nayaindia खुद्दार सिख, इतिहासजन्य लोहड़ी! - Naya India
हरिशंकर व्यास कॉलम | गपशप| नया इंडिया|

खुद्दार सिख, इतिहासजन्य लोहड़ी!

पता नहीं हम हिंदुओं के भाग्य में क्या बदा है! पर पिछले साढ़े छह साला हिंदू राज में भारत के जैसे-जो फोटो बने हैं उसके क्रम में वर्ष 2021 की लोहड़ी का फोटो कभी भूलाए नहीं भूलेगा। इस देश के एक-एक सिख, पंजाबी ने इस लोहड़ी पर दिल-दिमाग में जो सोचा है उस पर जितना सोचेंगे संवेदनशील दिल जरूर दहलेगा।पंजाब में, सिखों के घरों में लोहड़ी का क्या अर्थ है, इसे गैर-पंजाबी नहीं बूझ सकता है। दुनिया भर के सिख-पंजाबी अग्नि के इर्द-गिर्द मौज मस्ती के साथ नाच-गाने, खाने-खिलाने की त्योहारी उमंग-उत्सव में जो भाव लिए होते हैं वह इस लोहड़ी पर व्यथा, दुख-गुस्से और संघर्ष के इरादे में तब्दील थी। कोई किसान आंदोलन से सहमत हो या न हो लेकिन कनाडा, ब्रिटेन से लेकर पंजाब के गांव-गांव में लोहड़ी के दिन सिख-पंजाबियों ने जरूर सोचा होगा कि उनके आंदोलनरत सिख किसान दिल्ली की सीमा पर ठंड-बारिश की मुश्किलों के बीच कैसा संघर्ष करते हुए है!

और सलाम खुद्दार किसानों के जज्बे को जो आंदोलन के 49वें दिन किसानों ने केंद्रीय कानूनों की कॉपी जला कर लोहड़ी मनाने के साथ यह भी कहा कि अगर उन्हें बैशाखी भी यहीं, ऐसे ही मनानी पड़ी तब भी कोई दिक्कत नहीं है।

तो वर्ष 2021 की लोहड़ी सिखों के समसामयिक इतिहास का कभी न भुलाए जाने वाला फोटो है, वैसे ही जैसे सन् 2020 में शाहीन बाग में बूढ़ी मुस्लिम अम्माओं के धरने का फोटो भारत के मुसलमानों की याददाश्त का स्थायी फोटो है। इस क्रम में चाहें तो2020 का वह फोटो भी नरेंद्र मोदी राज के इतिहास एलबम में जोड़ लें कि उनके आकस्मिक लॉकडाउन से गरीबों पर क्या गुजरी और पैदल यात्रियों की त्रासदी से भारत की हकीकत में क्या-क्या देखने को मिला। सबसे बड़ी बात की हर फोटो, हर मामले के साथ अंसवेदनशीलता, संस्थाओं के दुरूपयोग, प्रोपेगेंडा, झूठ का वह पहलू नत्थी है, जिस पर अपने आप भविष्य की पीढ़ियों को सुनने को मिलेगा कि वर्ष 2021 की लोहड़ी के दिन खालिस्तानियों की जुमलेबाजी से खुद्दार किसानों की बदनामी का भी प्रोपेगेंडा था। उन्हें चीन, पाकिस्तान की साजिश में बहका बताया गया। तभी बहुत खराब और विनाशकारी होगा यदि सिख वर्ष 2021 की वैशाखी भी वैसे ही मनाते हुए दिखे, जैसे लोहड़ी के दिन भारत के कानून जलाते हुए थे!

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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