किसान और बेरोजगारी के बुलबुले

मोदी सरकार से अकाली पार्टी की मंत्री इस्तीफा दे तो क्या इसे राजनीति की शुरूआत माने? निश्चित ही संसद सत्र शुरू होने से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोचा नहीं होगा कि किसान राजनीति ऐसे गरमाएगी जो किसानों का गुस्सा देख कर अकाली दल सरकार से तौबा करें। इसका अर्थ है खेती में सुधार को ले कर जो तीन अध्यादेश है उनका किसानों में उलटा असर हुआ है। मैं कृषि क्षेत्र में इन सुधारों का पुराना पैरोकार हूं। कृषि और श्रम सुधार के काम नरसिंहराव के उदारीकरण के बाद हो जाने चाहिए थे। वे नहीं हुए तो उसी के चलते दोनों क्षेत्रों में उद्यमशीलता बाधाओं में और सरकार पर आश्रित लगातार है। बावजूद इसके मुद्दा है कि कोई भी सुधार बिना संबंधी वर्गों, स्टैकहॉल्डर को विश्वास में लिए कैसे फलीभूत हो सकता है? यदि पंजाब- हरियाणा या भारत के तमाम किसान संगठन इन सुधारों के खिलाफ एकजुट हो विरोध में उतरे है तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गुमराह करने की बात भले कितनी ही करे उससे किसान, मंडियों के आढ़तिये, व्यापारी कैसे समझेंगे कि जो हो रहा है वह उनके हित में है।

उस नाते कृषि क्षेत्र के तीनों अध्यादेश से बुनियादी सवाल है कि मोदी सरकार को गाइड कौन कर रहा है. या वह गाइड कैसे हो रही है। न संघ के किसान संगठनों का रोल नजर आता है और न अकाली दल जैसी सहयोगी पार्टियों या भाजपा में विचार या केबिनेट- मंत्रालय में सार्वजनिक जनसुनवाई, किसान संगठनों से परामर्श का कोई सिलसिला प्रमणित है। मतलब हाबड़तोड़ अध्यादेश की जरूरत और संसद से उन पर ठप्पे की इमरजेंसी के पीछे का तात्कालिक दबाव क्या था?

जवाब नहीं तलाशा जा सकता है।

पर देश का किसान प्याज और कृषि क्षेत्र के नए कानूनों से खदबदाएं, यह कोरोना काल के मौजूदा वक्त में हैरानी वाली बात है। ऐसे ही इस सप्ताह नरेंद्र मोदी के जन्म दिन पर बेरोजगारी का सोशल मीडिया पर ट्रेंड बना तो वह भी चौकाने वाला है। निश्चित ही बेरोजगारी का हल्ला विरोधियों के उकसावे से हुआ होगा मगर इतनी बड़ी संख्या में लोगों-नौजवानों का जुड़ना विरोधियों की औकात नहीं स्वंयस्फूर्त ट्रैंड है।

तो क्या माना जाए कि कोरोना वायरस के काल में अपने आप लोग तकलीफ में प्रधानमंत्री और उनकी सरकार पर सोचेंगे। मुश्किल है। नरेंद्र मोदी का सबसे बड़ा कमाल है कि उन्होने हिंदुओं की सोचने की क्षमता को लंगूरी हल्ले, मुंगेरीलाल के ख्यालों के वायरस से खत्म कर डाला है। हिंदू का सोचना-समझना- देखना-सुनना खत्म है। इस सप्ताह लंदन के द इकोनोमिस्ट ने 138 करोड लोगों के भारत को कटाक्ष करते हुए पूछा-लिखा- खबरों में क्या स्टोरी टॉप पर होनी चाहिए? क्या प्रतिदिन कोई एक लाख के करीब वायरस संक्रमण की या पिछली तिमाही में 23.9  प्रतिशत आर्थिकी गिरावट की या सीमा पर आक्रामक चीनी द्वारा सेना के जमाव की? मगर हीं। भारत के 130 करोड लोगों के टीवी चैनलों में हाल के सप्ताहों की स्पॉटलाइट है  ब़ॉलीवुड के स्टारों का निजी जीवन!

और यही है सन् 2020 का भारत यर्थाथ और भारत में बुद्धी हरण की दास्तां का वैश्विक नजरों में लबोलुआब!

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