत का फैसला न केवल गुड-गौबर बनाने वाला हुआ है बल्कि वे  बदनाम और सत्यानाशी हुए है। तभी अनुभव दो टूक है कि जीएसटी से भला व्यापारियों-कारोबारियों का होना था लेकिन वे ज्यादा रोते हुए व बरबाद है। श्रम कानूनों से भला मजदूरों का होना चाहिए था लेकिन वे सबसे ज्यादा आंशकित और परेशान है। जहां किसान आंदोलन है तो मजदूर आंदोलन और असंतोष भी है। उद्योगपतियों-कारोबारियों को तमाम सुधारों से बम-बम होना था, देश में निवेश का सैलाब आ जाना चाहिए था लेकिन इस वर्ग की आज जैसी खराब हालात है और उनकी उर्जा-उद्यमशीलता पर जैसा पाला पड़ा हुआ है वैसा आजाद भारत के इतिहास में कभी नही पड़ा।

बहरहाल, मूल सवाल पर आए कि यदि नरेंद्र मोदी ने छह साल के अपने राज में किसानों की भलाई में कृषि संबंधी तीन कानूनों को ऐतेहासिक करार दिया है और ये कानून यदि उनकी मूंछ का सवाल, छप्पन इंची छाती की प्रतिष्ठा वाले है तो वे इन कानूनों को खत्म करने की बात मानेंगे या नहीं?

तथ्य है कि इन कानूनों को पहले जैसे अध्यादेश से लाया गया, फिर लोकसभा में जैसे हाबडतोड़ अंदाज में पास कराया गया और राज्यसभा की इतिहासजन्य कंलक प्रक्रिया-हंगामें ये बिल जैसे पास हुए, उसका सीधा अर्थ है कि प्रधानमंत्री की निजी समझ, इच्छा और जोरजबरदस्ती से ये तीनों कृषि कानून बने है। इन कानूनों से किसानों के भले होने का प्रधानमंत्री ने देशव्यापी प्रोपेगेंडा बनवाया। सबसे बड़ी बात कानून के खिलाफ पंजाब में आंदोलन चला और वे तीन महिने तक रेल प़टरियों पर किसान धरना देते रहे, लेकिन सरकार को रत्ती भर चिंता नहीं हुई। ऐसे ही विपक्ष विरोध करता रहा और कांग्रेस ने अपनी सरकारो से प्रदेशों में केंद्र के इन कानूनों के खिलाफ राज्य विधानसभाओं में कानून बनवाएं तब भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चिंता नहीं की।

इस बेकग्राउंड से जाहिर है कि नरेंद्र मोदी किसी सूरत में इन कृषि कानूनों को रद्द करने को तैयार नहीं होंगे। तो क्या किसानों को वे कानूनों की निरंतरता के बीच उनकी एमएसपी पर वादे, फसल खरीददारों के रजिस्ट्रेशन, एसडीएम की बजाय अदालत में सुनवाई जैसी शर्तों को मानने की घोषणा, वचनबद्धता से मना लेंगे?  सरकार के मंत्री इसी एप्रोच में काम करते लगते है।

दिक्कत पंजाब के सिक्ख किसानों से है। तीन महिनों में पंजाब-हरियाणा के किसानों में यह हवा बन गई है कि नरेंद्र मोदी के बनाए कृषि कानून खेती और फसल को अंबानी-अदानी-कॉरपोरेट का बंधुआ बनवाने के दीर्घकालीन मकसद के है। इसलिए किसान तीनों कानून को खत्म कराने की जिद्द ठान बैठे है। दिल्ली को घेर कर बैठने से पूरे देश में किसानों को जो मैसेज गया है और उससे भी आंदोलन का रूप किसान बनाम अंबानी-अदानी-कॉरपोरेट के संर्घष में जैसे बदला है तो किसान संगठन शायद ही कृषि कानूनों के पूरे खात्मे से कम पर राजी हो।

तो क्या नरेंद्र मोदी किसानों के साथ आर-पार की लड़ाई की हिम्मत करेंगे? हिसाब से किसान आंदोलन से नरेंद्र मोदी-भाजपा के वोटों पर अधिक असर नहीं होना है। पंजाब-हरियाणा की लोकसभा सीटे कितनी है जो चिंता की जाए? सिक्ख किसानों को हिंदुओं के बीच खालिस्तानी- टुकड़ा-टुकड़ा गैंग का चेहरा बना देने के भाजपा को फायदे है तभी तो ऐसा प्रचार हो रहा है। इससे पंजाब और हरियाणा के हिंदू वोटों पर भाजपा की पकड़ और पुख्ता बन जाएगी। मतलब पंजाब में खालिस्तानी बनाम हिंदुओं की लड़ाई का वह नया पानीपत लड़ाई का मैदान बनना जिसमें एक तरफ सिक्ख वोट अमरेंद्र बनाम अकाली पार्टी में बंटे हुए होंगे और हिंदू नरेंद्र मोदी का झंडा उठाए हुए उनको थोक वोट देते मिलेंगे। उस नाते सरकार के पास विकल्प ज्यादा है।

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